"काम ख़त्म नहीं होते" इक काम करेंगे ये काम होने के बा'द वो भी तो इक काम बचा है इस काम के फ़ौरन बा'द तुम अपने कामों से फ़ुरसत हो जाओ तो जल्दी आना हम अपने कामों से फ़ुरसत हो पाएँगे तो आएँगे तुम आओ तो बतलाएँगे हम को भी इक काम है तुम सेे अपने अपने काम ख़तम हो जाएँगे तो बात करेंगे अपने कामों से फ़ुरसत हो पाएँगे तो बात करेंगे इस दुनिया के हर बाशिंदे को अपने ही काम बहुत हैं जिस सेे पूछो बस ये कहता काम बहुत हैं काम बहुत हैं कोई परेशाँ है कामों से कोई परेशाँ काम के पीछे इतने कामों में उलझे हैं फिर भी हम नाकाम बहुत हैं जब इतने नाकाम हैं तो फिर काम में इतनी दिलचस्पी क्यूँ दुनिया भर के काम के आगे ज़ीस्त है फिर इतनी सस्ती क्यूँ इस दुनिया में पैदा होंगे काम करेंगे मर जाएँगे काम से जब फ़ुरसत पाएँगे तो न लौट को घर जाएँगे गर ऐसा होता जाएगा तो क्या हम पैग़ाम ही देंगे आने वाली नस्लों को भी नाम नहीं बस काम ही देंगे लेकिन अब हम ने ये ठाना है लौट के अपने घर जाना है लोगों से बातें करनी है सब सेे मिल कर भी आना है काम फ़राइज़ में अंतर है ये भी सब को समझाना है जो आज हमारे साथ खड़े हैं वो हर वक़्त नहीं होते काम मुकम्मल तो होते हैं लेकिन ख़त्म नहीं होते ।
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"तस्वीर" मैं काफ़ी अरसे से यूँँ मुसलसल तुम्हारे चेहरे को तक रहा हूँ कि ये जो चेहरा है जैसे रौशन इसी से ऐसा कमाल कर दे जवाब में मैं कहूँ मोहब्बत कोई तो ऐसा सवाल कर दे न जाने क्यूँ मुझ को ये लग रहा है तुम अपने हाथों को मेरे हाथों पे यूँँ रखोगी कि जैसे दुनिया की सब मसर्रत हमारे दामन में ला के रख दी और फिर हया से झुका के सिर को ये कहोगी कि यहीं मोहब्बत तमाम कर दे मैं इन ख़यालों की रहगुज़र से गुज़र के इक पल ये सोचता हूँ ये चेहरा जैसे वहीं है साकित वहीं है अब तक न इस में कोई जुंबिश- ए- बेताब है न कोई हरकत मगर ये चेहरे का नूर देखो और फिर तिलिस्म ए सुरूर देखो तुम्हें ये बिल्कुल नहीं लगेगा कि वो अभी भी यहाँ नहीं है कहीं नहीं है तुम्हें पता क्या तुम अब भी उस के ख़याल से ही हो मुख़ातिब अब इस में कोई शक नहीं वो रूह की तासीर है मैं मुख़ातिब हूँ उसी से सामने तस्वीर है
SHABAN NAZIR
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“इंतिज़ार” दिल में इक याद-ए-ग़ुबार है चले आओ हाँ चले आओ मुझे मालूम है कि कुछ ज़्यादा नहीं तेरे आने का कोई वा'दा नहीं मगर फिर भी हम ऐसे मुंतज़िर हैं जैसे कोई आ रहा है आने ही वाला है जैसे आ गया
SHABAN NAZIR
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"बे-ख़बर" ए जान ज़रा बचकर ही रहना हम बद-नज़रों की बद-नज़री से क्या तुम को ख़बर है क्या होता है क्या तुम को गुमाँ तुम क्या होते हो जब ज़ुल्फ़ तुम्हारे रुख़सारों पर इक बार परेशाँ हो जाती है
SHABAN NAZIR
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"याद" यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे भले ही इक भटकती मुख़्तसर सी याद आ जाए कभी बीते हुए लम्हात की एक ख़ुशनुमा झलकी किसी दिन ख़्वाब के रस्ते अचानक सामने आए कभी ऐसा भी होता हो कि मेरी शा'इरी को तुम हमारी याद में खो कर उसे तन्हा जो पढ़ते हो तो उन अल्फ़ाज़ से मेरी कभी आवाज़ आती हो तुम्हारी लब- कुशाई होती है जब मेरी ग़ज़लों से यक़ीं जानो तो मुझ को ये मालूम होता है तुम्हारे लब पे आ जाने का ये अच्छा तरीक़ा है वहीं से फूल की मानिंद तुम्हारे लब से झड़ता हूँ कि जैसे फूल झड़ते हैं तुम्हारे बात करने से मगर मैं सोचता हूँ फूल हूँ तो फूल कैसा हूँ मिरी जाँ कुछ तो गुल ज़ेर-ए- चमन ऐसे भी होते हैं कि जो ख़ुशबू नहीं देते मगर दिल-कश भी होते हैं उन्हीं दिलकश नज़ारों का मैं इक ऐसा हिस्सा हूँ कि जो ख़ुशबू तो देता है मगर दिलकश नहीं होता मगर अफ़सोस है कि ज़िन्दगी कुछ और ही शय है इसे ख़ुशबू परस्ती का दिखावा ख़ूब आता है मुक़ाबिल दिल-कशी के सामने ख़ुशबू-परस्ती हो यक़ीनन ज़िंदगी भी हो न हो दिलकश को चुनती है ज़रा सी देर में ही मैं भी क्या-क्या सोच लेता हूँ मैं तुम को याद कर के ये अक्सर सोचता हूँ बस न पूरे दिन न पूरी रात भले ही चंद से लम्हात यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे।
SHABAN NAZIR
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