"याद" यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे भले ही इक भटकती मुख़्तसर सी याद आ जाए कभी बीते हुए लम्हात की एक ख़ुशनुमा झलकी किसी दिन ख़्वाब के रस्ते अचानक सामने आए कभी ऐसा भी होता हो कि मेरी शा'इरी को तुम हमारी याद में खो कर उसे तन्हा जो पढ़ते हो तो उन अल्फ़ाज़ से मेरी कभी आवाज़ आती हो तुम्हारी लब- कुशाई होती है जब मेरी ग़ज़लों से यक़ीं जानो तो मुझ को ये मालूम होता है तुम्हारे लब पे आ जाने का ये अच्छा तरीक़ा है वहीं से फूल की मानिंद तुम्हारे लब से झड़ता हूँ कि जैसे फूल झड़ते हैं तुम्हारे बात करने से मगर मैं सोचता हूँ फूल हूँ तो फूल कैसा हूँ मिरी जाँ कुछ तो गुल ज़ेर-ए- चमन ऐसे भी होते हैं कि जो ख़ुशबू नहीं देते मगर दिल-कश भी होते हैं उन्हीं दिलकश नज़ारों का मैं इक ऐसा हिस्सा हूँ कि जो ख़ुशबू तो देता है मगर दिलकश नहीं होता मगर अफ़सोस है कि ज़िन्दगी कुछ और ही शय है इसे ख़ुशबू परस्ती का दिखावा ख़ूब आता है मुक़ाबिल दिल-कशी के सामने ख़ुशबू-परस्ती हो यक़ीनन ज़िंदगी भी हो न हो दिलकश को चुनती है ज़रा सी देर में ही मैं भी क्या-क्या सोच लेता हूँ मैं तुम को याद कर के ये अक्सर सोचता हूँ बस न पूरे दिन न पूरी रात भले ही चंद से लम्हात यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे।
Related Nazm
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
475 likes
"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
236 likes
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
216 likes
"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
191 likes
More from SHABAN NAZIR
"तस्वीर" मैं काफ़ी अरसे से यूँँ मुसलसल तुम्हारे चेहरे को तक रहा हूँ कि ये जो चेहरा है जैसे रौशन इसी से ऐसा कमाल कर दे जवाब में मैं कहूँ मोहब्बत कोई तो ऐसा सवाल कर दे न जाने क्यूँ मुझ को ये लग रहा है तुम अपने हाथों को मेरे हाथों पे यूँँ रखोगी कि जैसे दुनिया की सब मसर्रत हमारे दामन में ला के रख दी और फिर हया से झुका के सिर को ये कहोगी कि यहीं मोहब्बत तमाम कर दे मैं इन ख़यालों की रहगुज़र से गुज़र के इक पल ये सोचता हूँ ये चेहरा जैसे वहीं है साकित वहीं है अब तक न इस में कोई जुंबिश- ए- बेताब है न कोई हरकत मगर ये चेहरे का नूर देखो और फिर तिलिस्म ए सुरूर देखो तुम्हें ये बिल्कुल नहीं लगेगा कि वो अभी भी यहाँ नहीं है कहीं नहीं है तुम्हें पता क्या तुम अब भी उस के ख़याल से ही हो मुख़ातिब अब इस में कोई शक नहीं वो रूह की तासीर है मैं मुख़ातिब हूँ उसी से सामने तस्वीर है
SHABAN NAZIR
0 likes
"काम ख़त्म नहीं होते" इक काम करेंगे ये काम होने के बा'द वो भी तो इक काम बचा है इस काम के फ़ौरन बा'द तुम अपने कामों से फ़ुरसत हो जाओ तो जल्दी आना हम अपने कामों से फ़ुरसत हो पाएँगे तो आएँगे तुम आओ तो बतलाएँगे हम को भी इक काम है तुम सेे अपने अपने काम ख़तम हो जाएँगे तो बात करेंगे अपने कामों से फ़ुरसत हो पाएँगे तो बात करेंगे इस दुनिया के हर बाशिंदे को अपने ही काम बहुत हैं जिस सेे पूछो बस ये कहता काम बहुत हैं काम बहुत हैं कोई परेशाँ है कामों से कोई परेशाँ काम के पीछे इतने कामों में उलझे हैं फिर भी हम नाकाम बहुत हैं जब इतने नाकाम हैं तो फिर काम में इतनी दिलचस्पी क्यूँ दुनिया भर के काम के आगे ज़ीस्त है फिर इतनी सस्ती क्यूँ इस दुनिया में पैदा होंगे काम करेंगे मर जाएँगे काम से जब फ़ुरसत पाएँगे तो न लौट को घर जाएँगे गर ऐसा होता जाएगा तो क्या हम पैग़ाम ही देंगे आने वाली नस्लों को भी नाम नहीं बस काम ही देंगे लेकिन अब हम ने ये ठाना है लौट के अपने घर जाना है लोगों से बातें करनी है सब सेे मिल कर भी आना है काम फ़राइज़ में अंतर है ये भी सब को समझाना है जो आज हमारे साथ खड़े हैं वो हर वक़्त नहीं होते काम मुकम्मल तो होते हैं लेकिन ख़त्म नहीं होते ।
SHABAN NAZIR
1 likes
“इंतिज़ार” दिल में इक याद-ए-ग़ुबार है चले आओ हाँ चले आओ मुझे मालूम है कि कुछ ज़्यादा नहीं तेरे आने का कोई वा'दा नहीं मगर फिर भी हम ऐसे मुंतज़िर हैं जैसे कोई आ रहा है आने ही वाला है जैसे आ गया
SHABAN NAZIR
0 likes
"बे-ख़बर" ए जान ज़रा बचकर ही रहना हम बद-नज़रों की बद-नज़री से क्या तुम को ख़बर है क्या होता है क्या तुम को गुमाँ तुम क्या होते हो जब ज़ुल्फ़ तुम्हारे रुख़सारों पर इक बार परेशाँ हो जाती है
SHABAN NAZIR
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on SHABAN NAZIR.
Similar Moods
More moods that pair well with SHABAN NAZIR's nazm.







