nazmKuch Alfaaz

कभी यहाँ से गए, तो कभी वहाँ से गए उन सेे बिछड़ के हम पता नहीं कहाँ कहाँ से गए उन के सिवा जो निकले हर रास्ते हम गुम्र हाँ से गए मुलाक़ाते होती रहती थी हमारी ज़ीन राहों पर फिर कभी ना हम भूल कर भी वहाँ से गए एक बार तो बता देते वजह क्या थी रूठने की ख़ामोश होकर ना जाने क्यूँ किस वज हाँ से गए मोहब्बत में कर बैठे थे जगह जो उन के दिलों जहाँ में ना चाहते हुए भी निकाले उन के दिलों जहाँ से गए हम मोहब्बत में उन के कुछ ऐसा भटके कभी यहाँ से गए तो कभी वहाँ से गए

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"हौसला" हौसला रख रास्ते दिखने लगेंगे ये अँधेरे सुब्ह तक छटने लगेंगे क़ाफ़िले पर क़ाफ़िले गुज़रे यहाँ से देखना कुछ नक़्श-ए-पा आगे मिलेंगे लड़-खड़ाते हौसलों को फिर उठा कर सुब्ह होते ही सफ़र पर चल पड़ेंगे ठोकरों से कह दो के दम-ख़म लगा दें हम गिरेंगे फिर उठेंगे पर चलेंगे

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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तय्यार नहीं ज़रा अपने बालों को बाँध रखो दिल अब झूम जाने को तय्यार नहीं बनाए रखो दूरी कुछ अपने दरमियाँ दिल अब क़रीब आने को तय्यार नहीं कर गुजरे हैं मोहब्बत हम भी कभी दिल अब तुम्हें आज़माने को तय्यार नहीं है दूर जहाँ से, सुकून कि तलाश में दिल अब ज़हर खाने को तय्यार नहीं हम ही जाने, क्या ग़म से हम गुजरे दिल अब और ग़म पाने को तय्यार नहीं

Kohar

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"मुस्कुराता कहा हूँ मैं" एक मुस्कुराता हुआ चेहरा माथे पर की शिकन को छुपाता है औरों को रहे तस्सली उस के ख़ुश होने की इस लिए झूठ-मूठ का वो मुस्कुराता है वो ऐसा ख़ुश दिखाई देता है लोग सोच में पड़ जाते है की इस का ग़म आख़िर जाता कहा है वो ख़ुद जाने, इस सेे पहले वो कितना बहा है कोई बात मुस्करा कर करता हूँ तो मुस्कुराता कहा हूँ मैं हर रोज़ ग़मों से सामना कर अब जैसे तैसे जी रहा हूँ मैं

Kohar

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हरा ना सका दिल कि मैं बात को दोहरा ना सका मैं उसे जीत कर भी हरा ना सका कहीं जज़्बात है और होंगे सदा बात महसूस मैं ये करा ना सका तेरी मौजूदगी की वजह से शायद सर्द में ठंड से थरथरा ना सका

Kohar

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"बदल देते था जो लिखा हुआ" मैं ख़ुद शिकस्त खाया प्यार में औरों को जीतने के मशवरे क्या करूँं उस पर इतना मर के ना उसे पा सका उस के लिए फिर मर के क्या करूँं जिस कदर रूह को तू ने था मेरी छुआं महक जाता था गया मुझ से जो छुआ गीली जलती लकड़ी से जैसे है उठता वैसे अब बस रह गया उठता सा धुआँ रखें सलामत ख़ुदा तुझे अब मेरी "जाँ" मेरी जान तेरे जानें से तो जाती जा रही तू ढूँढ़ने भी फिर निकले मुझे उस तरह मैं जैसे मिला था वैसे मिलूंगा कैसे फिर कही वो कहता रहा जो हुआ, नियति में था जो लिखा हुआ मैं कहता साथ होता तेरा, बदल देते था जो लिखा हुआ

Kohar

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"‎मोहब्बत" मेरी शिद्दत से की गई ‎मोहब्बत ख़ुदा के इबादत से कम न थी ख़ैर वो बात और है की ख़ुदा ने मुझ पर रहमत न की दिल ऐसा उस से लगा मैं बैठा कभी मैं ने ख़ुद से वैसी ‎मोहब्बत न की वफ़ा की उम्मीद भी मैं ने उस से की बेवफाओं से बचने की जिस ने हिदायत थी दी

Kohar

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