नज़्म: बद-नसीब कभी कभी ये सोच कर मैं कितना बद-नसीब हूँ कि ना तो माँ का प्यार मिल सका कभी न बाप ने कभी मोहब्बतों भरी नज़र से देखा है मुझे न हौसला मिला कभी बहन की ओर से न भाई काम आ सका न दोस्तों की दोस्ती में वो सुकूँ मिला न इश्क़ का ग़मों पे कुछ असर हुआ तो मेरा दिल मुझे इक और ख़याल की दिशा में ले के जाता है कि क्या अजब मिरा ग़ुरूर ही, मिरी अना ही मेरा शुक्र अदा न करना ही वजह है मेरा इन तमाम रहमतों से दूर होने की मगर वहीं , मुझे मिरा दिमाग़ इस ख़याल को अलग ही ज़ाविए से पेश करता है कि बद-नसीबी भी किसी किसी पे खुलती है इसे गुनाहों की सज़ा न जानिए बस इस की वजह से ही मैं किसी तरह की बंदिशों के हल्के से घिरा हुआ नहीं हूँ मेरे पाँव में किसी भी राब्ते की बेड़ियाँ नहीं हैं और मैं दिमाग़ की सलाह को सही समझता हूँ मैं आप सब में से बहुत अलग हूँ मुझ को अपने आने वाले कल की फ़िक्र है न अपनी बद-नसीबी से किसी तरह का कोई ख़ौफ़ है मैं जानता हूँ मेरा क्या बनेगा। मुझ को अपने जैसे में शुमार करना अब से छोड़ दीजिए मैं बद-नसीब हूँ!
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"आख़िरी ख़त" तुम चली तो गई पर दिल ने कभी जाने नहीं दिया तुम को तुम्हारी याद की ज़ंजीरों से खेलता रहता है अब क्या करूँंँ दिल तो नादान है मिरा एक ही ज़िद पे अड़ा है अब भी तुम्हें पाने की सिर्फ़ तुम्हारे सभी ख़त को महफूज़ रखा है मैं ने मोहब्बत की तरह के वो ख़त नहीं है बल्कि मिरी ज़िन्दगी हैं के अब उन के सहारे ही बसर करनी पड़ेगी मुझ को तुम नहीं तो तुम्हारी याद दिलाती हुई हर चीज़ महफूज़ हैं सब पास मिरे वो दिन जब तुम्हें पहली दफा देखा था मिरे दिल ने आज भी वो याद है जो देखते ही काइल हो गया तुम्हारी सादगी़ का, हुस्न का, लफ़्ज़ों का और हो गई तुम सेे मोहब्बत वो भी इतनी के बयाँँ भी न कर पाऊंँ तुम्हारे सभी ख़त को मैं रोज़ पढ़ता हूँ उन दिनों को याद में लाता हूँ जब हम साथ थे उस जगह मैं आज भी जाता हूँ जहाँँ तुम दिखा करती थी मुझ को मैं वहाँँ भी जाता हूँ जहाँँ रोज़ मैं बातें किया करता था तुम सेे ख़यालों में कभी कौल पे पर एक ख़याल मुझे हर बार सता देता है फिर बा'द में आके रुला देता है कमज़ोर किए देता है के अब हम साथ नहीं है के तुम अब दूर हो मुझ सेे वो भी मेरी वजह से के मैं तुम को समझ ना सका तेरी ख़मोशी को सुन ना सका मैं तुम सेे मोहब्बत भी न कर पाया सो जिस का अफ़सोस रहेगा मुझे पर, तुम अब वापस नहीं आना के मैं जान गया हूँ मैं तुम्हारी मोहब्बत के मुक़ाबिल नहीं हूँ तुम मिरे साथ ख़ुशी से नहीं रह पाओगी पर अब कभी तुम मिलो मुझ सेे तो मुझे दोस्त समझकर ही मिलना के मुझ में जो धड़कता था तुम्हारे लिए उस दिल को दफना दिया है मैं ने मिरे अंदर जो इश्क़ था दार पे लटका दिया है मैं ने और अब मेरी जानिब से तुम्हारे लिए ये आख़िरी ख़त है जिसे नज़्म बना कर तुम्हें पहुंँचा रहा हूँ तुम्हारी बद दुआ को मैं ने सलामत रखा है कर सको मुझ को अगर माफ तो कर देना तुम मैं ने ग़ज़लों में सभी, बे-वफ़ा खुदको कहा है तुम्हें जब भी कहा है, अपनी मोहब्बत कहा है
Faiz Ahmad
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"हम मिले थे ख़्वाबों में" तेरे जाने से असर मुझ पे हुआ कुछ भी नहीं साथ जो ख़ुद से था ख़ुद का मिरा वो छूट गया मेरे अंदर जो चटकता रहा हर रोज़ कहीं शख़्स इस बार तिरे हिज्र में वो टूट गया हम तरसते रहे पीने को झलक तेरी वहीं और कोई ग़ैर समुंदर को मिरे लूट गया क्या बताएँ दिल-ए-बेताब की हालत का सबब याद को तेरी जुदा होने नहीं देता है कल शब-ए-ग़म को टटोला तो ये मालूम पड़ा बस तिरा रंज है जो सोने नहीं देता है इक तिरा प्यार है और मेरा तजुर्बा जो मुझे अब किसी और का भी होने नहीं देता है मुश्किलें बढ़के भी आसान लगीं हैं मुझ को मुश्किलें देख ये हलकान लगीं हैं मुझ को खोल देतीं हैं सभी भेद मिरे सामने ये सब परेशानी परेशान लगीं हैं मुझ को जिन को दिखता था जहाँ सारा मिरी आँखों में आज वो आँखें भी वीरान लगीं हैं मुझ को कब तलक बोझ उठाऊँ मुझे आज़ाद करो ज़िंदगानी भी यूँँ सामान लगीं हैं मुझ को खेल ही हश्र का मैदान है मेरे नज़दीक जाने हर शख़्स क्यूँँ हैरान है मेरे नज़दीक जिस को देखो तो मोहब्बत में बदन का तालिब हर तरफ़ हुस्न परेशान है मेरे नज़दीक गर बिछड़ना है मुकद्दर मिरा तुझ सेे तो सही सोच लेंगे के सभी गुल खिले थे ख़्वाबों में मेरी हर याद को तुम दिल से भुला भी देना सोच लेंगे के हमें तुम मिले थे ख़्वाबों में
Faiz Ahmad
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"कल फिर" कल फिर तुम्हें ख़यालों में बनाया हम ने कल फिर तुम्हारे साथ गुफ़्तगू की हम ने कल फिर सब अपने ख़्वाबों को भुलाया हम ने कल फिर कुछ अपनी हसरतें रुजू की हम ने कल फिर सुख़न से तुझ को यूँँ सजाया हम ने कल फिर ग़ज़ल के पन्नों में उतारा हम ने कल फिर तुझे बहुत किया था याद हम ने कल फिर ख़ुशी से ग़म किया इजाद हम ने कल फिर अकेलापन किया अज़ाद हम ने कल फिर बुरी तरह रुलाया तुम ने हम को कल फिर फ़क़ीर प्यार का बुलाया हम को कल फिर जगह जगह न हक़ दबाया हम को कल फिर बस इक मज़ाक़ सा बनाया हम को कल फिर तुझे मनाना चाहा मेरे दिल ने कल फिर मोहब्बतों की भीख़ मांँगी हम ने कल फिर तिरी नज़र के हो गए प्यासे कल फिर समंदरों की भीख़ माँगी हम ने कल फिर तू जा रही थी बिन कहे कुछ हम से कल फिर सो नफरतों की भीख़ माँगी हम ने कल फिर ये ठाना तुम को याद न करेंगे कल फिर मगर एहद ख़िलाफी़ हम करेंगे कल फिर दोबारा तुम को याद हम करेंगे
Faiz Ahmad
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"करम" अब तो दिल भी नहीं है सीने में फिर सुकूँ क्यूँँ नहीं है जीने में ज़िन्दगी सब्र का पिलाती है घूँट क्यूँँ तक़ल्लुफ करुँ मैं पीने में हम जो ख़ुद के पराए होते हैं इश्क़ में धोका खाए होते हैं औरों की करते ज़िन्दगी रौशन ख़ुद अँधेरों के साए होते हैं ऐ ख़ुदा थोड़ा कर करम मुझ पे उस के आने का कर भरम मुझ पे
Faiz Ahmad
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