"हम मिले थे ख़्वाबों में" तेरे जाने से असर मुझ पे हुआ कुछ भी नहीं साथ जो ख़ुद से था ख़ुद का मिरा वो छूट गया मेरे अंदर जो चटकता रहा हर रोज़ कहीं शख़्स इस बार तिरे हिज्र में वो टूट गया हम तरसते रहे पीने को झलक तेरी वहीं और कोई ग़ैर समुंदर को मिरे लूट गया क्या बताएँ दिल-ए-बेताब की हालत का सबब याद को तेरी जुदा होने नहीं देता है कल शब-ए-ग़म को टटोला तो ये मालूम पड़ा बस तिरा रंज है जो सोने नहीं देता है इक तिरा प्यार है और मेरा तजुर्बा जो मुझे अब किसी और का भी होने नहीं देता है मुश्किलें बढ़के भी आसान लगीं हैं मुझ को मुश्किलें देख ये हलकान लगीं हैं मुझ को खोल देतीं हैं सभी भेद मिरे सामने ये सब परेशानी परेशान लगीं हैं मुझ को जिन को दिखता था जहाँ सारा मिरी आँखों में आज वो आँखें भी वीरान लगीं हैं मुझ को कब तलक बोझ उठाऊँ मुझे आज़ाद करो ज़िंदगानी भी यूँँ सामान लगीं हैं मुझ को खेल ही हश्र का मैदान है मेरे नज़दीक जाने हर शख़्स क्यूँँ हैरान है मेरे नज़दीक जिस को देखो तो मोहब्बत में बदन का तालिब हर तरफ़ हुस्न परेशान है मेरे नज़दीक गर बिछड़ना है मुकद्दर मिरा तुझ सेे तो सही सोच लेंगे के सभी गुल खिले थे ख़्वाबों में मेरी हर याद को तुम दिल से भुला भी देना सोच लेंगे के हमें तुम मिले थे ख़्वाबों में
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"आख़िरी ख़त" तुम चली तो गई पर दिल ने कभी जाने नहीं दिया तुम को तुम्हारी याद की ज़ंजीरों से खेलता रहता है अब क्या करूँंँ दिल तो नादान है मिरा एक ही ज़िद पे अड़ा है अब भी तुम्हें पाने की सिर्फ़ तुम्हारे सभी ख़त को महफूज़ रखा है मैं ने मोहब्बत की तरह के वो ख़त नहीं है बल्कि मिरी ज़िन्दगी हैं के अब उन के सहारे ही बसर करनी पड़ेगी मुझ को तुम नहीं तो तुम्हारी याद दिलाती हुई हर चीज़ महफूज़ हैं सब पास मिरे वो दिन जब तुम्हें पहली दफा देखा था मिरे दिल ने आज भी वो याद है जो देखते ही काइल हो गया तुम्हारी सादगी़ का, हुस्न का, लफ़्ज़ों का और हो गई तुम सेे मोहब्बत वो भी इतनी के बयाँँ भी न कर पाऊंँ तुम्हारे सभी ख़त को मैं रोज़ पढ़ता हूँ उन दिनों को याद में लाता हूँ जब हम साथ थे उस जगह मैं आज भी जाता हूँ जहाँँ तुम दिखा करती थी मुझ को मैं वहाँँ भी जाता हूँ जहाँँ रोज़ मैं बातें किया करता था तुम सेे ख़यालों में कभी कौल पे पर एक ख़याल मुझे हर बार सता देता है फिर बा'द में आके रुला देता है कमज़ोर किए देता है के अब हम साथ नहीं है के तुम अब दूर हो मुझ सेे वो भी मेरी वजह से के मैं तुम को समझ ना सका तेरी ख़मोशी को सुन ना सका मैं तुम सेे मोहब्बत भी न कर पाया सो जिस का अफ़सोस रहेगा मुझे पर, तुम अब वापस नहीं आना के मैं जान गया हूँ मैं तुम्हारी मोहब्बत के मुक़ाबिल नहीं हूँ तुम मिरे साथ ख़ुशी से नहीं रह पाओगी पर अब कभी तुम मिलो मुझ सेे तो मुझे दोस्त समझकर ही मिलना के मुझ में जो धड़कता था तुम्हारे लिए उस दिल को दफना दिया है मैं ने मिरे अंदर जो इश्क़ था दार पे लटका दिया है मैं ने और अब मेरी जानिब से तुम्हारे लिए ये आख़िरी ख़त है जिसे नज़्म बना कर तुम्हें पहुंँचा रहा हूँ तुम्हारी बद दुआ को मैं ने सलामत रखा है कर सको मुझ को अगर माफ तो कर देना तुम मैं ने ग़ज़लों में सभी, बे-वफ़ा खुदको कहा है तुम्हें जब भी कहा है, अपनी मोहब्बत कहा है
Faiz Ahmad
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नज़्म: बद-नसीब कभी कभी ये सोच कर मैं कितना बद-नसीब हूँ कि ना तो माँ का प्यार मिल सका कभी न बाप ने कभी मोहब्बतों भरी नज़र से देखा है मुझे न हौसला मिला कभी बहन की ओर से न भाई काम आ सका न दोस्तों की दोस्ती में वो सुकूँ मिला न इश्क़ का ग़मों पे कुछ असर हुआ तो मेरा दिल मुझे इक और ख़याल की दिशा में ले के जाता है कि क्या अजब मिरा ग़ुरूर ही, मिरी अना ही मेरा शुक्र अदा न करना ही वजह है मेरा इन तमाम रहमतों से दूर होने की मगर वहीं , मुझे मिरा दिमाग़ इस ख़याल को अलग ही ज़ाविए से पेश करता है कि बद-नसीबी भी किसी किसी पे खुलती है इसे गुनाहों की सज़ा न जानिए बस इस की वजह से ही मैं किसी तरह की बंदिशों के हल्के से घिरा हुआ नहीं हूँ मेरे पाँव में किसी भी राब्ते की बेड़ियाँ नहीं हैं और मैं दिमाग़ की सलाह को सही समझता हूँ मैं आप सब में से बहुत अलग हूँ मुझ को अपने आने वाले कल की फ़िक्र है न अपनी बद-नसीबी से किसी तरह का कोई ख़ौफ़ है मैं जानता हूँ मेरा क्या बनेगा। मुझ को अपने जैसे में शुमार करना अब से छोड़ दीजिए मैं बद-नसीब हूँ!
Faiz Ahmad
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"कल फिर" कल फिर तुम्हें ख़यालों में बनाया हम ने कल फिर तुम्हारे साथ गुफ़्तगू की हम ने कल फिर सब अपने ख़्वाबों को भुलाया हम ने कल फिर कुछ अपनी हसरतें रुजू की हम ने कल फिर सुख़न से तुझ को यूँँ सजाया हम ने कल फिर ग़ज़ल के पन्नों में उतारा हम ने कल फिर तुझे बहुत किया था याद हम ने कल फिर ख़ुशी से ग़म किया इजाद हम ने कल फिर अकेलापन किया अज़ाद हम ने कल फिर बुरी तरह रुलाया तुम ने हम को कल फिर फ़क़ीर प्यार का बुलाया हम को कल फिर जगह जगह न हक़ दबाया हम को कल फिर बस इक मज़ाक़ सा बनाया हम को कल फिर तुझे मनाना चाहा मेरे दिल ने कल फिर मोहब्बतों की भीख़ मांँगी हम ने कल फिर तिरी नज़र के हो गए प्यासे कल फिर समंदरों की भीख़ माँगी हम ने कल फिर तू जा रही थी बिन कहे कुछ हम से कल फिर सो नफरतों की भीख़ माँगी हम ने कल फिर ये ठाना तुम को याद न करेंगे कल फिर मगर एहद ख़िलाफी़ हम करेंगे कल फिर दोबारा तुम को याद हम करेंगे
Faiz Ahmad
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"करम" अब तो दिल भी नहीं है सीने में फिर सुकूँ क्यूँँ नहीं है जीने में ज़िन्दगी सब्र का पिलाती है घूँट क्यूँँ तक़ल्लुफ करुँ मैं पीने में हम जो ख़ुद के पराए होते हैं इश्क़ में धोका खाए होते हैं औरों की करते ज़िन्दगी रौशन ख़ुद अँधेरों के साए होते हैं ऐ ख़ुदा थोड़ा कर करम मुझ पे उस के आने का कर भरम मुझ पे
Faiz Ahmad
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