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"कल फिर" कल फिर तुम्हें ख़यालों में बनाया हम ने कल फिर तुम्हारे साथ गुफ़्तगू की हम ने कल फिर सब अपने ख़्वाबों को भुलाया हम ने कल फिर कुछ अपनी हसरतें रुजू की हम ने कल फिर सुख़न से तुझ को यूँँ सजाया हम ने कल फिर ग़ज़ल के पन्नों में उतारा हम ने कल फिर तुझे बहुत किया था याद हम ने कल फिर ख़ुशी से ग़म किया इजाद हम ने कल फिर अकेलापन किया अज़ाद हम ने कल फिर बुरी तरह रुलाया तुम ने हम को कल फिर फ़क़ीर प्यार का बुलाया हम को कल फिर जगह जगह न हक़ दबाया हम को कल फिर बस इक मज़ाक़ सा बनाया हम को कल फिर तुझे मनाना चाहा मेरे दिल ने कल फिर मोहब्बतों की भीख़ मांँगी हम ने कल फिर तिरी नज़र के हो गए प्यासे कल फिर समंदरों की भीख़ माँगी हम ने कल फिर तू जा रही थी बिन कहे कुछ हम से कल फिर सो नफरतों की भीख़ माँगी हम ने कल फिर ये ठाना तुम को याद न करेंगे कल फिर मगर एहद ख़िलाफी़ हम करेंगे कल फिर दोबारा तुम को याद हम करेंगे

Faiz Ahmad1 Likes

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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नज़्म: बद-नसीब कभी कभी ये सोच कर मैं कितना बद-नसीब हूँ कि ना तो माँ का प्यार मिल सका कभी न बाप ने कभी मोहब्बतों भरी नज़र से देखा है मुझे न हौसला मिला कभी बहन की ओर से न भाई काम आ सका न दोस्तों की दोस्ती में वो सुकूँ मिला न इश्क़ का ग़मों पे कुछ असर हुआ तो मेरा दिल मुझे इक और ख़याल की दिशा में ले के जाता है कि क्या अजब मिरा ग़ुरूर ही, मिरी अना ही मेरा शुक्र अदा न करना ही वजह है मेरा इन तमाम रहमतों से दूर होने की मगर वहीं , मुझे मिरा दिमाग़ इस ख़याल को अलग ही ज़ाविए से पेश करता है कि बद-नसीबी भी किसी किसी पे खुलती है इसे गुनाहों की सज़ा न जानिए बस इस की वजह से ही मैं किसी तरह की बंदिशों के हल्के से घिरा हुआ नहीं हूँ मेरे पाँव में किसी भी राब्ते की बेड़ियाँ नहीं हैं और मैं दिमाग़ की सलाह को सही समझता हूँ मैं आप सब में से बहुत अलग हूँ मुझ को अपने आने वाले कल की फ़िक्र है न अपनी बद-नसीबी से किसी तरह का कोई ख़ौफ़ है मैं जानता हूँ मेरा क्या बनेगा। मुझ को अपने जैसे में शुमार करना अब से छोड़ दीजिए मैं बद-नसीब हूँ!

Faiz Ahmad

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"आख़िरी ख़त" तुम चली तो गई पर दिल ने कभी जाने नहीं दिया तुम को तुम्हारी याद की ज़ंजीरों से खेलता रहता है अब क्या करूँंँ दिल तो नादान है मिरा एक ही ज़िद पे अड़ा है अब भी तुम्हें पाने की सिर्फ़ तुम्हारे सभी ख़त को महफूज़ रखा है मैं ने मोहब्बत की तरह के वो ख़त नहीं है बल्कि मिरी ज़िन्दगी हैं के अब उन के सहारे ही बसर करनी पड़ेगी मुझ को तुम नहीं तो तुम्हारी याद दिलाती हुई हर चीज़ महफूज़ हैं सब पास मिरे वो दिन जब तुम्हें पहली दफा देखा था मिरे दिल ने आज भी वो याद है जो देखते ही काइल हो गया तुम्हारी सादगी़ का, हुस्न का, लफ़्ज़ों का और हो गई तुम सेे मोहब्बत वो भी इतनी के बयाँँ भी न कर पाऊंँ तुम्हारे सभी ख़त को मैं रोज़ पढ़ता हूँ उन दिनों को याद में लाता हूँ जब हम साथ थे उस जगह मैं आज भी जाता हूँ जहाँँ तुम दिखा करती थी मुझ को मैं वहाँँ भी जाता हूँ जहाँँ रोज़ मैं बातें किया करता था तुम सेे ख़यालों में कभी कौल पे पर एक ख़याल मुझे हर बार सता देता है फिर बा'द में आके रुला देता है कमज़ोर किए देता है के अब हम साथ नहीं है के तुम अब दूर हो मुझ सेे वो भी मेरी वजह से के मैं तुम को समझ ना सका तेरी ख़मोशी को सुन ना सका मैं तुम सेे मोहब्बत भी न कर पाया सो जिस का अफ़सोस रहेगा मुझे पर, तुम अब वापस नहीं आना के मैं जान गया हूँ मैं तुम्हारी मोहब्बत के मुक़ाबिल नहीं हूँ तुम मिरे साथ ख़ुशी से नहीं रह पाओगी पर अब कभी तुम मिलो मुझ सेे तो मुझे दोस्त समझकर ही मिलना के मुझ में जो धड़कता था तुम्हारे लिए उस दिल को दफना दिया है मैं ने मिरे अंदर जो इश्क़ था दार पे लटका दिया है मैं ने और अब मेरी जानिब से तुम्हारे लिए ये आख़िरी ख़त है जिसे नज़्म बना कर तुम्हें पहुंँचा रहा हूँ तुम्हारी बद दुआ को मैं ने सलामत रखा है कर सको मुझ को अगर माफ तो कर देना तुम मैं ने ग़ज़लों में सभी, बे-वफ़ा खुदको कहा है तुम्हें जब भी कहा है, अपनी मोहब्बत कहा है

Faiz Ahmad

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"हम मिले थे ख़्वाबों में" तेरे जाने से असर मुझ पे हुआ कुछ भी नहीं साथ जो ख़ुद से था ख़ुद का मिरा वो छूट गया मेरे अंदर जो चटकता रहा हर रोज़ कहीं शख़्स इस बार तिरे हिज्र में वो टूट गया हम तरसते रहे पीने को झलक तेरी वहीं और कोई ग़ैर समुंदर को मिरे लूट गया क्या बताएँ दिल-ए-बेताब की हालत का सबब याद को तेरी जुदा होने नहीं देता है कल शब-ए-ग़म को टटोला तो ये मालूम पड़ा बस तिरा रंज है जो सोने नहीं देता है इक तिरा प्यार है और मेरा तजुर्बा जो मुझे अब किसी और का भी होने नहीं देता है मुश्किलें बढ़के भी आसान लगीं हैं मुझ को मुश्किलें देख ये हलकान लगीं हैं मुझ को खोल देतीं हैं सभी भेद मिरे सामने ये सब परेशानी परेशान लगीं हैं मुझ को जिन को दिखता था जहाँ सारा मिरी आँखों में आज वो आँखें भी वीरान लगीं हैं मुझ को कब तलक बोझ उठाऊँ मुझे आज़ाद करो ज़िंदगानी भी यूँँ सामान लगीं हैं मुझ को खेल ही हश्र का मैदान है मेरे नज़दीक जाने हर शख़्स क्यूँँ हैरान है मेरे नज़दीक जिस को देखो तो मोहब्बत में बदन का तालिब हर तरफ़ हुस्न परेशान है मेरे नज़दीक गर बिछड़ना है मुकद्दर मिरा तुझ सेे तो सही सोच लेंगे के सभी गुल खिले थे ख़्वाबों में मेरी हर याद को तुम दिल से भुला भी देना सोच लेंगे के हमें तुम मिले थे ख़्वाबों में

Faiz Ahmad

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"करम" अब तो दिल भी नहीं है सीने में फिर सुकूँ क्यूँँ नहीं है जीने में ज़िन्दगी सब्र का पिलाती है घूँट क्यूँँ तक़ल्लुफ करुँ मैं पीने में हम जो ख़ुद के पराए होते हैं इश्क़ में धोका खाए होते हैं औरों की करते ज़िन्दगी रौशन ख़ुद अँधेरों के साए होते हैं ऐ ख़ुदा थोड़ा कर करम मुझ पे उस के आने का कर भरम मुझ पे

Faiz Ahmad

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