nazmKuch Alfaaz

कहाँ थे हम समुंदर सी किसी ख़्वाहिश के साहिल पर हँसती भीगती साअ'त की संगत में हँसी कितनी सजल थी आँख के हर कुंज में तितली की सूरत उड़ती फिरती थी रह-ए-शब में घना जंगल या कोई अजनबी रस्ता हमारे सामने आता तो उस दीवार के सीने से कितने दूर निकल आए लहू की ताल पर मंज़िल धड़क उठती थी पहलू में किसी एहसास के धुँदले उफ़ुक़ से दिन निकल आता और अपने साथ क्या क्या क़ुर्मुज़ी किरनों में लेटे प्यार के सन्देस ले आता बहुत तकरीम के मौसम तह-ए-जाँ से उभरते थे दु'आओं से भरे सरसब्ज़ हाथों को यक़ीं था झिलमिलाते ख़्वाब ख़ुशबू-ख़ेज़ियों में फ़र्द होंगे और तक़र्रुब के किसी बेताब से पल को जगाएँगे तो सरपट भागती ये उम्र की हिरनी किसी ज़ंजीर-ए-वा'दा में कहीं रुक कर हमें चाहत से देखेगी कहाँ हैं हम किसी वीरान साहिल पर हमारी आरज़ू की कश्तियाँ औंधी पड़ी हैं और जैसे नींद के बे-ताब हलकोरे की ज़द में हैं अगर सूरज उन्हें उस नींद से आज़ाद करने के लिए किरनों को कोई इज़्न देता है तो वो आँखों पे अपने हाथ रख लेती हैं गहरी नागवारी से और अब तो वस्ल की मिशअल भी ख़्वाबीदा है सुलगन से तही है और उस के दश्त में हर सू बराबर रेशमी ख़्वाबों की नीली राख उड़ती है

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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सर-बसर इक उलझती पहेली हूँ और मेरी उलझन की सुलझन भी दुश्वार है तागा तागा मुझे कौन खोले मुझे रंग-दर-रंग और हर्फ़-दर-हर्फ़ परखे कहीं ऐसी चश्म-ए-फुसूँ-कार है तो बताओ ऐ मिरी बे-दिली के शिकस्ता किनारो मिरे ख़्वाब-ए-हस्ती के मौहूम रेशम को किस धूप की ज़र्द दीमक ने चाटा कौन सी ख़्वाहिशों की हरी टहनियों पर बरहना हवाओं के पंजे पड़े किस तलब की कथा उन के रास्तों में कहीं राह-ए-गुम-कर्दा रहरव की सूरत ख़जिल और कम-रख़्त रहने लगी मैं उदासी की गहरी सहेली हूँ तीखी पहेली हूँ और मेरी उलझन की सुलझन भी दुश्वार है मैं युगों से किसी दर्द की ख़ुश-हुनर उँगलियों की तुनुक-ताब पोरों से अपना पता पूछती हूँ बहुत कार-ए-उक़्दा-कुशाई कठिन है मगर मैं किसी रंज-ए-बरसर ख़याल-ए-जुनूँ-पेशा की आरज़ू कर रही हूँ ये गुंजल सुलझ जाए इस धुन में दिल के नशेबों को क्या क्या लहू कर रही हूँ

Mahnaz Anjum

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बहुत लड़ते हो तुम मैं भी तुनुक-ताबी में ख़ासी फ़र्द हूँ सो ख़ूब जमती है बहम अपनी मैं मुश्किल रास्तों की गर्द पलकों पर सँभाले आई हूँ तुम तक मिरे नज़दीक के हर मंतक़े में तुम भी अपने बालों की चाँदी पे इतराते परागंदा मिज़ाजी में गुँधे उखड़े हुए तारों की पगडंडी के दिल में घूमते हो मोहब्बत की भड़क लफ़्ज़ों में कम आँखों की हलचल में ज़ियादा ले के फिरती हूँ मिरे नोकीले लहजे की चुभन के उस तरफ़ दिल की बहुत ही रेशमी हद तक तुम्हारी आँख जाती है तअ'ल्लुक़ में रवादारी का नम जाने कहाँ से आता है और आ के हम दोनों की आवेज़िश की सब मुँह-ज़ोरियाँ ज़ंजीर करता है सुनो सब गुफ़्तुगू के सिलसिले मेरी तुम्हारी ख़ामुशी की भीग से सरसब्ज़ रहते हैं मिरी नज़्मों का मरकज़ आज के पल की सजल दुनिया में बस तुम हो तुम्हीं से बरसर-ए-पैकार हूँ और बे-तहाशा मुल्तफ़ित भी तुम तआरुज़ के गुदाज़ों में मुझे देखो मैं अपने दिल के तौसन को बहुत सरपट भगाती ख़ाक के तूफ़ाँ जगाती जिस गुलिस्ताँ की तमन्ना की डगर पर जा रही हूँ उस की हद पर तुम उस की हद पर तुम कहीं इक पेड़ के पहलू में दिल बन कर धड़कते हो कहीं फ़ितरत के पेच-ओ-ताब में ज़ंजीर हो और धूप की यलग़ार में मेरे लिए छाँव का इक ना-मुख़्ततिम एहसास बनते हो बहुत ही दूर से बस तुम ही मुझ को साफ़ सुनते हो

Mahnaz Anjum

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