बहुत लड़ते हो तुम मैं भी तुनुक-ताबी में ख़ासी फ़र्द हूँ सो ख़ूब जमती है बहम अपनी मैं मुश्किल रास्तों की गर्द पलकों पर सँभाले आई हूँ तुम तक मिरे नज़दीक के हर मंतक़े में तुम भी अपने बालों की चाँदी पे इतराते परागंदा मिज़ाजी में गुँधे उखड़े हुए तारों की पगडंडी के दिल में घूमते हो मोहब्बत की भड़क लफ़्ज़ों में कम आँखों की हलचल में ज़ियादा ले के फिरती हूँ मिरे नोकीले लहजे की चुभन के उस तरफ़ दिल की बहुत ही रेशमी हद तक तुम्हारी आँख जाती है तअ'ल्लुक़ में रवादारी का नम जाने कहाँ से आता है और आ के हम दोनों की आवेज़िश की सब मुँह-ज़ोरियाँ ज़ंजीर करता है सुनो सब गुफ़्तुगू के सिलसिले मेरी तुम्हारी ख़ामुशी की भीग से सरसब्ज़ रहते हैं मिरी नज़्मों का मरकज़ आज के पल की सजल दुनिया में बस तुम हो तुम्हीं से बरसर-ए-पैकार हूँ और बे-तहाशा मुल्तफ़ित भी तुम तआरुज़ के गुदाज़ों में मुझे देखो मैं अपने दिल के तौसन को बहुत सरपट भगाती ख़ाक के तूफ़ाँ जगाती जिस गुलिस्ताँ की तमन्ना की डगर पर जा रही हूँ उस की हद पर तुम उस की हद पर तुम कहीं इक पेड़ के पहलू में दिल बन कर धड़कते हो कहीं फ़ितरत के पेच-ओ-ताब में ज़ंजीर हो और धूप की यलग़ार में मेरे लिए छाँव का इक ना-मुख़्ततिम एहसास बनते हो बहुत ही दूर से बस तुम ही मुझ को साफ़ सुनते हो
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म
Tehzeeb Hafi
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कहाँ थे हम समुंदर सी किसी ख़्वाहिश के साहिल पर हँसती भीगती साअ'त की संगत में हँसी कितनी सजल थी आँख के हर कुंज में तितली की सूरत उड़ती फिरती थी रह-ए-शब में घना जंगल या कोई अजनबी रस्ता हमारे सामने आता तो उस दीवार के सीने से कितने दूर निकल आए लहू की ताल पर मंज़िल धड़क उठती थी पहलू में किसी एहसास के धुँदले उफ़ुक़ से दिन निकल आता और अपने साथ क्या क्या क़ुर्मुज़ी किरनों में लेटे प्यार के सन्देस ले आता बहुत तकरीम के मौसम तह-ए-जाँ से उभरते थे दु'आओं से भरे सरसब्ज़ हाथों को यक़ीं था झिलमिलाते ख़्वाब ख़ुशबू-ख़ेज़ियों में फ़र्द होंगे और तक़र्रुब के किसी बेताब से पल को जगाएँगे तो सरपट भागती ये उम्र की हिरनी किसी ज़ंजीर-ए-वा'दा में कहीं रुक कर हमें चाहत से देखेगी कहाँ हैं हम किसी वीरान साहिल पर हमारी आरज़ू की कश्तियाँ औंधी पड़ी हैं और जैसे नींद के बे-ताब हलकोरे की ज़द में हैं अगर सूरज उन्हें उस नींद से आज़ाद करने के लिए किरनों को कोई इज़्न देता है तो वो आँखों पे अपने हाथ रख लेती हैं गहरी नागवारी से और अब तो वस्ल की मिशअल भी ख़्वाबीदा है सुलगन से तही है और उस के दश्त में हर सू बराबर रेशमी ख़्वाबों की नीली राख उड़ती है
Mahnaz Anjum
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सर-बसर इक उलझती पहेली हूँ और मेरी उलझन की सुलझन भी दुश्वार है तागा तागा मुझे कौन खोले मुझे रंग-दर-रंग और हर्फ़-दर-हर्फ़ परखे कहीं ऐसी चश्म-ए-फुसूँ-कार है तो बताओ ऐ मिरी बे-दिली के शिकस्ता किनारो मिरे ख़्वाब-ए-हस्ती के मौहूम रेशम को किस धूप की ज़र्द दीमक ने चाटा कौन सी ख़्वाहिशों की हरी टहनियों पर बरहना हवाओं के पंजे पड़े किस तलब की कथा उन के रास्तों में कहीं राह-ए-गुम-कर्दा रहरव की सूरत ख़जिल और कम-रख़्त रहने लगी मैं उदासी की गहरी सहेली हूँ तीखी पहेली हूँ और मेरी उलझन की सुलझन भी दुश्वार है मैं युगों से किसी दर्द की ख़ुश-हुनर उँगलियों की तुनुक-ताब पोरों से अपना पता पूछती हूँ बहुत कार-ए-उक़्दा-कुशाई कठिन है मगर मैं किसी रंज-ए-बरसर ख़याल-ए-जुनूँ-पेशा की आरज़ू कर रही हूँ ये गुंजल सुलझ जाए इस धुन में दिल के नशेबों को क्या क्या लहू कर रही हूँ
Mahnaz Anjum
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