कहो कौन हो तुम अज़ल से खड़े हो निगाहों में हैरत के ख़े में लगाए उफ़ुक़ के घने पानियों की तरफ़ अपना चेहरा उठाए कहो कौन हो तुम बताओ बताओ कहीं तुम तिलिस्म-ए-समाअत से ना-आश्ना तो नहीं हो कहीं तुम वो दर तो नहीं हो जो सदियों की दस्तक से खुलता नहीं या क़दीमी शिकस्ता सी मेहराब हो जिस में कोई चराग़-ए-रिफ़ाक़त भी जलता नहीं धुँद-आलूद कोहना पहाड़ों में अंदर ही अंदर को जाता हुआ रास्ता तो नहीं हो वही रंग हो जिस से रंग और आमेज़ होता नहीं बे-नुमू झील जिस में परिंदा कोई अपने पर तक भिगोता नहीं कौन हो तुम बताओ बताओ कहीं मलबा-ए-वक़्त पर नीस्ती के अंधेरे में बैठे हुए रोज़-ए-अव्वल से उजड़े हुए बे-सहारा मकीं तो नहीं हो कहीं तुम फ़लक से परे या वरा-ए-ज़मीं तो नहीं हो! कहो कौन हो तुम बताओ बताओ कहीं तुम तकल्लुम के असरार से लफ़्ज़ के भेद से ना-बलद तो नहीं हो कहीं तुम अबद तो नहीं हो!!
Related Nazm
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
475 likes
"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
216 likes
"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
180 likes
"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
158 likes
"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
27 likes
More from Rafiq Sandelvi
कैसी मख़्लूक़ थी आग में उस का घर था अलाव की हिद्दत में मव्वाज लहरों को अपने बदन की मलाहत में महसूस करती थी लेकिन वो अंदर से अपने ही पानी से डरती थी कितने ही उश्शाक़ अपनी जवानी में पानी में इक सानिया उस को छूने की ख़्वाहिश में नीचे उमुक़ में बहुत नीचे उतरे मगर फिर न उभरे समुंदर ने मंथन से उन के वजूदों को ज़म कर लिया दूधिया झाग ने और कोहना नमक ने उन्हें अपनी तेज़ाबियत में घुलाया भड़कती हुई आग ने जज़्र-ओ-मद में लपेटा उन्हें सर से पा तक जलाया मगर कोई शो'लों से कुंदन सा सीपों से मोती सा बाहर न आया वो अब भी समुंदर में इठलाती सत्हों के नीले बहाव में अपने अलाव में क़स्र-ए-ज़मुर्रद में तन्हा भटकती है इक बा-आह आब-ओ-आतिश में रंगों की बारिश में अब भी वो ज़ुल्फ़ें झटकती है तो ऊद-ओ-अम्बर की महकार आती है क़तरात उड़ कर दहन कितने घोंगों का भरते हैं उस की झलक देखने के लिए आज भी लोग मरते हैं अब भी यहाँ कश्तियों आब-दोज़ों जहाज़ों के अर्शों पे उस की ही बातें हैं दुनिया के सय्याह सातों समुंदर के मल्लाह उस के न होने पे होने पे तकरार करते हैं उस की कशिश में बहुत दूर के पानियों में सफ़र के लिए ख़ुद को तयार करते हैं मैं भी यहाँ मुज़्तरिब और बेहाल ख़स्ता-ओ-पारीना तख़्ते पे बहता हुआ एक ख़ुफ़्ता जज़ीरे के नज़दीक क्या देखता हूँ कि वो एक पत्थर पे बैठी है पानी पे तारी है इक कैफ़ सा चाँदनी की लपक और हवा की मधुर लय पे मछली सा नीचे का धड़ उस का शफ़्फ़ाफ़ पानी में हिलता है अबरेशमीं नूर में अक्स-ए-सीमाब सा उस के गलना चेहरे पे खिलता है अब देखिए मुझ सा मबहूत आशिक़ उसे अपनी आग़ोश में कैसे भरता है ग़र्क़ाब होता है मरता है
Rafiq Sandelvi
0 likes
अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था शजर जड़ों के बग़ैर ही उग रहे थे ख़े में बग़ैर चोबों के और तनाबों के आसरे के ज़मीं पे इस्तादा हो रहे थे चराग़ लौ के बग़ैर ही जल रहे थे कूज़े बग़ैर मिट्टी के चाक पर ढल रहे थे दरिया बग़ैर पानी के बह रहे थे सभी दुआएँ गिरफ़्ता-पा थीं रुकी हुई चीज़ें क़ाफ़िला थीं पहाड़ बारिश के एक क़तरे से घुल रहे थे बग़ैर चाबी के क़ुफ़्ल अज़-ख़ुद ही खुल रहे थे निडर पियादा थे और बुज़दिल असील घोड़ों पे बैठ कर जंग लड़ रहे थे गुनाहगारों ने सर से पा तक बदन को बुर्राक़ चादरों से ढका हुआ था वली की नंगी कमर छुपाने को कोई कपड़ा नहीं बचा था अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था
Rafiq Sandelvi
0 likes
उसी आग में मुझे झोंक दो वही आग जिस ने बुलाया था मुझे एक दिन दम-ए-शोलगी दम-ए-शोलगी मिरा इंतिज़ार किया बहुत कई ख़ुश्क लकड़ियों शाख़चों, के हिसार में जहाँ बर्ग-ओ-बार का ढेर था दम-ए-शोलगी मुझे एक पत्ते ने ये कहा था घमंड से इधर आ के देख कि इस तपीदा ख़ुमार में हमीं हम हैं लकड़ियों शाख़चों के हिसार में यहाँ और कौन वजूद है यहाँ सिर्फ़ हम हैं रुके हुए कहीं आधे और कहीं पूरे पूरे जले हुए दम-ए-शोलगी हमें जो मसर्रत-ए-रक़्स थी तुम्हें क्या ख़बर अगर आग तुम को अज़ीज़ थी तो ये जिस्म कौन सी चीज़ थी जिसे तुम कभी न जला सके वो जो राज़ था पस-ए-शोलगी नहीं पा सके! सो कहा था मैं ने ये एक अध-जले बर्ग से मुझे दुख बहुत है कि आग ने मिरा इंतिज़ार किया बहुत मगर उन दिनों किसी और तर्ज़ की आग में मिरा जिस्म जलने की आरज़ू में असीर था मगर उन दिनों मैं न जल सका मैं न जून अपनी बदल सका मगर अब वो आग कि जिस में तुम ने पनाह ली जहाँ तुम जले जहाँ तुम अजीब सी लज़्ज़तों से गले मिले उसी आग में मुझे झोंक दो
Rafiq Sandelvi
0 likes
तुम नहीं जानते इस धुँद का क़िस्सा क्या है धुँद जिस में कई ज़ंजीरें हैं एक ज़ंजीर किसी फूल किसी शब्द किसी ताइर की एक ज़ंजीर किसी रंग किसी बर्क़ किसी पानी की ज़ुल्फ़ ओ रुख़्सार लब ओ चश्म की पेशानी की तुम नहीं जानते इस धुँद का ज़ंजीरों से रिश्ता क्या है ये फ़ुसूँ-कार तमाशा क्या है! तुम ने बस धुँद के उस पार से तीरों के निशाने बाँधे और इधर मैं ने तुम्हारे लिए झंकार में दिल रख दिया कड़ियों में ज़माने बाँधे जाओ अब रोते रहो वक़्त के महबस में ख़ुद अपने ही गले से लग कर तुम मिरे सीना-ए-सद-रंग के हक़दार नहीं अब तुम्हारे मिरे माबैन किसी दीद का ना-दीद का असरार नहीं!!
Rafiq Sandelvi
0 likes
ख़्वाब मज़दूर है रात दिन सर पे भारी तग़ारी लिए साँस की बाँस की हाँफती-काँपती सीढ़ियों पर उतरता है चढ़ता है रू-पोश मेमार के हुक्म पर एक ला-शकल नक़्शे पे उठती हुई ऊपर उठती हुई गोल दीवार के ख़िश्त-दर-ख़िश्त चक्कर में महसूर है ख़्वाब मज़दूर है! इक मशक़्क़त-ज़दा आदमी की तरह मैं हक़ीक़त की दुनिया में या ख़्वाब में रोज़ मामूल के काम करता हूँ कुछ देर आराम करता हूँ काँटों भरी खाट में प्यास के जाम पीता हूँ और सोज़न-ए-हिज्र से अपनी उधड़ी हुई तन की पोशाक सीता हूँ जीता हूँ कैसी अनोखी हक़ीक़त है कैसा अजब ख़्वाब है इक मशक़्क़त-ज़दा आदमी की तरह अपने हिस्से की बजरी उठाने पे मामूर है ख़्वाब मज़दूर है!!
Rafiq Sandelvi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Rafiq Sandelvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Rafiq Sandelvi's nazm.







