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"कशमकश" तुम्हीं बताओ हम क्या करें अब तुम्हीं बताओ अब क्या अमल होगा तुम्हीं ने तो हम को भँवर में फंँसाया लहरों के तुम ने हवाले किया है बहुत तेज़ तूफ़ांँ थपेड़े बहुत हैं कश्ती हमारी लगे है कि मानो ये अब डूबती है ये अब डूबती है

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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"निफ़ाक़" आईना जो भी कहता है झूठ को सच नहीं करता आईने के हज़ार टुकड़े हों फिर भी मंज़र वही रहता आईना गर मुअय्यन हो सबके लिए बराबर हो एक को मर्तबे मनसब एक को जेल की दीवारें हों

Irfan Ahmed Khan

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"15 अगस्त" ये वही दिन है जब अहद उठाया हम ने ख़ून से सींच के जो पाई थी हम ने आज़ादी साथ मिल सच्चे माने में उसे अपना बनाएँगे मैं तुम्हारे, तुम मेरे लिए आवाज़ उठाओगे आज के बा'द गद्दीनशीं न हुक्मरां होंगे अब कोई छोटा और न कोई बड़ा होगा अब कोई सिख, हिन्दू न मुसलमां होगा अब न भूख और प्यास से मौतें होंगी अब न कोई अमीर कोई ग़ुलाम होगा फिर न जाने ये किस राह चले आए हम ये वो हिंदुस्तान नहीं जिस के लिए क़ुर्बानी दीं आओ सब मिल आज ये अहद करें हाथ में हाथ लिए फिर से वही अपनी नस्लों के बेहतर कल के लिए फिर से सपनों का हिंदुस्तान बनाना है हमें

Irfan Ahmed Khan

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"ग़लती" कहते थे वो के प्यार दिलोजान से किया मीलों और बरसों के फासले तमाम करने की क़स में भी खाईं और वा'दा भी लिया लेकिन ये क्या अदा थी हम जान ना सके वक़्ते विसाल आया तो बोल वो पड़े ग़लती थी हम सेे हो गई अब सुधार लें ज़रा

Irfan Ahmed Khan

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"तो क्या बात होती" कभी सोचता हूँ ये क्यूँँकर हुआ अगर ये न होता तो क्या बात होती ये अफ़साना हम ने जो मिल के लिखा था ये ऐसा ही होता या कुछ और पेंच होते ये किरदार जो हैं क्या उस वक़्त होते अगर हम न मिलते तो क्या हम ही रहते आँखों में सागर दिलों में कसक या होंठों पे जबरन की मुस्कान होती कहानी हमारी कहाँ ले के आई नज़रें चुराना अभी तक है जारी ज़माने से नज़रें चुराते थे तब हम के न पढ़ ले इन में मुहब्बत तुम्हारी फिर तुम से नज़रें चुराने लगे हम के ना देख पाओ समुंदर हमारे अब ख़ुदस नज़रें चुराने लगे हैं कई यादें अक्सर दामन में गिरतीं मुझे घेर लेतीं सवालों के नेज़े दिल चाक करते मैं चुप-चाप रहता कहता भी क्या मैं कहता तो कहता सवालों की गठरी मेरे पास भी है जवाबों के मौसम मगर लद चले हैं इसी कशमकश में मैं फिर सोचता हूँ अगर ये न होता तो क्या बात होती

Irfan Ahmed Khan

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"मेनिनजाइटिस" घर से निकले थे बहुत आस लिए थे जो घर के चराग़ कहीं मद्धम थे खिलखिलाहट वो हमेशा की कहीं ग़ुम थी चमक नन्ही सी आँखों की बुझी जाती थी बदन जो फूल से थे तपते थे ज्यूँ अंगारे सीने नाज़ुक तो थे मगर चलते जैसे हो धौंकनी चेहरे जो रौशनी फैलाते थे पड़े स्याह से थे ज़िन्दगी जिन की अभी ठीक से शुरू भी न हुई ज़िन्दगी वो जिसे इस मुल्क की जाँ होना था ज़िन्दगी जिन को अभी ज़िन्दगी को जीना था जिन को जाने कौन से मराहिल से गुज़रना था वो मासूम से बच्चे जो माँ बाप की दुनिया थे वो खज़ाना जिस के लिए मौत से भी लड़ जाते बदले में जिन के चाँद तारे भी लगे मिट्टी से वो अनमोल खज़ाने ज़ालिमों ने लूट लिए

Irfan Ahmed Khan

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