"ग़लती" कहते थे वो के प्यार दिलोजान से किया मीलों और बरसों के फासले तमाम करने की क़स में भी खाईं और वा'दा भी लिया लेकिन ये क्या अदा थी हम जान ना सके वक़्ते विसाल आया तो बोल वो पड़े ग़लती थी हम सेे हो गई अब सुधार लें ज़रा
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"कशमकश" तुम्हीं बताओ हम क्या करें अब तुम्हीं बताओ अब क्या अमल होगा तुम्हीं ने तो हम को भँवर में फंँसाया लहरों के तुम ने हवाले किया है बहुत तेज़ तूफ़ांँ थपेड़े बहुत हैं कश्ती हमारी लगे है कि मानो ये अब डूबती है ये अब डूबती है
Irfan Ahmed Khan
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"निफ़ाक़" आईना जो भी कहता है झूठ को सच नहीं करता आईने के हज़ार टुकड़े हों फिर भी मंज़र वही रहता आईना गर मुअय्यन हो सबके लिए बराबर हो एक को मर्तबे मनसब एक को जेल की दीवारें हों
Irfan Ahmed Khan
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"तो क्या बात होती" कभी सोचता हूँ ये क्यूँँकर हुआ अगर ये न होता तो क्या बात होती ये अफ़साना हम ने जो मिल के लिखा था ये ऐसा ही होता या कुछ और पेंच होते ये किरदार जो हैं क्या उस वक़्त होते अगर हम न मिलते तो क्या हम ही रहते आँखों में सागर दिलों में कसक या होंठों पे जबरन की मुस्कान होती कहानी हमारी कहाँ ले के आई नज़रें चुराना अभी तक है जारी ज़माने से नज़रें चुराते थे तब हम के न पढ़ ले इन में मुहब्बत तुम्हारी फिर तुम से नज़रें चुराने लगे हम के ना देख पाओ समुंदर हमारे अब ख़ुदस नज़रें चुराने लगे हैं कई यादें अक्सर दामन में गिरतीं मुझे घेर लेतीं सवालों के नेज़े दिल चाक करते मैं चुप-चाप रहता कहता भी क्या मैं कहता तो कहता सवालों की गठरी मेरे पास भी है जवाबों के मौसम मगर लद चले हैं इसी कशमकश में मैं फिर सोचता हूँ अगर ये न होता तो क्या बात होती
Irfan Ahmed Khan
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"ख़ैर ये तो होना था" जो भी है सब तुम्हारा है हम नवां हम ने छोड़ दी दुनिया जबसे दिल ने धड़कना बंद किया हम ने भी रुख़ हमारा मोड़ लिया जो तुम्हारी ज़बाँ का लहजा है उस में अब वो लरज़ नहीं होती जुस्तजु कभी की थी साथ जीने की और मरने की ये कहाँ किस ने सोचा था के मय्यसर न एक नज़र होगी ख़ैर इक न इक दिन ये तो होना था पेड़ भी जब बड़ा हो कर आसमानों से बात करता है उस का साया भी आँगन को छोड़ देता है
Irfan Ahmed Khan
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"सफ़र" रेल के डिब्बे की खिड़की थी मुझे कुछ कह रही यादें उन सारे सफ़र की मानो ताज़ा कर रही सैकड़ों सपने हजारों उम्मीदें लिए जब कि मैं बैग टांगे जाने कितने ही मराहिल से गुज़रा किया हर कोई भीड़ का हिस्सा तो है है मगर तन्हा यहाँ हर किसी के पास कहने को इक कहानी भी है कोई निकला है घर से सफ़र को उम्मीदें लिए फिर वहीं कुछ आँखों में नाउम्मीदी का पानी भी है
Irfan Ahmed Khan
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