nazmKuch Alfaaz

चार सू इक उदास मंज़र है ज़ीस्त है जैसे एक वीराना जाने क्यूँ फट रहा है आज दिमाग़ हो न जाऊँ कहीं मैं दीवाना दोस्त कहते हैं सैर कर आएँ मौज कर आएँ दिल को बहलाएँ कोई दिलबर न दिल-नशीं कोई कोई गुल-रू न मह-जबीं कोई जी मचल जाए जिस से मिलने को हाए इस दहर में नहीं कोई चाँद तारों की रौशनी बे-सूद सैर-ए-दरिया की बात भी बे-सूद गुल्सिताँ की कली कली बे-सूद हम-नशीनों की दिल-लगी बे-सूद दिल को लगता है आज रह रह कर जैसे है मेरी ज़िंदगी बे-सूद माह और साल कितने बीत गए बे-सबब बे-हुसूल बे-मंशा हाए लेकिन ये एक इक लम्हा कुछ भी कीजे गुज़र नहीं पाता चुभ रहा है जिगर में इक काँटा काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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मुश्किल और आसानी में से एक अगर चुनना हो तो हम आसानी ही चुनते हैं मुश्किल बात गले के एवज़ पेट के पास से आती है उस को बाहर आते आते एक ज़माना लगता है मुश्किल है ये कह पाना के "यार, मुझे ग़म खाता है जैसे जैसे रात उतरती है तो रोना आता है" हो सालों का रिश्ता चाहे ये भी कहना मुश्किल है "जब तक ज़ख़्म नहीं भरता ये तू तो हाल सुनेगा ना ? तू तो बहुत क़रीब है मेरे तू तो मदद करेगा ना ?" बस इतनी सी बात बताने में सदियां लग जाती हैं आख़िर में हम बहुत सोच कर फिर आसानी चुनते है कह देते हैं, "हाँ मैं बढ़िया, मुझ को क्या ही होना है" वो भी 'बढ़िया' कह देता है बात ख़तम हो जाती है

Siddharth Saaz

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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ग़म-ए-हयात के नग़्मों का मैं मुग़न्नी हूँ ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त का हूँ मैं शैदाई ये जज़्बा जो दिल-ए-बेताब से फ़ुज़ूँ-तर है कहीं से गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर उड़ा लाई नज़र को देता है ये रौशनी तजस्सुस की ये ग़म बनाता है दिल को दिल-ए-तमन्नाई ये राज़-हा-ए-तग-ओ-दौ को फ़ाश करता है ये राह-रौ को सिखाता है जादा-पैमाई इसी से गर्मी-ए-बज़्म-ए-हयात बाक़ी है यही है दहर के हर इंक़लाब का बानी कहीं न डस ले ये तन्हाई-ए-हयात मुझे तू ग़म से सीख ले आदाब-ए-बज़्म-आराई न कर हिसार-ए-मन-ओ-तू में अपना ग़म महदूद कि हो ये आम तो फिर ज़िंदगी है आफ़ाक़ी

Daud Ghazi

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कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में सब्र से बेगाना इक समुंदर है उभरता दबता मचलता बिफर के बढ़ता हुआ कभी उतरता हुआ और उतर के चढ़ता हुआ तमाशा सई-ए-जुनूँ-ख़ेज़ का दिखाता हुआ तिलिस्म-ए-फ़िक्र से अपनी तरफ़ बुलाता हुआ कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक हुजूम-ए-जिगर-फ़िगार लिए दिल-ओ-दिमाग़ में सौ उलझनों का बार लिए नफ़स नफ़स में ग़म-ए-ज़ीस्त के शरार लिए ख़याल-ओ-फ़िक्र-ओ-तजस्सुस का ख़लफ़शार लिए यक़ीं का जोश लिए वहम-ए-शो'ला-बार लिए कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक अजब दिल-फ़रेब मंज़र है वहाँ पे दूर ज़रा दूर कुछ ज़रा आगे उफ़ुक़ से हाथ मिलाता हुआ समुंदर है वहाँ पे है कोई कमतर न कोई बेहतर है मदार-ए-ज़ीस्त वहाँ तो बराबरी पर है वहाँ न है कोई ज़ुल्मत न कोई मायूसी हर एक ज़र्रा वहाँ रौशन-ओ-मुनव्वर है पहुँच गया है जो उस अंजुमन में ख़ुश-तर है मैं सोचता हूँ कि एक जस्त में पहुँच जाऊँ उस एक जस्त में जो फ़ासलों की दुश्मन है वहाँ हयात जहाँ क़हर है न उलझन है मगर ठहर ज़रा ऐ दिल ये सोच लूँ पहले पहुँच गया जो मैं उस सरहद-ए-निगाह तलक वहाँ पहुँच के अगर आह ऐसा हो जाए नज़र के सामने जो कुछ था महज़ धोका था वो इक हसीन तसव्वुर था जो कि देखा था वो हद जहाँ कि समुंदर उफ़ुक़ को छूता था कुछ और बढ़ गई आगे जो सरहद-ए-इम्काँ मदार-ए-ज़ीस्त भला फिर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर न मिल सकेगी कभी मगर ये ज़ीस्त तो फिर भी गुज़ारनी होगी लगा दूँ जस्त कि ये सरहद-ए-निगाह बहुत हसीन लगती है कल क्या हो ये किसे मालूम कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ यक़ीं का जोश लिए अज़्म का ख़ुमार लिए जुनून-ए-शौक़ लिए फ़िक्र-ए-होशियार लिए

Daud Ghazi

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जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत मिट्टी आग हवा और पानी दुश्मन सारे बन गए यार उस की आयत की तफ़्सीरें अब इतनी हैं कि अक़्ल है दंग लेकिन इक ऐसी है बात जिस से कि बनती है बात इन बे-गिनती तफ़सीरों की हर इक इंसाँ इंसाँ है जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत गिरने लगीं दीवारें खुलने लगे दरवाज़े जिन लोगों ने दीवारें बनवाई हैं भूल गए तहज़ीब की आयत

Daud Ghazi

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इक नए दौर का आग़ाज़ हुआ दर-ए-आशुफ़्ता-सरी बाज़ हुआ ना-शकेबाई की चलती है हवा बे-यक़ीनी की उभरती है सदा आए मंडलाते हुए अब्र-ए-शुऊ'र लिए हमराह ख़यालात-ए-जसूर मुंतज़िर शौक़ है बेचैन निढाल जाने कब मौसम-ए-बाराँ आए हाए तब्दीली-ए-मौसम की उमीद रंग लाए है ब-तदरीज जुनूँ टूटने वाला है हर एक फ़ुसूँ हाँ ख़ुदाओं की ख़ुदाई का फ़ुसूँ कज-दिमाग़ों की बड़ाई का फ़ुसूँ आ नए दौर तुझे चूम तो लूँ

Daud Ghazi

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ये तहज़ीब आख़िर बनाई है किस ने ज़माने की इज़्ज़त बढ़ाई है किस ने बना कर बदलने का मुख़्तार है कौन हयात-ए-मुसलसल का फ़नकार है कौन मशीनों में किस का लहू चल रहा है ये किस के लहू पर जहाँ पल रहा है बता दो ख़ुदा के लिए अब बता दो हक़ीक़त के चेहरे से पर्दा उठा दो

Daud Ghazi

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