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जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत मिट्टी आग हवा और पानी दुश्मन सारे बन गए यार उस की आयत की तफ़्सीरें अब इतनी हैं कि अक़्ल है दंग लेकिन इक ऐसी है बात जिस से कि बनती है बात इन बे-गिनती तफ़सीरों की हर इक इंसाँ इंसाँ है जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत गिरने लगीं दीवारें खुलने लगे दरवाज़े जिन लोगों ने दीवारें बनवाई हैं भूल गए तहज़ीब की आयत

Daud Ghazi0 Likes

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है

ZafarAli Memon

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ग़म-ए-हयात के नग़्मों का मैं मुग़न्नी हूँ ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त का हूँ मैं शैदाई ये जज़्बा जो दिल-ए-बेताब से फ़ुज़ूँ-तर है कहीं से गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर उड़ा लाई नज़र को देता है ये रौशनी तजस्सुस की ये ग़म बनाता है दिल को दिल-ए-तमन्नाई ये राज़-हा-ए-तग-ओ-दौ को फ़ाश करता है ये राह-रौ को सिखाता है जादा-पैमाई इसी से गर्मी-ए-बज़्म-ए-हयात बाक़ी है यही है दहर के हर इंक़लाब का बानी कहीं न डस ले ये तन्हाई-ए-हयात मुझे तू ग़म से सीख ले आदाब-ए-बज़्म-आराई न कर हिसार-ए-मन-ओ-तू में अपना ग़म महदूद कि हो ये आम तो फिर ज़िंदगी है आफ़ाक़ी

Daud Ghazi

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चार सू इक उदास मंज़र है ज़ीस्त है जैसे एक वीराना जाने क्यूँ फट रहा है आज दिमाग़ हो न जाऊँ कहीं मैं दीवाना दोस्त कहते हैं सैर कर आएँ मौज कर आएँ दिल को बहलाएँ कोई दिलबर न दिल-नशीं कोई कोई गुल-रू न मह-जबीं कोई जी मचल जाए जिस से मिलने को हाए इस दहर में नहीं कोई चाँद तारों की रौशनी बे-सूद सैर-ए-दरिया की बात भी बे-सूद गुल्सिताँ की कली कली बे-सूद हम-नशीनों की दिल-लगी बे-सूद दिल को लगता है आज रह रह कर जैसे है मेरी ज़िंदगी बे-सूद माह और साल कितने बीत गए बे-सबब बे-हुसूल बे-मंशा हाए लेकिन ये एक इक लम्हा कुछ भी कीजे गुज़र नहीं पाता चुभ रहा है जिगर में इक काँटा काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता

Daud Ghazi

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कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में सब्र से बेगाना इक समुंदर है उभरता दबता मचलता बिफर के बढ़ता हुआ कभी उतरता हुआ और उतर के चढ़ता हुआ तमाशा सई-ए-जुनूँ-ख़ेज़ का दिखाता हुआ तिलिस्म-ए-फ़िक्र से अपनी तरफ़ बुलाता हुआ कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक हुजूम-ए-जिगर-फ़िगार लिए दिल-ओ-दिमाग़ में सौ उलझनों का बार लिए नफ़स नफ़स में ग़म-ए-ज़ीस्त के शरार लिए ख़याल-ओ-फ़िक्र-ओ-तजस्सुस का ख़लफ़शार लिए यक़ीं का जोश लिए वहम-ए-शो'ला-बार लिए कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक अजब दिल-फ़रेब मंज़र है वहाँ पे दूर ज़रा दूर कुछ ज़रा आगे उफ़ुक़ से हाथ मिलाता हुआ समुंदर है वहाँ पे है कोई कमतर न कोई बेहतर है मदार-ए-ज़ीस्त वहाँ तो बराबरी पर है वहाँ न है कोई ज़ुल्मत न कोई मायूसी हर एक ज़र्रा वहाँ रौशन-ओ-मुनव्वर है पहुँच गया है जो उस अंजुमन में ख़ुश-तर है मैं सोचता हूँ कि एक जस्त में पहुँच जाऊँ उस एक जस्त में जो फ़ासलों की दुश्मन है वहाँ हयात जहाँ क़हर है न उलझन है मगर ठहर ज़रा ऐ दिल ये सोच लूँ पहले पहुँच गया जो मैं उस सरहद-ए-निगाह तलक वहाँ पहुँच के अगर आह ऐसा हो जाए नज़र के सामने जो कुछ था महज़ धोका था वो इक हसीन तसव्वुर था जो कि देखा था वो हद जहाँ कि समुंदर उफ़ुक़ को छूता था कुछ और बढ़ गई आगे जो सरहद-ए-इम्काँ मदार-ए-ज़ीस्त भला फिर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर न मिल सकेगी कभी मगर ये ज़ीस्त तो फिर भी गुज़ारनी होगी लगा दूँ जस्त कि ये सरहद-ए-निगाह बहुत हसीन लगती है कल क्या हो ये किसे मालूम कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ यक़ीं का जोश लिए अज़्म का ख़ुमार लिए जुनून-ए-शौक़ लिए फ़िक्र-ए-होशियार लिए

Daud Ghazi

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ये तहज़ीब आख़िर बनाई है किस ने ज़माने की इज़्ज़त बढ़ाई है किस ने बना कर बदलने का मुख़्तार है कौन हयात-ए-मुसलसल का फ़नकार है कौन मशीनों में किस का लहू चल रहा है ये किस के लहू पर जहाँ पल रहा है बता दो ख़ुदा के लिए अब बता दो हक़ीक़त के चेहरे से पर्दा उठा दो

Daud Ghazi

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इक लाश को इक चौराहे पर कुछ लोग खड़े थे घेरे हुए लगता था तमाशा हो जैसे सब अपनी अपनी कहते थे मुर्दे का पता बतलाने लगे उफ़ क़ौम का इक में'मार है ये सब झूट बड़ा अय्यार है ये रहबर है ये इक सालार है ये बकवास कि इक ग़द्दार है ये अफ़्सोस कि इक फ़नकार है ये क्या ख़ूब अरे बे-कार है ये नागाह कहीं से इक बुढ़िया लाठी के सहारे आगे बढ़ी और लाश पे गिर कर कहने लगी लोगों ये मेरा बेटा है ये मेरे जिगर का टुकड़ा है ये मेरी आँख का तारा है फ़ाक़ों ने दिया है इस को जनम ये सुब्ह-ए-अलम ये शाम-ए-सितम

Daud Ghazi

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