इक लाश को इक चौराहे पर कुछ लोग खड़े थे घेरे हुए लगता था तमाशा हो जैसे सब अपनी अपनी कहते थे मुर्दे का पता बतलाने लगे उफ़ क़ौम का इक में'मार है ये सब झूट बड़ा अय्यार है ये रहबर है ये इक सालार है ये बकवास कि इक ग़द्दार है ये अफ़्सोस कि इक फ़नकार है ये क्या ख़ूब अरे बे-कार है ये नागाह कहीं से इक बुढ़िया लाठी के सहारे आगे बढ़ी और लाश पे गिर कर कहने लगी लोगों ये मेरा बेटा है ये मेरे जिगर का टुकड़ा है ये मेरी आँख का तारा है फ़ाक़ों ने दिया है इस को जनम ये सुब्ह-ए-अलम ये शाम-ए-सितम
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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ग़म-ए-हयात के नग़्मों का मैं मुग़न्नी हूँ ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त का हूँ मैं शैदाई ये जज़्बा जो दिल-ए-बेताब से फ़ुज़ूँ-तर है कहीं से गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर उड़ा लाई नज़र को देता है ये रौशनी तजस्सुस की ये ग़म बनाता है दिल को दिल-ए-तमन्नाई ये राज़-हा-ए-तग-ओ-दौ को फ़ाश करता है ये राह-रौ को सिखाता है जादा-पैमाई इसी से गर्मी-ए-बज़्म-ए-हयात बाक़ी है यही है दहर के हर इंक़लाब का बानी कहीं न डस ले ये तन्हाई-ए-हयात मुझे तू ग़म से सीख ले आदाब-ए-बज़्म-आराई न कर हिसार-ए-मन-ओ-तू में अपना ग़म महदूद कि हो ये आम तो फिर ज़िंदगी है आफ़ाक़ी
Daud Ghazi
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जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत मिट्टी आग हवा और पानी दुश्मन सारे बन गए यार उस की आयत की तफ़्सीरें अब इतनी हैं कि अक़्ल है दंग लेकिन इक ऐसी है बात जिस से कि बनती है बात इन बे-गिनती तफ़सीरों की हर इक इंसाँ इंसाँ है जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत गिरने लगीं दीवारें खुलने लगे दरवाज़े जिन लोगों ने दीवारें बनवाई हैं भूल गए तहज़ीब की आयत
Daud Ghazi
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चार सू इक उदास मंज़र है ज़ीस्त है जैसे एक वीराना जाने क्यूँ फट रहा है आज दिमाग़ हो न जाऊँ कहीं मैं दीवाना दोस्त कहते हैं सैर कर आएँ मौज कर आएँ दिल को बहलाएँ कोई दिलबर न दिल-नशीं कोई कोई गुल-रू न मह-जबीं कोई जी मचल जाए जिस से मिलने को हाए इस दहर में नहीं कोई चाँद तारों की रौशनी बे-सूद सैर-ए-दरिया की बात भी बे-सूद गुल्सिताँ की कली कली बे-सूद हम-नशीनों की दिल-लगी बे-सूद दिल को लगता है आज रह रह कर जैसे है मेरी ज़िंदगी बे-सूद माह और साल कितने बीत गए बे-सबब बे-हुसूल बे-मंशा हाए लेकिन ये एक इक लम्हा कुछ भी कीजे गुज़र नहीं पाता चुभ रहा है जिगर में इक काँटा काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता
Daud Ghazi
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मैं तो हैरान हूँ किस तरह कटे राह-ए-हयात इक नया मोड़ बहर-गाम उभर आता है सर-ए-तारीकी-ए-शब खुल जो गया आख़िर-ए-शब फिर नया राज़ ब-हर-सुब्ह निखर आता है जाँचता फिरता हूँ माज़ी के खंडर हसरत से देखता फिरता हूँ हर नक़्श-ए-हसीं हैरत से सोचता फिरता हूँ कौन आया था कब आया था उस जगह साथ लिए काविश-ए-तकमील-ए-हयात ढूँढ़ता फिरता हूँ शायद कि ये माज़ी के नुक़ूश कुछ पता दें कि शब रोज़ बताऊँ क्यूँँकर ग़म के क़ाबिल मैं ख़ुद अपने को बनाऊँ क्यूँँकर नित नए ग़म के गिराँ-बार उठाऊँ क्यूँँकर दूर इक हुस्न का पंछी सा नज़र आता है क़ैद कर लूँ उसे शायद कि बहल जाए ये दिल दिल की आवाज़ थकी-हारी फ़सुर्दा बोझल जिस ने तख़ईल की दुनिया में मचा दी हलचल मैं कोई तिफ़्ल नहीं हूँ कि बहल जाऊँगा न करो क़ैद मुझे हुस्न के बहलाओं में इक नज़र झाँक के देखो मिरी आशाओं में तुम ही ख़ुद शर्म से हो जाओगे पानी पानी एक बेबस को मगर देते हो क्यूँँ ऐसा फ़रेब अब मैं किस रह में ग़म-ए-दिल का मुदावा ढूँडूँ अन-गिनत फ़िक्र की राहें नज़र आती हैं मुझे इक नया मोड़ ब-हर-गाम उभर आता है और हर मोड़ नज़र आता है कितना दिलकश जन्नत-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र चाँद-सितारों का जहाँ जैसे अंदाज़-ए-सबा जैसे बहारों का जहाँ जैसे जादू भरे नैनों के निगारों का जहाँ जैसे मा'सूम निगाहों में इशारों का जहाँ जैसे फूलों भरी शाख़ों पे शरारों का जहाँ उफ़ मैं किस रह में ग़म-ए-दिल का मुदावा ढूँडूँ किस तरफ़ जाऊँ किसे दिल से लगाए रक्खूँ ज़िंदगी भर कि फिर उस ज़ीस्त को जन्नत समझूँ हर-दम एक एक नफ़स चाहे जिधर जा के रहूँ कौन इस ज़ीस्त को कर सकता है महदूद-ओ-मुक़ीम उस की एक एक अदा बर्क़-सिफ़त शो'ला-नफ़स जी रहा हूँ नई उम्मीद लिए हर इक पल ग़म लिए दिल में कि मैं क्या न बना क्यूँँ न बना ख़ुश हूँ हर ग़म से कि इदराक की सौग़ात है ये सोच लेता हूँ कि मैं क्या हूँ यही क्या कम है
Daud Ghazi
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कारवाँ बढ़ता रहा बढ़ता रहा पै-ब-पै जादा-ब-जादा अपनी मंज़िल की तरफ़ सफ़-ब-सफ़ शाना-ब-शाना रहरवों को ले चला जेहद-ए-पैहम का हर इक इक़दाम हासिल की तरफ़ फिर न जाने क्या हुआ कैसी चली उल्टी हवा दफ़्अ'तन क़दमों के नग़्में सर्द से होने लगे थक गया अज़्म-ए-सफ़र उम्मीद का दम घुट गया शौक़ के सरगर्म जज़्बे राह में खोने लगे कारवाँ वालो दिलाए तुम को कौन इस का यक़ीं जिस की ख़्वाहिश में बढ़े हो तुम वो मंज़िल है क़रीं
Daud Ghazi
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