ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया किस को गर्दिश में मिलाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया रोज़ कटते हैं हज़ारों ही शजर हरियाले आदमी रोक न पाया वो इरादे काले सिर्फ़ पैसों को कमाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया कितने नादान यहाँ लोग हुए जाते हैं दूध पी कर के वो गउओं का उन्हें खाते हैं अपनी माँ तक को नशाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया कारख़ानों के धुँए घोंट रहे दम पे दम सड़ते मलबों से पटी नदियाँ हुईं हैं कम-कम मौत सीने से लगाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया मूल्य गिरते ही चले जाते हैं नैतिकता के माँ-पिता बंधु बहिन बढ़ती अमानुसता के सब की अस्मत ही लुटाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया अब तो फ़ैशन का ज़माना ये बताते हैं लोग मरमरी जिस्म खुलेआम दिखाते हैं लोग तन से कपड़ों को हटाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"ख़ौफ़ का फेरा" सारी दुनिया में अँधेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे फ़त्ह बंदूक ने पाई है सर-ए-नौ अब तो ख़ौफ़ ने सत्ह बनायी है सर-ए-नौ अब तो घर में मौतों का बसेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे मैं ने किंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे
Nityanand Vajpayee
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"आईना" दर्द सीने में उभरता है वो कल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मेरे दिल के किसी कोने में हुई है हलचल तीर मारा है अगर तू ने तो फिर अब के सँभल तेरी आँखों का वो नमकीन सा छल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मैं समुंदर की तरह ख़ुद में छुपा लूँगा तुझे सिर्फ़ सीने से नहीं दिल से लगा लूँगा तुझे तेरे कमसिन से बदन को मैं कँवल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा बे-ज़बाँ इश्क़ की ख़ामोश गवाही की क़सम हुस्न की मौज ने बरपाई तबाही की क़सम नौनिहालों के दिलों में जो ख़लल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा तुम समझते हो कि मैं कुछ तो भरम रक्खूँगा सच बताने में भी कुछ दीन-धरम रक्खूँगा बातों-बातों में कोई चुभती मसल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा
Nityanand Vajpayee
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अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस सिर्फ़ मजदूर दिवस भर न बताओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको कितने मजबूर हुए आज ये भूखों मरते जो कि कर सकते नहीं काम ये वो भी करते भुखमरी फैल रही इस सेे बचाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको अब किसानों की सुनों माँगे सभी वाजिब हैं वत्न-ए-शागिर्द यही हैं व यही तालिब हैं अपनी गद्दी के लिए अब न रुलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको देश में लाख युवा फिरते हैं रोज़ी ख़ातिर लूटते शाह हज़ारों उन्हें बनकर शातिर हाए अब और पकौड़े न तलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको इन की मेहनत पे इमारत है खड़ी दुनिया की फिर भी गुस्ताख़ नज़र चुभती बड़ी दुनिया की अब नहीं और अधिक नीचा दिखाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको
Nityanand Vajpayee
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"आँखें" मद भरी झील सी नीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा बिजली गिराती इन की मुझ को दीवाना सदाएँ भी बनाती इन की शरबती शोख़ सजीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें सातों सागर से ज़ियादा हैं कहीं राज़ इन में इतना कुछ कह के भी होती नहीं आवाज़ इन में क़ातिलाना हैं चुटीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें नग़्मा-ए-इश्क़ को सुन सुन के तड़पती हैं ये याद दिलवर की सताए तो छलकती हैं ये नील कँवलों सी रँगीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें शोख़ रुख़सारों की चिलमन में छुपे दो हीरे दे के दीदार ज़माने को थके वो हीरे इस क़दर तन्हा लजीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें
Nityanand Vajpayee
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शोहरत इतना क़रीब आके वो अब दूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया मेरे ही अंजुमन में हिफ़ाज़त मिली उसे बसने को सरज़मीन मिली छत मिली उसे मिल्लत की मिलकियत भी मिली हक़ मिला यहाँ इज़्ज़त मिली रुआब भी बेशक मिला यहाँ फिर क्यूँ वो अंजुमन को ही नासूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया हम ने लहू से जिस्म के सींचा किया जिसे हर एक इल्म और सलीक़ा दिया जिसे मज़मून को उधेड़ के तरजीह दी मगर गुस्ताख़ को फ़रेब दिखा था वो कम-नज़र मय छोड़ वहम पी के वो मख़मूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया था फ़र्ज़ मेरा मैं ने निभाया हर-एक पल क्या ख़ूब क़र्ज़-दार था वो ज़र्रा-ज़र्रा छल उस में न एक रेशा भी ईमान रह गया उस गोखरू से फट के गिरहबान रह गया कर के मुख़ालिफ़त वो कहाँ नूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया बचपन से बादशाह था ये दिल-ज़िगर मियाँ बख़्तर की कार-गाह था ये दिल-ज़िगर मियाँ शैतां भी मोच खा के दिखे लौटते हुए ठकरा के शीश ख़ुद की अना कोसते हुए यूँँ ही न तोड़ तू इसे मशहूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया
Nityanand Vajpayee
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