"ख़ौफ़ का फेरा" सारी दुनिया में अँधेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे फ़त्ह बंदूक ने पाई है सर-ए-नौ अब तो ख़ौफ़ ने सत्ह बनायी है सर-ए-नौ अब तो घर में मौतों का बसेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे मैं ने किंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"आईना" दर्द सीने में उभरता है वो कल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मेरे दिल के किसी कोने में हुई है हलचल तीर मारा है अगर तू ने तो फिर अब के सँभल तेरी आँखों का वो नमकीन सा छल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मैं समुंदर की तरह ख़ुद में छुपा लूँगा तुझे सिर्फ़ सीने से नहीं दिल से लगा लूँगा तुझे तेरे कमसिन से बदन को मैं कँवल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा बे-ज़बाँ इश्क़ की ख़ामोश गवाही की क़सम हुस्न की मौज ने बरपाई तबाही की क़सम नौनिहालों के दिलों में जो ख़लल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा तुम समझते हो कि मैं कुछ तो भरम रक्खूँगा सच बताने में भी कुछ दीन-धरम रक्खूँगा बातों-बातों में कोई चुभती मसल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा
Nityanand Vajpayee
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अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस सिर्फ़ मजदूर दिवस भर न बताओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको कितने मजबूर हुए आज ये भूखों मरते जो कि कर सकते नहीं काम ये वो भी करते भुखमरी फैल रही इस सेे बचाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको अब किसानों की सुनों माँगे सभी वाजिब हैं वत्न-ए-शागिर्द यही हैं व यही तालिब हैं अपनी गद्दी के लिए अब न रुलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको देश में लाख युवा फिरते हैं रोज़ी ख़ातिर लूटते शाह हज़ारों उन्हें बनकर शातिर हाए अब और पकौड़े न तलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको इन की मेहनत पे इमारत है खड़ी दुनिया की फिर भी गुस्ताख़ नज़र चुभती बड़ी दुनिया की अब नहीं और अधिक नीचा दिखाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको
Nityanand Vajpayee
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पल दो पल जी लेते हैं यादों के गहरे दरिया में हम हर दिन डुबकी लेते हैं ख़्वाबों में तुम मिल जाते हो फिर पल दो पल जी लेते हैं इश्क़ अधूरा अपना है जो मुमकिन है पूरा कब होना हम दोनों ने ख़्वाब बुने जो फ़ितरत है उन की बस रोना दर्द दवा अपनी है केवल उस को ही अब पी लेते हैं सावन आया प्यारा सब को हम दोनों के तन मन बहके सबकी आज मिलन की बेला बूँद हमें शोलों सी दहके अंबर भी रोते रह-रह कर जब जब हम सिसकी लेते हैं बेगानों में कौन सुनेगा किस को जा कर दर्द सुनाएँ ज़हर ज़ुदाई का पीना है गीत विरह के आओ गाएँ बाग़ों में चातक के सुर पर रागों की मुरकी लेते हैं
Nityanand Vajpayee
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ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया किस को गर्दिश में मिलाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया रोज़ कटते हैं हज़ारों ही शजर हरियाले आदमी रोक न पाया वो इरादे काले सिर्फ़ पैसों को कमाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया कितने नादान यहाँ लोग हुए जाते हैं दूध पी कर के वो गउओं का उन्हें खाते हैं अपनी माँ तक को नशाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया कारख़ानों के धुँए घोंट रहे दम पे दम सड़ते मलबों से पटी नदियाँ हुईं हैं कम-कम मौत सीने से लगाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया मूल्य गिरते ही चले जाते हैं नैतिकता के माँ-पिता बंधु बहिन बढ़ती अमानुसता के सब की अस्मत ही लुटाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया अब तो फ़ैशन का ज़माना ये बताते हैं लोग मरमरी जिस्म खुलेआम दिखाते हैं लोग तन से कपड़ों को हटाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया
Nityanand Vajpayee
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'ख़ौफ़ का फेरा' सारी दुनिया में अँधेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे फ़त्ह बंदूक़ ने पाई है सर-ए-आम अब तो ख़ौफ़ ने सत्ह बनायी है सर-ए-आम अब तो घर में मौतों का बसेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे मैं ने कंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे
Nityanand Vajpayee
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