nazmKuch Alfaaz

पल दो पल जी लेते हैं यादों के गहरे दरिया में हम हर दिन डुबकी लेते हैं ख़्वाबों में तुम मिल जाते हो फिर पल दो पल जी लेते हैं इश्क़ अधूरा अपना है जो मुमकिन है पूरा कब होना हम दोनों ने ख़्वाब बुने जो फ़ितरत है उन की बस रोना दर्द दवा अपनी है केवल उस को ही अब पी लेते हैं सावन आया प्यारा सब को हम दोनों के तन मन बहके सबकी आज मिलन की बेला बूँद हमें शोलों सी दहके अंबर भी रोते रह-रह कर जब जब हम सिसकी लेते हैं बेगानों में कौन सुनेगा किस को जा कर दर्द सुनाएँ ज़हर ज़ुदाई का पीना है गीत विरह के आओ गाएँ बाग़ों में चातक के सुर पर रागों की मुरकी लेते हैं

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"ख़ौफ़ का फेरा" सारी दुनिया में अँधेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे फ़त्ह बंदूक ने पाई है सर-ए-नौ अब तो ख़ौफ़ ने सत्ह बनायी है सर-ए-नौ अब तो घर में मौतों का बसेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे मैं ने किंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे

Nityanand Vajpayee

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"आईना" दर्द सीने में उभरता है वो कल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मेरे दिल के किसी कोने में हुई है हलचल तीर मारा है अगर तू ने तो फिर अब के सँभल तेरी आँखों का वो नमकीन सा छल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मैं समुंदर की तरह ख़ुद में छुपा लूँगा तुझे सिर्फ़ सीने से नहीं दिल से लगा लूँगा तुझे तेरे कमसिन से बदन को मैं कँवल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा बे-ज़बाँ इश्क़ की ख़ामोश गवाही की क़सम हुस्न की मौज ने बरपाई तबाही की क़सम नौनिहालों के दिलों में जो ख़लल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा तुम समझते हो कि मैं कुछ तो भरम रक्खूँगा सच बताने में भी कुछ दीन-धरम रक्खूँगा बातों-बातों में कोई चुभती मसल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा

Nityanand Vajpayee

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"आँखें" मद भरी झील सी नीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा बिजली गिराती इन की मुझ को दीवाना सदाएँ भी बनाती इन की शरबती शोख़ सजीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें सातों सागर से ज़ियादा हैं कहीं राज़ इन में इतना कुछ कह के भी होती नहीं आवाज़ इन में क़ातिलाना हैं चुटीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें नग़्मा-ए-इश्क़ को सुन सुन के तड़पती हैं ये याद दिलवर की सताए तो छलकती हैं ये नील कँवलों सी रँगीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें शोख़ रुख़सारों की चिलमन में छुपे दो हीरे दे के दीदार ज़माने को थके वो हीरे इस क़दर तन्हा लजीली हैं तुम्हारी आँखें मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें

Nityanand Vajpayee

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अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस सिर्फ़ मजदूर दिवस भर न बताओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको कितने मजबूर हुए आज ये भूखों मरते जो कि कर सकते नहीं काम ये वो भी करते भुखमरी फैल रही इस सेे बचाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको अब किसानों की सुनों माँगे सभी वाजिब हैं वत्न-ए-शागिर्द यही हैं व यही तालिब हैं अपनी गद्दी के लिए अब न रुलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको देश में लाख युवा फिरते हैं रोज़ी ख़ातिर लूटते शाह हज़ारों उन्हें बनकर शातिर हाए अब और पकौड़े न तलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको इन की मेहनत पे इमारत है खड़ी दुनिया की फिर भी गुस्ताख़ नज़र चुभती बड़ी दुनिया की अब नहीं और अधिक नीचा दिखाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको

Nityanand Vajpayee

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ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया किस को गर्दिश में मिलाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया रोज़ कटते हैं हज़ारों ही शजर हरियाले आदमी रोक न पाया वो इरादे काले सिर्फ़ पैसों को कमाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया कितने नादान यहाँ लोग हुए जाते हैं दूध पी कर के वो गउओं का उन्हें खाते हैं अपनी माँ तक को नशाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया कारख़ानों के धुँए घोंट रहे दम पे दम सड़ते मलबों से पटी नदियाँ हुईं हैं कम-कम मौत सीने  से  लगाने  पे  तुली  है  दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया मूल्य गिरते ही चले जाते हैं नैतिकता के माँ-पिता बंधु बहिन बढ़ती अमानुसता के सब की अस्मत ही लुटाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया अब तो फ़ैशन का ज़माना ये बताते हैं लोग मरमरी जिस्म खुलेआम दिखाते हैं लोग तन से कपड़ों  को हटाने पे तुली है दुनिया ख़ुद-ब-ख़ुद मिट के दिखाने पे तुली है दुनिया

Nityanand Vajpayee

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