अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस सिर्फ़ मजदूर दिवस भर न बताओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको कितने मजबूर हुए आज ये भूखों मरते जो कि कर सकते नहीं काम ये वो भी करते भुखमरी फैल रही इस सेे बचाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको अब किसानों की सुनों माँगे सभी वाजिब हैं वत्न-ए-शागिर्द यही हैं व यही तालिब हैं अपनी गद्दी के लिए अब न रुलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको देश में लाख युवा फिरते हैं रोज़ी ख़ातिर लूटते शाह हज़ारों उन्हें बनकर शातिर हाए अब और पकौड़े न तलाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको इन की मेहनत पे इमारत है खड़ी दुनिया की फिर भी गुस्ताख़ नज़र चुभती बड़ी दुनिया की अब नहीं और अधिक नीचा दिखाओ इनको मिल के सब लोग उठो हक़ भी दिलाओ इनको
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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"अगर तुम न होती" अगर तुम न होती वबा के दिनों में तो मुझे कौन कहता है कि काढ़ा बना लो सुनो कुछ दिनों को मेरी बात मानो और ठंडी चीज़ों से ख़ुद को बचा लो बर्फ़ का ठंडा पानी जो मुँह से लगाता बताओ मुझे कौन नख़रे दिखाता भला कौन कहता है मुझे तुम सेे कोई बात करनी नहीं है जो मर्ज़ी में आए करो तुम मरो तुम मुझे मार डालो करो ख़ूब मन की अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता सुनो तुम सुनो ना मेरी जान सुन लो न रूठो तुम मुझ सेे चलो मान जाओ हमारे लिए ही तो बाग़-ए-बहिश्त से आदम और हव्वा निकाले गए हैं कभी हम मिलेंगे कभी हम बनेंगे हम इक दूजे के हाथों में हाथों को देकर इक मंज़िल चुनेंगे, उसी पर चलेंगे अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता हूँ तुम्हारी ये गहरी अंटलाटिक सी आँखों में कई टाइटैनिक दफ़न हो रहे हैं सँभालो इन्हें तुम बचा लो इन्हें तुम मुझे डूबने दो, मैं एंटिक बनूँगा अगर तुम न होती तो नज़्में ये ग़ज़लें किसे मैं सुनाता भला कौन कहता सताओ ना मुझ को रुलाओ ना मुझ को मेरी वहशतों से बचा लो ना मुझ को सुनो ना गले से लगा लो मुझ को
Anand Raj Singh
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"इंसान" मैं हिंदू, तू मुसलमान है अब अपनी यही पहचान है? 'गीता' मेरे हिस्से में आई तेरे हिस्से में 'कुरान' है अब अपनी यही पहचान है? अल्लाह तेरा हाफ़िज़ है मेरा रक्षक भगवान है अब अपनी यही पहचान है? तेरा मुल्क पाकिस्तान मेरा देश हिंदुस्तान है अब अपनी यही पहचान है? तेरा मुल्क जिंदाबाद मेरा भारत महान है अब अपनी यही पहचान है? हिंदू, मुसलमान से पहले हम सिर्फ़ एक इंसान हैं आओ मिल कर कहें, कि अब हमारी एक ही पहचान है
Vikas Sangam
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"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?
Aves Sayyad
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"मैं और मेरी दुनिया" एक ऐसी दुनिया जिस में सिर्फ़ मैं हूँ और सब कुछ मेरे इर्द-गिर्द बुना हुआ जहाँ ख़यालों का आसमाँ है और दिल की ज़मीं है ख़्वाबों के कुछ शजर हैं नीचे अश्कों की नमी है ख़ुशियों की हवा है जो हौले से मुझे छू कर मुस्कुराते हुए गुज़र जाती है ग़मो की बारिश भी है जो दिल की ज़मीं सोख लेती है और तन्हाइयों के मौसम में अक्सर उगने लगते है अहसास के नन्हे पौधे खिलने लगती है उन में अल्फ़ाज़ की नन्ही कलियाँ और फिर बिखर जाती हैं सफ़्हों की फ़िज़ा में कोई ग़ज़ल या नज़्म बनकर
Priya omar
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"ख़ौफ़ का फेरा" सारी दुनिया में अँधेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे फ़त्ह बंदूक ने पाई है सर-ए-नौ अब तो ख़ौफ़ ने सत्ह बनायी है सर-ए-नौ अब तो घर में मौतों का बसेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे मैं ने किंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे
Nityanand Vajpayee
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"आईना" दर्द सीने में उभरता है वो कल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मेरे दिल के किसी कोने में हुई है हलचल तीर मारा है अगर तू ने तो फिर अब के सँभल तेरी आँखों का वो नमकीन सा छल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा मैं समुंदर की तरह ख़ुद में छुपा लूँगा तुझे सिर्फ़ सीने से नहीं दिल से लगा लूँगा तुझे तेरे कमसिन से बदन को मैं कँवल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा बे-ज़बाँ इश्क़ की ख़ामोश गवाही की क़सम हुस्न की मौज ने बरपाई तबाही की क़सम नौनिहालों के दिलों में जो ख़लल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा तुम समझते हो कि मैं कुछ तो भरम रक्खूँगा सच बताने में भी कुछ दीन-धरम रक्खूँगा बातों-बातों में कोई चुभती मसल कह दूँगा आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा
Nityanand Vajpayee
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पल दो पल जी लेते हैं यादों के गहरे दरिया में हम हर दिन डुबकी लेते हैं ख़्वाबों में तुम मिल जाते हो फिर पल दो पल जी लेते हैं इश्क़ अधूरा अपना है जो मुमकिन है पूरा कब होना हम दोनों ने ख़्वाब बुने जो फ़ितरत है उन की बस रोना दर्द दवा अपनी है केवल उस को ही अब पी लेते हैं सावन आया प्यारा सब को हम दोनों के तन मन बहके सबकी आज मिलन की बेला बूँद हमें शोलों सी दहके अंबर भी रोते रह-रह कर जब जब हम सिसकी लेते हैं बेगानों में कौन सुनेगा किस को जा कर दर्द सुनाएँ ज़हर ज़ुदाई का पीना है गीत विरह के आओ गाएँ बाग़ों में चातक के सुर पर रागों की मुरकी लेते हैं
Nityanand Vajpayee
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'ख़ौफ़ का फेरा' सारी दुनिया में अँधेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे फ़त्ह बंदूक़ ने पाई है सर-ए-आम अब तो ख़ौफ़ ने सत्ह बनायी है सर-ए-आम अब तो घर में मौतों का बसेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे मैं ने कंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है ख़ुदा ख़ैर करे हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है ख़ुदा ख़ैर करे
Nityanand Vajpayee
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शोहरत इतना क़रीब आके वो अब दूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया मेरे ही अंजुमन में हिफ़ाज़त मिली उसे बसने को सरज़मीन मिली छत मिली उसे मिल्लत की मिलकियत भी मिली हक़ मिला यहाँ इज़्ज़त मिली रुआब भी बेशक मिला यहाँ फिर क्यूँ वो अंजुमन को ही नासूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया हम ने लहू से जिस्म के सींचा किया जिसे हर एक इल्म और सलीक़ा दिया जिसे मज़मून को उधेड़ के तरजीह दी मगर गुस्ताख़ को फ़रेब दिखा था वो कम-नज़र मय छोड़ वहम पी के वो मख़मूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया था फ़र्ज़ मेरा मैं ने निभाया हर-एक पल क्या ख़ूब क़र्ज़-दार था वो ज़र्रा-ज़र्रा छल उस में न एक रेशा भी ईमान रह गया उस गोखरू से फट के गिरहबान रह गया कर के मुख़ालिफ़त वो कहाँ नूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया बचपन से बादशाह था ये दिल-ज़िगर मियाँ बख़्तर की कार-गाह था ये दिल-ज़िगर मियाँ शैतां भी मोच खा के दिखे लौटते हुए ठकरा के शीश ख़ुद की अना कोसते हुए यूँँ ही न तोड़ तू इसे मशहूर हो गया शोहरत मिली ज़रा सी तो मग़रूर हो गया
Nityanand Vajpayee
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