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ज़मीं थक गई थी हमारे गुनाहों के सब बोझ ढोते हुए सो उबलने लगी और हम बस यही सोचते रह गए कि ख़ुदा हम से नाराज़ है

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा

ALI ZUHRI

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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

Allama Iqbal

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"सरकारों को गाली देंगे" सरकारों को गाली देंगे आजू बाजू ताली देंगे पास खड़े हैं दोस्त हमारे सब लोगों को धक्का मारे जम कर खेली होली सबने जान सड़क पर तोली सबने इनका लॉजिक सब सेे बढ़िया और प्रशासन सब सेे घटिया दिन भर ज्ञान सभी को देंगे लेकिन मास्क नहीं पहनेंगे

Tanoj Dadhich

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उठो हिन्द के बाग़बानो उठो उठो इंक़िलाबी जवानो उठो किसानों उठो काम-गारो उठो नई ज़िंदगी के शरारो उठो उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से उठो मालवे और मेवात से महाराष्ट्र और गुजरात से अवध के चमन से चहकते उठो गुलों की तरह से महकते उठो उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब निकलता है जिस तरह से आफ़्ताब उठो जैसे दरिया में उठती है मौज उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फ़ौज उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए कड़कते गरजते बरसते हुए ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ दो ज़माने की रफ़्तार को मोड़ दो

Ali Sardar Jafri

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सुनो तुम लिख के दे दो ना कहानी में कहाँ सच है कहाँ पे रुक के तुम ने ग़ालिबन कुछ झूट लिखना है कहाँ ऐसा कोई इक मोड़ आना है जहाँ चालान मुमकिन है कहाँ वो बेश-क़ीमत सा सुनहरी छोटा सा डिब्बा जो अपनी धड़कनों से अपने होने की गवाही दे रहा है टूट जाना है कहाँ क़ारी को समझाना है दुख के इस अलाव में झुलसती सी कहानी रोक देना ही ज़रूरी है सफ़र में रुक के सब को अलविदा'अ कहने का लम्हा लाज़मी है कहाँ तारीख़ लिख के इस क़लम को जेब में रखना ज़रूरी हो गया है सुनो तुम ये बताओ ना तुम्हारी तिलस्माती सी कहानी में कोई किरदार तो होगा जो ज़िम्मेदार होगा कहाँ पर मरकज़ी किरदार ने दुख दर्द सीने में छुपाना है फ़लक को बद-गुमाँ कर के ज़मीं को आसमाँ होता दिखाना है नदामत और मलामत साथ रखनी है हर इक साअ'त के सारे दुख उठाने हैं निभाने हैं बताना है मोहब्बत ज़िंदगी का इस्तिआ'रा है मोहब्बत रात का पहला सितारा है या दुख का आख़िरी कोई किनारा है

Rabia Basri

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तुम्हारी जानिब दुआ के मोती रवाना करते दिखा ये सकते कि लाडली की सुनहरी आँखें भरी हुई थीं वो एक चिट्ठी कि जिस में ख़ुद को दिलासा देते बिलक रही थी वो बिखरे सफ़्हात डाइरी के कि जिन में तुम पर लिखी थीं नज़्में भरे थे अश'आर कैसे भेजें कि तुम तो मिट्टी के घर में जा के बसे हुए हो ज़मीन वालों को आ के देखो कि बिन तुम्हारे हमारी ईदें भी मातमों की तरह गुज़रती हैं बैन करते उदासियों की सियाह भट्टी में जलते बुझते कि आसमानी बशारतों का जो सिलसिला था वो एक मुद्दत से तोड़ रक्खा है जोड़ डालो तुम्हारे ख़्वाबों की मुंतज़िर है तुम्हारी लाडो सो इस से पहले सफ़र के अस्बाब बाँध ले वो समाअतों को सदा सुना दो

Rabia Basri

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हम तेरे सामने बेबसी की हदों से निकलते हुए बस यही कह सके अपने प्यारों से ऐसा रवय्या मुनासिब नहीं

Rabia Basri

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