nazmKuch Alfaaz

तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले ये कार-गाह-ए-हस्ती बाज़ार-ए-औज-ओ-पस्ती ले देख हो रही है बेचैनियों की बस्ती तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले 2 फूलों के चाक दामाँ ग़ुंचों में सोज़-ए-पिन्हाँ गुलशन बहार में भी बे-कैफ़-ओ-दर्द-सामाँ सोज़-ए-दरूँ नहीं है जोश-ए-जुनूँ नहीं है दिल ही से आशिक़ी थी दिल ही में ख़ूँ नहीं है पैमाने उठ गए हैं मयख़ाने उठ गए हैं वीरानियाँ सलामत दीवाने उठ गए हैं तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले 3 मामूर-ए-ग़म है दुनिया दार-ए-अलम है दुनिया दाम-ए-तवंगरी में सैद-ए-सितम है दुनिया आरे से चल रहे हैं नक़्शे बदल रहे हैं इंसाँ का ख़ून पी कर इंसान पल रहे हैं मफ़क़ूद ख़ुर्रमी है हर बज़्म मातमी है इस ग़म-कदे की हर शय गोया जहन्नमी है तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले 4 ऐ कार-साज़-ए-आलम ऐ बे-नियाज़-ए-आलम मा'मूर-ए-सोज़-ए-ग़म है कब से ये साज़-ए-आलम मायूस हो चुके हैं हिम्मत ही खो चुके हैं इंसाँ भलाइयों की क़िस्मत को रो चुके हैं बर्बाद हो रहे हैं नाशाद हो रहे हैं बंदे तिरे सरापा फ़रियाद हो रहे हैं तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले 5 हैवान भी नहीं हैं इंसान भी नहीं हैं इंसाँ-नुमा दरिंदे शैतान भी नहीं हैं ये ज़ोहद की दुकानें ये मासियत की कानें ये वाइ'ज़ों के मुँह में चलती हुई ज़बानें फ़िरऔन हो रहे हैं मलऊन हो रहे हैं मज़हब-फ़रोश मुल्ला क़ारून हो रहे हैं तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले 6 ऐ बे-नियाज़-ए-हस्ती ऐ कार-साज़-ए-हस्ती कब तक रहेगा यूँँही पोशीदा राज़-ए-हस्ती कोई नहीं हमारा कोई नहीं सहारा किस सम्त बह रही है ये ज़िंदगी की धारा फ़िक्र-ए-दवा नहीं है ज़िक्र-ए-दुआ नहीं है दिल कह रहा है अब तो कोई ख़ुदा नहीं है तुझ को भी कुछ ख़बर है तुझ को भी कुछ ख़बर है

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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न इज़्तिराब-ए-ग़ज़नवी न मशरब-ए-अयाज़ है न ख़ून में हरारतें न सोज़ है न साज़ है न ज़ौक़-ए-जाम-ओ-मय-कदा न बुत-कदे की आरज़ू न तौफ़ कू-ए-यार का न हसरतें न जुस्तुजू न ज़ौक़-ए-तेग़-ए-नाज़ है न शौक़-ए-नावक-ए-नज़र न नाला-ए-हज़ीं-रसा न आह-ए-सर्द में असर न हम-नशीं न वलवला कि लौ कहीं लगाएँ हम न हौसला कि सख़्तियाँ फ़िराक़ की उठाएँ हम न साज़-ए-इश्क़ ग़म-रुबा न कैफ़-ज़ा है जाम-ए-ग़म न इज़्तिराब-ए-हिज्र है न इंतिज़ार-ए-शाम-ए-ग़म न सर ख़ुशी न आक़िली न आशिक़ी न बंदगी न नग़्मा-ए-तरब-फ़िज़ा न ग़म-तराज़-ए-ज़िंदगी मसर्रतें न राहतें मोहब्बतें न लज़्ज़तें बढ़ी हुई कुदूरतें बढ़ी हुई अदावतें न दर्द-मंद इश्क़ हैं न चारा-साज़-ए-दर्द हैं उठे तो क्या रहे तो क्या कि रहगुज़र की गर्द हैं न शोरिशें न काविशें न जोश है न वलवला बुझी हुई तबीअ'तें बुझा हुआ सा हौसला अगर यही है ज़िंदगी अगर यही शबाब है तो मैं कहूँगा दोस्तो ये मुस्तक़िल अज़ाब है

Qaisar Amravatwi

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उमंगें दिल से उठ उठ कर तख़य्युल में सँवरती हैं मिरे ज़ुल्मत-कदा में अर्श से हूरें उतरती हैं वो मेरी हसरतें वो आरज़ूएँ वो तमन्नाएँ जो बर आईं तो दुनिया के जहन्नुम सर्द हो जाएँ यक़ीं होता है दिल को जादा-ए-हक़ से गुज़रना है मुझे मुस्तक़बिल-ए-इंसानियत ता'मीर करना है उठूँ उठ कर निज़ाम-ए-महफ़िल-ए-हस्ती बदल डालूँ बढ़ूँ बढ़ कर बदी की क़ुव्वतों का सर कुचल डालूँ सरापा सोज़ हो कर गर्म कर दूँ क़ल्ब-ए-हस्ती को तपिश-अंदोज़ियों का दरस दूँ सुक्कान-ए-पस्ती को ज़मीर-ओ-फ़िक्र-ए-इंसानी की आज़ादी का ख़्वाहाँ हूँ मैं नस्ल-ओ-रंग-ओ-ख़ूँ के इमतियाज़ों से गुरेज़ाँ हूँ ये बज़्म-ए-रंग-ओ-बू महरूम-ए-रंग-ओ-बू न हो जाए मुझे डर है कि ये दुनिया मक़ाम-ए-हू न हो जाए समेटूँ मरकज़-ए-इंसानियत पर ज़ुल्म बरहम को सिखाऊँ एहतिराम-ए-ज़िंदगी औलाद-ए-आदम को वक़ार-ए-आदमियत से ख़िरद को आश्ना कर दूँ गुज़ार-ए-इश्क़ से आईना-ए-दिल की जिला कर दूँ हक़ीक़त आश्ना-ए-ज़ौक़ कर दूँ कज-निगाहों को जगह दें नेकियों में ये मिरे रंगीं गुनाहों को मिटा कर इम्तियाज़-ए-नेक-ओ-बद सब एक हो जाएँ ख़ुदा भी एक है बंदे भी उस के एक हो जाएँ न गुलचीं हो न सय्याद-ए-सितम-राँ की सितम-रानी न गुल की चाक-दामानी न ग़ुंचों की परेशानी न तूफ़ाँ हो न तूफ़ाँ में ग़रीबों का जहाज़ आए ख़ुदाया हम फ़रेब-ए-कश्ती-ओ-साहिल से बाज़ आए ये मेरी हसरतें ये आरज़ूएँ ये तमन्नाएँ जो बर आएँ तो दुनिया के जहन्नुम सर्द हो जाएँ मिरी ख़ामोश रातों में भी इक हलचल सी रहती है दुआ करता हूँ मैं इंसानियत आमीन कहती है

Qaisar Amravatwi

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