"ख़ूनी क़िला" बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी ये अहद जिस पे कई नस्लों की है गर्द पड़ी ये पीर-ज़ाल ये क़िला कनार आब-ए-रवाँ भड़कते शोलों के मानिंद जिस का हर गुम्बद ये कंगरे हैं कि हैं भट्टियों के अँगारे जला के रख दिए जिन की तपिश ने लाखों मकाँ ये है अलामत-ए-फ़िस्ताइयत गिराओ से हमारे बच्चों के स्कूल से हटाओ इसे ये ख़ूनी-क़िला का फाटक है या दहान-ए-जहीम फ़सील-ए-संग इबारत है ख़ूँ के धब्बों से दिए लहूँ के फ़रोज़ाँ किए हुए हर ताक़ है जिन के सामने ख़ीरा तला ओ गौहर ओ सीम सदा-ए-रक़्स निकलती हुई झरोंकों से किसी हसीना-ए-फ़िरऔन का महल जैसे सुतून मरमरीं अँगड़ाई ले के नींद में चूर लिबास-ए-बरहनगी में निहाँ क़लो-पत्रा मियान-ए-नील कोई लाश देख कर हँस दे इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी नद्दी ये है कि ज़मीं पर है एक लाश पड़ी
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"ख़ूब-सूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उस का मुखड़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत बहुत क़ातिलाना है उस की निगाहें बहुत जानलेवा है उस की अदाएँ लगाई है जो उस ने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैं ने ज़रा गुफ़्तुगू कर के देखा है मैं ने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उस में हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उस का मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत
Danish Balliavi
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रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमक देर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई में अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिए तो न आई मगर उस रात की पहनाई में यूँँ अचानक तिरी आवाज़ कहीं से आई जैसे पर्बत का जिगर चीर के झरना फूटे या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में रंग सा फैल गया दिल के सियह-ख़ाने में देर तक यूँँ तिरी मस्ताना सदाएँ गूँजीं जिस तरह फूल चटकने लगें वीराने में तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी फिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई है और नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाब मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूश वही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर तू मिरे पास न थी फिर भी सहर होने तक तेरा हर साँस मिरे जिस्म को छू कर गुज़रा क़तरा क़तरा तिरे दीदार की शबनम टपकी लम्हा लम्हा तिरी ख़ुश्बू से मोअत्तर गुज़रा अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रार मैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों में ढूँढ़ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ को नग़्मा ओ शे'र की उमडी हुई बरसातों में अब तिरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती तिरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जाएगी और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले कर मेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगे चंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिए मिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे
Sahir Ludhianvi
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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को
Wamiq Jaunpuri
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"जमालियात" जमालियात का नक़्क़ाद जितना हैराँ है वो बाब-ए-हुस्न में भी उतना ही परेशाँ है जमालियात में क्या है जो ख़ुद नहीं फ़न में जमालियात का महवर नशात-ए-दौराँ है जमालियात को फ़रहंग में करो न तलाश जमालियात में ज़ुल्फ़-ए-सुख़न की अफ़्शाँ है जमालियात को उस्लूब में शुमार करो जमालियात में हर फ़र्द इक दबिस्ताँ है जमालियात तग़य्युर-पज़ीर हिस्सियत जमालियात में सहरा भी इक गुलिस्ताँ है जमालियात सक़ाफ़त का हफ़्त रंग लिबास जो रंग ओ नस्ल की तफ़रीक़ से गुरेज़ाँ है जमालियात बदलते हैं माह-ओ-साल के साथ जमालियात में तारीख़-ए-फ़िक्र-ए-इंसाँ है जमालियात हैं तख़्लीक़ फ़न का सर चश्मा अदीब अदब के लिए ख़ुद जमाल सामाँ है जमालियात में है हुस्न-ए-कार का जादू जमालियात की तस्ख़ीर कार-ए-मर्दां है कोई उसूल नहीं हुस्न के परखने का कहीं ख़िज़ाँ है हसीं और कहीं बहाराँ है जहाँ में जितने हैं फ़नकार उतनी तरह के हुस्न तो क्या बंधे टिके मेयार-ए-नौ का इम्काँ है बदलता रहता है मेयार-ए-हुस्न हुस्न के साथ तो किस लिए कोई नक़्क़ाद-ए-फ़न परेशाँ है
Wamiq Jaunpuri
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"जश्न-ए-नौशीन" घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़ फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर चमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़ फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला है थी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला है दिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़ है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आए सफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाए मिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़ बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंग बढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंग फिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़ तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहार उछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवार चलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़ घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़
Wamiq Jaunpuri
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"कार्ल मार्क्स" मार्क्स के इल्म ओ फ़तानत का नहीं कोई जवाब कौन उस के दर्क से होता नहीं है फ़ैज़-याब उस की दानाई का हासिल नाख़ुन-ए-उक़्दा-कुशा ताबनाकी-ए-ज़मीर-ओ-ज़ीरकी का आफ़्ताब चाहने वालों का उस की ज़िक्र ही क्या कीजिए उस के दुश्मन भी सिरहाने रखते हैं उस की किताब माद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीम तास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाब पढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलाम इश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाब कितने दोज़ख़ उस के इक मंशूर से जन्नत बने कितने सहराओं को जिस ने कर दिया शहर-ए-गुलाब मार्क्स ने साइंस ओ इंसाँ को किया है हम-कनार ज़ेहन को बख़्शा शुऊर-ए-ज़िंदगानी का निसाब उस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनास कर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब 'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़ब बे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाब आफ़्ताब ताज़ा की उस ने बशारत दी हमें उस की हर पेशन-गोई है बरफ़्गंदा नक़ाब कोई क़ुव्वत उस की सद्द-ए-राह बन सकती नहीं वक़्त का फ़रमान जब आता है बन कर इंक़िलाब अहल-ए-दानिश का रजज़ और सीना-ए-दहक़ाँ की ढाल लश्कर मज़दूर के हैं हम-सफ़ीर ओ हम-रिकाब काटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्ब सतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आब आज की फ़िरऔनियत भी कुछ इसी अंदाज़ से रफ़्ता रफ़्ता होती जाएगी शिकार-ए-इंक़िलाब लड़ रहा है जंग आख़िर कीसा-ए-सरमाया-दार जौहरी हथियार से करता नहीं जो इज्तिनाब अपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यास दीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराब हज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ से लरज़ा-बर-अंदाम यूँँ शैताँ से करता है ख़िताब पंडित ओ मुल्ला ओ राहिब बे-ज़रर ठहरे मगर टूटने वाला है तुझ पर इक यहूदी का इताब वो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीब नीस्त पैग़म्बर ओ लेकिन दर बग़ल दारद किताब
Wamiq Jaunpuri
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"देहली" हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल वो बेबसी कि ज़रा आगे बढ़ नहीं सकते किताब-ए-वक़्त की तहरीर पढ़ नहीं सकते भड़क रहे हैं निगाहों के सामने शो'ले ज़बाँ न मुँह में हो जिस के वो किस तरह बोले ये शहर-ए-दिल्ली बहिश्त-ए-नज़र जो था कल तक बना हुआ है जहन्नम ज़मीं से ता-ब-फ़लक सियाह-शोले दिलों की सियाहियाँ ले कर उठे हैं आज वतन की तबाहियाँ ले कर मकाँ को ख़ुद ही मकीनों ने कर दिया बर्बाद मिटा दी अपने ही हाथों से सतवत-ए-अज्दाद ख़ुद अपनी तेग़ों से अपने ही गर्दनें काटें तड़पती लाशों से नफ़रत की ख़ंदक़ें पाटें तमाम शहर पे छाई हुई है इक वहशत नज़र झपकते ही कैसी बदल गई हालत दुकानें लुट रही हैं गोलियों की बारिश है सियाहकारों से अहल-ए-दुवल की साज़िश है दरिंदे दौड़ते फिरते हैं सड़ती लाशों में लहू से तर किए नाख़ून गोश्त दाँतों में घरों का हाल तो बाज़ार से भी बद-तर है जिधर उठाओ नज़र ज़िंदगी मुकद्दर है जो लुट चुके हैं वो घर साएँ साएँ करते हैं जो जल रहे हैं अभी सर्द आहें भरते हैं निकल पड़े हैं मकानों को छोड़ कर शहरी जब आबरू पे बन आई तो मौत की ठहरी हज़ारों औरतों का आज लुट रहा है सुहाग न जाने कितनी तमन्नाओं में लगी है आग यतीम बच्चे बिलकते हैं गोदियों के लिए ग़रीब शहर तरसते हैं रोटियों के लिए उजड़ के कितने मआबिद बने सियह-ख़ाने जो आदमी को न समझा ख़ुदा को क्या जाने ये हाल देख के सकते में आ गई है फ़सील तमाम क़िले का मैदाँ बना है ख़ून की झील बहाए बैठी है आँसू लहू के चाँदनी-चौक क़रोल-बाग़ के दिल में क़रोलियों की नोक पुरानी दिली से भी बढ़ गई नई दिल्ली पुराने क़िले में जा कर बसी नई दिल्ली हज़ार बार ये बस्ती उजड़ उजड़ के बसी हज़ार बार ये दिल्ली बिगड़ बिगड़ के बनी मगर कुछ अब की दफ़ा इस तरह के चरके हैं कि जितनी चोटें हैं उतने ही दिल के टुकड़े हैं ये जुड़ तो सकते हैं लेकिन कहाँ है वो मरहम जो टूटे रिश्तों को क़ौमों के कर दे फिर बाहम मगर ये कैसे हो जब चारासाज़ ख़ुद लाचार इलाज कौन करे जब तबीब ख़ुद बीमार हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल
Wamiq Jaunpuri
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