"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"जश्न-ए-नौशीन" घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़ फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर चमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़ फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला है थी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला है दिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़ है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आए सफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाए मिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़ बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंग बढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंग फिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़ तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहार उछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवार चलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़ घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़
Wamiq Jaunpuri
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"ख़ूनी क़िला" बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी ये अहद जिस पे कई नस्लों की है गर्द पड़ी ये पीर-ज़ाल ये क़िला कनार आब-ए-रवाँ भड़कते शोलों के मानिंद जिस का हर गुम्बद ये कंगरे हैं कि हैं भट्टियों के अँगारे जला के रख दिए जिन की तपिश ने लाखों मकाँ ये है अलामत-ए-फ़िस्ताइयत गिराओ से हमारे बच्चों के स्कूल से हटाओ इसे ये ख़ूनी-क़िला का फाटक है या दहान-ए-जहीम फ़सील-ए-संग इबारत है ख़ूँ के धब्बों से दिए लहूँ के फ़रोज़ाँ किए हुए हर ताक़ है जिन के सामने ख़ीरा तला ओ गौहर ओ सीम सदा-ए-रक़्स निकलती हुई झरोंकों से किसी हसीना-ए-फ़िरऔन का महल जैसे सुतून मरमरीं अँगड़ाई ले के नींद में चूर लिबास-ए-बरहनगी में निहाँ क़लो-पत्रा मियान-ए-नील कोई लाश देख कर हँस दे इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी नद्दी ये है कि ज़मीं पर है एक लाश पड़ी
Wamiq Jaunpuri
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"भूका बंगाल" पूरब देस में डुग्गी बाजी फैला सुख का हाल दुख की आगनी कौन बुझाए सूख गए सब ताल जिन हाथों में मोती रो ले आज वही कंगाल आज वही कंगाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल पीठ से अपने पेट लगाए लाखों उल्टे खाट भीक-मँगाई से थक थक कर उतरे मौत के घाट जियन-मरन के डंडे मिलाए बैठे हैं चंडाल रे साथी बैठे हैं चंडाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल नद्दी नाले गली डगर पर लाशों के अम्बार जान की ऐसी महँगी शय का उलट गया व्यापार मुट्ठी भर चावल से बढ़ कर सस्ता है ये माल रे साथी सस्ता है ये माल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल कोठरियों में गाँजे बैठे बनिए सारा अनाज सुंदर-नारी भूक की मारी बेचे घर-घर लाज चौपट-नगरी कौन सँभाले चार तरफ़ भूँचाल चार तरफ़ भूँचाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल पुरखों ने घर बार लुटाया छोड़ के सब का साथ माएँ रोईं बिलक बिलक कर बच्चे भए अनाथ सदा सुहागन बिधवा बाजे खोले सर के बाल रे साथी खोले सर के बाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल अत्ती-पत्ती चबा-चबा कर जूझ रहा है देस मौत ने कितने घूँघट मारे बदले सौ सौ भेस काल बकुट फैलाए रहा है बीमारी का जाल रे साथी बीमारी का जाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल धरती-माता की छाती में चोट लगी है कारी माया-काली के फंदे में वक़्त पड़ा है भारी अब से उठ जा नींद के माते देख तू जग का हाल रे साथी देख तू जग का हाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल प्यारी-माता चिंता मत कर हम हैं आने वाले कुंदन-रस खेतों में तेरी गोद बसाने वाले ख़ून पसीना हल हंसिया से दूर करेंगे काल रे साथी दूर करेंगे काल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल
Wamiq Jaunpuri
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"जमालियात" जमालियात का नक़्क़ाद जितना हैराँ है वो बाब-ए-हुस्न में भी उतना ही परेशाँ है जमालियात में क्या है जो ख़ुद नहीं फ़न में जमालियात का महवर नशात-ए-दौराँ है जमालियात को फ़रहंग में करो न तलाश जमालियात में ज़ुल्फ़-ए-सुख़न की अफ़्शाँ है जमालियात को उस्लूब में शुमार करो जमालियात में हर फ़र्द इक दबिस्ताँ है जमालियात तग़य्युर-पज़ीर हिस्सियत जमालियात में सहरा भी इक गुलिस्ताँ है जमालियात सक़ाफ़त का हफ़्त रंग लिबास जो रंग ओ नस्ल की तफ़रीक़ से गुरेज़ाँ है जमालियात बदलते हैं माह-ओ-साल के साथ जमालियात में तारीख़-ए-फ़िक्र-ए-इंसाँ है जमालियात हैं तख़्लीक़ फ़न का सर चश्मा अदीब अदब के लिए ख़ुद जमाल सामाँ है जमालियात में है हुस्न-ए-कार का जादू जमालियात की तस्ख़ीर कार-ए-मर्दां है कोई उसूल नहीं हुस्न के परखने का कहीं ख़िज़ाँ है हसीं और कहीं बहाराँ है जहाँ में जितने हैं फ़नकार उतनी तरह के हुस्न तो क्या बंधे टिके मेयार-ए-नौ का इम्काँ है बदलता रहता है मेयार-ए-हुस्न हुस्न के साथ तो किस लिए कोई नक़्क़ाद-ए-फ़न परेशाँ है
Wamiq Jaunpuri
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"देहली" हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल वो बेबसी कि ज़रा आगे बढ़ नहीं सकते किताब-ए-वक़्त की तहरीर पढ़ नहीं सकते भड़क रहे हैं निगाहों के सामने शो'ले ज़बाँ न मुँह में हो जिस के वो किस तरह बोले ये शहर-ए-दिल्ली बहिश्त-ए-नज़र जो था कल तक बना हुआ है जहन्नम ज़मीं से ता-ब-फ़लक सियाह-शोले दिलों की सियाहियाँ ले कर उठे हैं आज वतन की तबाहियाँ ले कर मकाँ को ख़ुद ही मकीनों ने कर दिया बर्बाद मिटा दी अपने ही हाथों से सतवत-ए-अज्दाद ख़ुद अपनी तेग़ों से अपने ही गर्दनें काटें तड़पती लाशों से नफ़रत की ख़ंदक़ें पाटें तमाम शहर पे छाई हुई है इक वहशत नज़र झपकते ही कैसी बदल गई हालत दुकानें लुट रही हैं गोलियों की बारिश है सियाहकारों से अहल-ए-दुवल की साज़िश है दरिंदे दौड़ते फिरते हैं सड़ती लाशों में लहू से तर किए नाख़ून गोश्त दाँतों में घरों का हाल तो बाज़ार से भी बद-तर है जिधर उठाओ नज़र ज़िंदगी मुकद्दर है जो लुट चुके हैं वो घर साएँ साएँ करते हैं जो जल रहे हैं अभी सर्द आहें भरते हैं निकल पड़े हैं मकानों को छोड़ कर शहरी जब आबरू पे बन आई तो मौत की ठहरी हज़ारों औरतों का आज लुट रहा है सुहाग न जाने कितनी तमन्नाओं में लगी है आग यतीम बच्चे बिलकते हैं गोदियों के लिए ग़रीब शहर तरसते हैं रोटियों के लिए उजड़ के कितने मआबिद बने सियह-ख़ाने जो आदमी को न समझा ख़ुदा को क्या जाने ये हाल देख के सकते में आ गई है फ़सील तमाम क़िले का मैदाँ बना है ख़ून की झील बहाए बैठी है आँसू लहू के चाँदनी-चौक क़रोल-बाग़ के दिल में क़रोलियों की नोक पुरानी दिली से भी बढ़ गई नई दिल्ली पुराने क़िले में जा कर बसी नई दिल्ली हज़ार बार ये बस्ती उजड़ उजड़ के बसी हज़ार बार ये दिल्ली बिगड़ बिगड़ के बनी मगर कुछ अब की दफ़ा इस तरह के चरके हैं कि जितनी चोटें हैं उतने ही दिल के टुकड़े हैं ये जुड़ तो सकते हैं लेकिन कहाँ है वो मरहम जो टूटे रिश्तों को क़ौमों के कर दे फिर बाहम मगर ये कैसे हो जब चारासाज़ ख़ुद लाचार इलाज कौन करे जब तबीब ख़ुद बीमार हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल
Wamiq Jaunpuri
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