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"देहली" हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल वो बेबसी कि ज़रा आगे बढ़ नहीं सकते किताब-ए-वक़्त की तहरीर पढ़ नहीं सकते भड़क रहे हैं निगाहों के सामने शो'ले ज़बाँ न मुँह में हो जिस के वो किस तरह बोले ये शहर-ए-दिल्ली बहिश्त-ए-नज़र जो था कल तक बना हुआ है जहन्नम ज़मीं से ता-ब-फ़लक सियाह-शोले दिलों की सियाहियाँ ले कर उठे हैं आज वतन की तबाहियाँ ले कर मकाँ को ख़ुद ही मकीनों ने कर दिया बर्बाद मिटा दी अपने ही हाथों से सतवत-ए-अज्दाद ख़ुद अपनी तेग़ों से अपने ही गर्दनें काटें तड़पती लाशों से नफ़रत की ख़ंदक़ें पाटें तमाम शहर पे छाई हुई है इक वहशत नज़र झपकते ही कैसी बदल गई हालत दुकानें लुट रही हैं गोलियों की बारिश है सियाहकारों से अहल-ए-दुवल की साज़िश है दरिंदे दौड़ते फिरते हैं सड़ती लाशों में लहू से तर किए नाख़ून गोश्त दाँतों में घरों का हाल तो बाज़ार से भी बद-तर है जिधर उठाओ नज़र ज़िंदगी मुकद्दर है जो लुट चुके हैं वो घर साएँ साएँ करते हैं जो जल रहे हैं अभी सर्द आहें भरते हैं निकल पड़े हैं मकानों को छोड़ कर शहरी जब आबरू पे बन आई तो मौत की ठहरी हज़ारों औरतों का आज लुट रहा है सुहाग न जाने कितनी तमन्नाओं में लगी है आग यतीम बच्चे बिलकते हैं गोदियों के लिए ग़रीब शहर तरसते हैं रोटियों के लिए उजड़ के कितने मआबिद बने सियह-ख़ाने जो आदमी को न समझा ख़ुदा को क्या जाने ये हाल देख के सकते में आ गई है फ़सील तमाम क़िले का मैदाँ बना है ख़ून की झील बहाए बैठी है आँसू लहू के चाँदनी-चौक क़रोल-बाग़ के दिल में क़रोलियों की नोक पुरानी दिली से भी बढ़ गई नई दिल्ली पुराने क़िले में जा कर बसी नई दिल्ली हज़ार बार ये बस्ती उजड़ उजड़ के बसी हज़ार बार ये दिल्ली बिगड़ बिगड़ के बनी मगर कुछ अब की दफ़ा इस तरह के चरके हैं कि जितनी चोटें हैं उतने ही दिल के टुकड़े हैं ये जुड़ तो सकते हैं लेकिन कहाँ है वो मरहम जो टूटे रिश्तों को क़ौमों के कर दे फिर बाहम मगर ये कैसे हो जब चारासाज़ ख़ुद लाचार इलाज कौन करे जब तबीब ख़ुद बीमार हमारी मजलिस-ए-शूरा के ऊँचे ऊँचे महल नज़र झुकाए जुमूद-ए-अमल से सर बोझल

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को

Wamiq Jaunpuri

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"जश्न-ए-नौशीन" घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़ फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर चमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़ फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला है थी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला है दिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़ है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आए सफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाए मिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़ बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंग बढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंग फिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़ तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहार उछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवार चलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़ घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़

Wamiq Jaunpuri

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"कार्ल मार्क्स" मार्क्स के इल्म ओ फ़तानत का नहीं कोई जवाब कौन उस के दर्क से होता नहीं है फ़ैज़-याब उस की दानाई का हासिल नाख़ुन-ए-उक़्दा-कुशा ताबनाकी-ए-ज़मीर-ओ-ज़ीरकी का आफ़्ताब चाहने वालों का उस की ज़िक्र ही क्या कीजिए उस के दुश्मन भी सिरहाने रखते हैं उस की किताब माद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीम तास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाब पढ़ के जिस के हो गईं हुश्यार अक़वाम-ए-ग़ुलाम इश्तिराकी फ़ल्सफ़ा का खुल गया हर दिल में बाब कितने दोज़ख़ उस के इक मंशूर से जन्नत बने कितने सहराओं को जिस ने कर दिया शहर-ए-गुलाब मार्क्स ने साइंस ओ इंसाँ को किया है हम-कनार ज़ेहन को बख़्शा शुऊर-ए-ज़िंदगानी का निसाब उस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनास कर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब 'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़ब बे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाब आफ़्ताब ताज़ा की उस ने बशारत दी हमें उस की हर पेशन-गोई है बरफ़्गंदा नक़ाब कोई क़ुव्वत उस की सद्द-ए-राह बन सकती नहीं वक़्त का फ़रमान जब आता है बन कर इंक़िलाब अहल-ए-दानिश का रजज़ और सीना-ए-दहक़ाँ की ढाल लश्कर मज़दूर के हैं हम-सफ़ीर ओ हम-रिकाब काटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्ब सतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आब आज की फ़िरऔनियत भी कुछ इसी अंदाज़ से रफ़्ता रफ़्ता होती जाएगी शिकार-ए-इंक़िलाब लड़ रहा है जंग आख़िर कीसा-ए-सरमाया-दार जौहरी हथियार से करता नहीं जो इज्तिनाब अपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यास दीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराब हज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ से लरज़ा-बर-अंदाम यूँँ शैताँ से करता है ख़िताब पंडित ओ मुल्ला ओ राहिब बे-ज़रर ठहरे मगर टूटने वाला है तुझ पर इक यहूदी का इताब वो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीब नीस्त पैग़म्बर ओ लेकिन दर बग़ल दारद किताब

Wamiq Jaunpuri

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"ख़ूनी क़िला" बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी ये अहद जिस पे कई नस्लों की है गर्द पड़ी ये पीर-ज़ाल ये क़िला कनार आब-ए-रवाँ भड़कते शोलों के मानिंद जिस का हर गुम्बद ये कंगरे हैं कि हैं भट्टियों के अँगारे जला के रख दिए जिन की तपिश ने लाखों मकाँ ये है अलामत-ए-फ़िस्ताइयत गिराओ से हमारे बच्चों के स्कूल से हटाओ इसे ये ख़ूनी-क़िला का फाटक है या दहान-ए-जहीम फ़सील-ए-संग इबारत है ख़ूँ के धब्बों से दिए लहूँ के फ़रोज़ाँ किए हुए हर ताक़ है जिन के सामने ख़ीरा तला ओ गौहर ओ सीम सदा-ए-रक़्स निकलती हुई झरोंकों से किसी हसीना-ए-फ़िरऔन का महल जैसे सुतून मरमरीं अँगड़ाई ले के नींद में चूर लिबास-ए-बरहनगी में निहाँ क़लो-पत्रा मियान-ए-नील कोई लाश देख कर हँस दे इस अहद-ए-क़हक़री का हर क़दम है एक सदी बहुत ही सख़्त बहुत ही तवील है ये घड़ी नद्दी ये है कि ज़मीं पर है एक लाश पड़ी

Wamiq Jaunpuri

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"जमालियात" जमालियात का नक़्क़ाद जितना हैराँ है वो बाब-ए-हुस्न में भी उतना ही परेशाँ है जमालियात में क्या है जो ख़ुद नहीं फ़न में जमालियात का महवर नशात-ए-दौराँ है जमालियात को फ़रहंग में करो न तलाश जमालियात में ज़ुल्फ़-ए-सुख़न की अफ़्शाँ है जमालियात को उस्लूब में शुमार करो जमालियात में हर फ़र्द इक दबिस्ताँ है जमालियात तग़य्युर-पज़ीर हिस्सियत जमालियात में सहरा भी इक गुलिस्ताँ है जमालियात सक़ाफ़त का हफ़्त रंग लिबास जो रंग ओ नस्ल की तफ़रीक़ से गुरेज़ाँ है जमालियात बदलते हैं माह-ओ-साल के साथ जमालियात में तारीख़-ए-फ़िक्र-ए-इंसाँ है जमालियात हैं तख़्लीक़ फ़न का सर चश्मा अदीब अदब के लिए ख़ुद जमाल सामाँ है जमालियात में है हुस्न-ए-कार का जादू जमालियात की तस्ख़ीर कार-ए-मर्दां है कोई उसूल नहीं हुस्न के परखने का कहीं ख़िज़ाँ है हसीं और कहीं बहाराँ है जहाँ में जितने हैं फ़नकार उतनी तरह के हुस्न तो क्या बंधे टिके मेयार-ए-नौ का इम्काँ है बदलता रहता है मेयार-ए-हुस्न हुस्न के साथ तो किस लिए कोई नक़्क़ाद-ए-फ़न परेशाँ है

Wamiq Jaunpuri

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