गए दिनों की मोहब्बतों को सऊबतों को अज़िय्यतों को सँभाल रखना कि आने वाले किसी भी लम्हे में ख़्वाब आँखों से छिन गए तो मोहब्बतों को सऊबतों को अज़िय्यतों को बसा के आँखों में ज़िंदगी को तलाश करना
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"वो एक ख़्वाब था" वो एक ख़्वाब था जो अब मुझे नहीं आता और कोई शख़्श इन आँखों को अब नहीं भाता न जाने क्यूँ ही हौसलों को हम सँभाले हैं ये जबकि जानते हैं दूर अब उजाले हैं उसे न चाह थी पर इश्क़ कर लिया हम ने चराग़ को हवा की सम्त रख दिया हम ने किसी दरख़्त के साए में मिला था मुझ को मुझे उलझाए हुए ख़ुद में मिला था मुझ को गले से लग के मेरी रूह को राहत दी थी उदास चेहरे को अपनी हथेलियाँ दी थी मेरे माथे की सलवटों को चूम कर उस ने जो न क़िस्मत में लिखी थीं मुझे ख़ुशियाँ दी थीं ख़ुशी के आँसुओं में उस को डूबते देखा मैं ने उस रोज़ यूँँ सूरज को डूबते देखा चाँद का रंग फिर घुला था शफ़क़ में ऐसे मेरा रंग उस के रंग में हो घुल गया जैसे शादमानी सी हरारत हुई कोई दिल में कोई तितली-सी बदन में मेरे उड़ी जैसे मुझे यूँँ भी लगा ये वक़्त ठहर जाए कहीं या तो मर जाऊँ या मैं उस का ही हो जाऊँ अभी रात उस रात के तो बा'द भी बहुत आईं ढूँढ़ता था मगर आहट तेरी नहीं पाई ये बात और है क़िस्मत बदल नहीं सकती मैं चाहे जितना चाह लूँ तू मिल नहीं सकती ख़फ़ा रहो मगर मेरे सामने तो आओ तुम न कुछ कहो अगर तो आँख तो दिखाओ तुम मैं जानता हूँ मैं ने दर्द दिया है तुम को किसी तरह से मेरे दर्द को मिटाओ तुम हथेलियों में मेरी सब्र की लकीर न थी तुझे मिल पाऊँ मैं ऐसी भी तो तक़दीर न थी उसी शिद्दत से ही मैं अब भी चाहता हूँ तुम्हें न हो यक़ीन अगर इंतिज़ार देख मेरा फिरूँ मैं दर-ब-दर कि अब कहाँ को जाऊँ मैं एक मुश्ताक़ था बेज़ार न हो जाऊँ मैं थी ये तलब कि तुझ पे जाँ निसार कर दूँ मैं और अब यूँँ है कि तैयार न हो जाऊँ कहीं
anupam shah
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"सफ़र के वक़्त" तुम्हारी याद मिरे दिल का दाग़ है लेकिन सफ़र के वक़्त तो बे-तरह याद आती हो बरस बरस की हो आदत का जब हिसाब तो फिर बहुत सताती हो जानम बहुत सताती हो मैं भूल जाऊँ मगर कैसे भूल जाऊँ भला अज़ाब-ए-जाँ की हक़ीक़त का अपनी अफ़्साना मिरे सफ़र के वो लम्हे तुम्हारी पुर-हाली वो बात बात मुझे बार बार समझाना ये पाँच कुर्ते हैं देखो ये पाँच पाजा में डले हुए हैं क़मर-बंद इन में और देखो ये शेव-बॉक्स है और ये है ओलड असपाइस नहीं हुज़ूर की झोंजल का अब कोई बाइ'से ये डाइरी है और इस में पते हैं और नंबर इसे ख़याल से बक्से की जेब में रखना है अर्ज़ ''हज़रत-ए-ग़ाएब-दिमाग़'' बंदी की कि अपने ऐब की हालत को ग़ैब में रखना ये तीन कोट हैं पतलून हैं ये टाइयाँ हैं बंधी हुई हैं ये सब तुम को कुछ नहीं करना ये 'वेलियम' है 'ओनटल' है और 'टरपटी-नाल' तुम इन के साथ मिरी जाँ ड्रिंक से डरना बहुत ज़ियादा न पीना कि कुछ न याद आए जो लखनऊ में हुआ था वो अब दोबारा न हो हो तुम सुख़न की अना और तमकनत जानम मज़ाक़ का किसी 'इंशा' को तुम से यारा न हो वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहीं तुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखना अजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैं ख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखना हो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलाम ख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुम तुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दिया मुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम ये बैंक-कार मैनेजर ये अपने टेक्नोक्रेट कोई भी शुबह नहीं हैं ये एक अबस का ढिढोल मैं ख़ुद भी इन को क्रो-मैग्नन समझती हूँ ये शानदार जनावर हैं दफ़्तरों का मख़ौल मैं जानती हूँ कि तुम सुन नहीं रहे मिरी बात समाज झूट सही फिर भी उस का पास करो है तुम को तैश है बालिशतियों की ये दुनिया तो फिर क़रीने से तुम उन को बे-लिबास करो तुम एक सादा ओ बरजस्ता आदमी ठहरे मिज़ाज-ए-वक़्त को तुम आज तक नहीं समझे जो चीज़ सब से ज़रूरी है वो मैं भूल गई ये पासपोर्ट है इस को सँभाल के रखना जो ये न हो तो ख़ुदा भी बशर तक आ न सके सो तुम शुऊ'र का अपने कमाल कर रखना मिरी शिकस्त के ज़ख़्मों की सोज़िश-ए-जावेद नहीं रहा मिरे ज़ख़्मों का अब हिसाब कोई है अब जो हाल मिरा वो अजब तमाशा है मिरा अज़ाब नहीं अब मिरा अज़ाब कोई नहीं कोई मिरी मंज़िल पे है सफ़र दरपेश है गर्द गर्द अबस मुझ को दर-ब-दर पेश
Jaun Elia
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धूप के समुंदर में बर्फ़ की सलीबों पर ख़्वाहिशों के तिनकों से एक लफ़्ज़ लिक्खा है लफ़्ज़ जो अमानत है रौशनी की सुब्हों की दर्द के रफ़ीक़ों की फूल फूल शाख़ों की ज़र्द ज़र्द शामों की ना-शनास नामों की लफ़्ज़ जो सदाक़त है अन-कहे सवालों की जागते ख़यालों की रेंगते उजालों की किस तरह समेटेगा मेरी तेरी नस्लों को ख़्वाब के जज़ीरों में आने वाले लम्हों में लफ़्ज़ जो दियानत है लफ़्ज़ जो इबादत है
Tahir Hanfi
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दश्त-ए-जाँ में सलीब-ए-अना पर लटकते हुए सर-बुरीदा ख़यालात की सिसकती हुई सरगोशियों में फ़ना और बक़ा लम्हा-ए-तक़्सीम में मुंजमिद हो चुके ऐ मेरे ख़ुदा
Tahir Hanfi
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