अब यहाँ मैं हूँ सिर्फ़ मैं इस बिखरे सामान दरमियान तुम तुम्हीं तो घर था घर था तो ज़िंदगी भर से रहने की उम्मीद हर सुब्ह पायल की झंकार उम्मीद हर सुब्ह तुम्हारी ख़ुशबू भरे बिस्तर में प्याली चाय पर गुज़रते वक़्तों की बातें आँखों आँखों में बातें जीतें मातें तुम बिना सूने घर में तुम्हारे पैरों की चाप के ख़्वाब ये चाप अब जहाँ गूँजती है तुम्हारे पैर जिस मकान में फर्श-ए-ज़मीन को छूते हैं वो मकान मेरा घर नहीं मेरा घर तो बस ये ख़्वाब हैं बिखरे सामान दरमियान बिखरते ख़्वाब जिन्हें टेलीफ़ोन लाइन पर सुनना सुनाना तेरी मेरी सज़ा है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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मैं समुंदर किनारे आराम-कुर्सी पर धूप सेंक रहा था एक लड़की पानी से निकली थकी थकी सी सुस्ताने को बैठ गई न-जाने उस के दिल में क्या आया बाएँ पैर पर रेत जमा कर पैर बाहर निकाल घर बनाया मैं हैरत-ए-शौक़ से सब देखता रहा मुझे घर अच्छा लगा उस में दाख़िल हुआ और वो समुंदर वापस चली गई मीरा-जी अब 'इरुज' क्या करे
Eruj Mubarak
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देवदास जी लब खोलो ख़ामोश फ़िल्मों का दौर गया अगर आप ने अपना देस भेस ऐसा ही भेस ऐसा ही रखा जैसे तब था तो सूई आगे की तरफ़ और वक़्त पीछे की तरफ़ बढ़ता ही रहेगा देवदास जी आँखें खोलो वक़्त के साथ साथ जो नया सच सामने आए उसे जान लो फिर मान लो जिस बात का हाज़िर से वास्ता न हो ज़िक्र छोड़ो वर्ना तुम ऐसा ही जिओगे जैसा अब तक मरे हो
Eruj Mubarak
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जो जैसे है जहाँ है वैसे ही की बे-नज़्म बिसात पर तजरबाती हादसाती मुआनक़ा मजबूर मोहब्बत है लोगों हम ने नए होने पर भी पुराने को दोहराया बिसात-परस्त कहलवाया नए लोगों बे-नज़मी में नज़्म नुमूदार होने को है तुम जो सोचने तोलने से पहले बोलते हो सच बोलते हो ब-ईं-दलील तुम्हारी तमीज़ तहज़ीब अभी वास्ते तस्लीम करता हूँ कि तुम ही मेरे महबूब हो तुम्हीं मेरी उम्मीद हो
Eruj Mubarak
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रात भर ख़्वाब अंदर आप अपने को बंद कमरे के कोने में नुक़्ता-ए-आग़ाज़ से जुड़ा ठंडे सीम-ज़दा फ़र्श पर हालत-ए-तशन्नुज और नज़्अ' दरमियान रौशनी इंतिज़ार में देखा बाँग बे-वक़्त ख़्वाब टूटने पर शोशे के फ़र्क़ से ख़्वाब की ता'बीर को सच पाया अपने आप को अपने वतन में पाया
Eruj Mubarak
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मुख़्तसर सवाल दो और दो का होता है जिस का जवाब मुश्तरका तौर पर एक ही होता है बात आज़ाद और फ़ितरी चले तो कभी कभी वज़्न-ना-आश्ना होते हुए भी मुकम्मल और जदीद होने के मवाक़े' या उम्मीद पैदा करती है
Eruj Mubarak
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