nazmKuch Alfaaz

तन्हाई को ख़्वाब की दस्तक देते देखा देखा इक गुम्बद के नीचे खड़ा हुआ हूँ सुनता हूँ ख़ुद की आवाज़ें ये आवाज़ें मुझ को वापस ले जाती हैं ख़्वाबों के उस मुर्दा-घर में जो बिल्कुल तारीक पड़ा है जिस में मेरे माज़ी के किरदारों के कुछ कफ़न पड़े हैं उन लोगों के जो ज़ीनत थे इन ख़्वाबों की लेकिन उन किरदारों की अब शक्ल नहीं है इक तारीकी है बदबू है ख़ामोशी है मुर्दा-घर के पर्दों से मेरी आवाज़ें झूल रही हैं जिन से इक चमगादड़ का नन्हा सा बच्चा खेल रहा है सड़कों पर कोहराम मचा है कुछ तो हुआ है लोग मरे हैं लहू बहा है और ये चमगादड़ का बच्चा मेरी तन्हाई का वारिस मेरी आवाज़ों की लर्ज़ां उँगली था में मुझ को उस मंज़र की जानिब खींच रहा है जहाँ किसी नन्हे बच्चे की लाश पड़ी है और वो चमगादड़ का बच्चा मेरे ज़ह्न की सूखी परतों में एहसास का रेशा ढूँड रहा है और इस ठंडी लाश पे बैठा सिसक रहा है

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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मुश्किल और आसानी में से एक अगर चुनना हो तो हम आसानी ही चुनते हैं मुश्किल बात गले के एवज़ पेट के पास से आती है उस को बाहर आते आते एक ज़माना लगता है मुश्किल है ये कह पाना के "यार, मुझे ग़म खाता है जैसे जैसे रात उतरती है तो रोना आता है" हो सालों का रिश्ता चाहे ये भी कहना मुश्किल है "जब तक ज़ख़्म नहीं भरता ये तू तो हाल सुनेगा ना ? तू तो बहुत क़रीब है मेरे तू तो मदद करेगा ना ?" बस इतनी सी बात बताने में सदियां लग जाती हैं आख़िर में हम बहुत सोच कर फिर आसानी चुनते है कह देते हैं, "हाँ मैं बढ़िया, मुझ को क्या ही होना है" वो भी 'बढ़िया' कह देता है बात ख़तम हो जाती है

Siddharth Saaz

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हाथ में ताबूत था में उन दिनों के जिन दिनों उस लालटेनों की गली में हम ने मिल कर अपने मुस्तक़बिल के इस घर को सजाया लालटेनों की गली का आख़िरी घर तेरा मेरा घर धूप में सहमा खड़ा है जिस की छत पर मकड़ियों के जाल में उलझे से ख़्वाब अपने मुंतशिर हैं घर की दीवारों से उलझी चिंटियों की मातमी सी कुछ क़तारें रेंगती हैं ख़स्ता शहतीरों में दब कर इक गौरय्या का घर बिखरा पड़ा है

Jagdish Prakash

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बस इक मैं हूँ बस इक तुम हो दूर ख़ला में सन्नाटा है दिल में ख़ामोशी का दरिया बहता है बहता रहता है जिस के किनारे बैठे हुए हम सोचा करते हैं बातों को इन बातों को जिन का कुछ मफ़्हूम नहीं है मौसम क्या है बादल क्या है सब कुछ अपने दिल जैसा है ख़ाली ख़ाली वीराँ वीराँ तुम और मैं हम कुछ भी नहीं हैं बस इक सच है कड़वा सच है जो लम्हे गिनता रहता है

Jagdish Prakash

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हम ने भी चाहा था बहुत कुछ हम ने भी कुछ माँगा था जो भी चाहो सब मिल जाए ऐसा तो दस्तूर नहीं

Jagdish Prakash

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मैं तो इक वजूद-ए-ख़याल हूँ मुझे जिस तरह से भी सोच लो मैं यक़ीं भी हूँ मैं गुमाँ भी हूँ मैं यहाँ भी हूँ मैं वहाँ भी हूँ कभी फ़िक्र में कभी ज़िक्र में कभी जोश में कभी होश में कभी ख़ुद से ख़ुद की तलाश में कभी मैं नहीं कभी जाँ नहीं कि मैं मुब्तला-ए-जुनून हूँ मैं ख़ुदी में ख़ुद का सुकून हूँ यही इश्क़ है मिरा कारवाँ मैं किधर नहीं मैं कहाँ नहीं मिरा यार मुझ में मैं यार में मैं हूँ बे-ख़ुदी के ख़ुमार में मिरा यार मुझ में है रक़्स-ज़न मैं रवाँ रवाँ भी रवाँ नहीं मिरी राहतों में तू जल्वा-गर मिरी वहशतों का तू हम-सफ़र मिरा हिज्र तू मिरा वस्ल तू मिरे घर का एक पता है बस जहाँ तू नहीं मैं वहाँ नहीं

Jagdish Prakash

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