मैं ने आशाओं की आँखें चेहरे होंट और नीले बाज़ू नोच लिए हैं उन के गर्म लहू से मैं ने अपने हाथ भिगो डाले हैं दोपहरों की तपती धूप में ख़्वाहिशें अपने जिस्म उठा कर चोबी खिड़की के शीशों से अक्सर झाँकती रहती हैं आँखें होंट और ज़ख़्मी बाज़ू जाने क्या कुछ मुझ से कहते रहते हैं जाने क्या कुछ उन से कहता रहता हूँ रात गए तक ज़ख़्मी ख़्वाहिशें बिस्तर की इक इक सिलवट से निकल निकल कर रोती हैं और सहर को उन के ख़ून से अपने हाथ भिगो लेता हूँ
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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छटी बार जब मैं ने दरवाज़ा खोला तो इक चीख़ मेरे बदन के मसामों से चिमटी बदन के अँधेरों में उतरी मिरा जिस्म उस चीख़ के तुंद पंजों से झुलसी हुई बे-कराँ चीख़ था मैं लरज़ता हुआ कोहना गुम्बद से निकला और चीख़ मेरे बदन से सियाह घास की तरह निकली बदन के करोड़ों मसामों के मुँह पर सियाह चीख़ का सुर्ख़ जंगल उगा था कोई चीख़ अब भी उभरती थी जिस से गुम्बद के दीवार-ओ-दर काँपते थे कोई शय दिखाई नहीं दे रही थी फ़क़त इक धुआँ था जो गुम्बद के सूराख़ से अपने पाँव निकाले हवाओं के बे-दाग़ सीनों से चिमटा हुआ था सातवीं बार फिर मैं ने दरवाज़ा खोला तो मेरे लहू की हर इक बूँद में सातवीं बार फिर सरसराती हुई चीख़ गुज़री मैं ने देखा कि गुम्बद में मैली ज़मीं पर नज़्अ' की हालत में इक लाश है जिस ने अब सातवीं बार मेरे बदन में सातवीं चीख़ का गर्म लावा उतारा ये ज़वाल की आख़िरी सर्द चीख़ों की इक चीख़ थी
Tabassum Kashmiri
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अगर मुझ से मिलना है आओ मिलो तुम मगर याद रखना मैं इक़रार की मंज़िलें रास्ते ही में छोड़ आया हूँ अब मुझ से मिलना है तुम को तो इनकार की सरहदों पे मिलो झींगुरों मकड़ियों के जनाज़े मैं रस्ते पे छोड़ आया हूँ पुरानी कथाएँ मुझे खींचती हैं ज़मीं का ज़वाल आज ज़ंजीर-ए-पा बन रहा है ख़स-ओ-ख़ाक के सारे रिश्ते मैं ने हर शय को अब तज दिया है कोई मा'ज़रत भी नहीं है कि मैं मा'ज़रत के सभी झूटे लफ़्ज़ों को अपनी लुग़त से निकाल आया हूँ मैं इनकार के आसमानों पे फिरता हुआ मैं इनकार का विर्द करता हुआ मैं ज़मीनों पे और आसमानों की हर शय पे इनकार की सुर्ख़ मोहरें लगाता हुआ और दमा-दम की इक थाप पे मैं ने सातों ज़मीनों के सातों तबक़ आज रौशन किए हैं देखना आसमाँ रक़्स करने लगा है ज़मीनों के सारे ख़ज़ाने उबलने लगे हैं सारे दफ़ीने जड़ों से उखड़ कर मिरे सामने हाथ बाँधे खड़े हैं मेरी आवाज़ पर मछलियाँ पानियों से निकल आई हैं आज अर्ज़-ओ-समावात की सारी पोशीदा ख़बरें मैं सुनने लगा हूँ मैं ख़ुश हूँ मुझे आगही मिल गई है बदन के मसामों से अब आगही शो'ला बन कर चमकने लगी है अजब कश्फ़ की रौशनी है ज़मीं अपनी सत्ह से पाताल तक रौशनी में नहा कर शब-ए-अव्वलीं की दुल्हन की तरह आज शर्मा रही है ताज़ा हवाओं की दोशीज़गी सात रंगों में बरहना हुई है हयाओं की सुर्ख़ी से चेहरा कँवल है कि मेरी दुल्हन का बदन फूल है वो हवाओं के रंगों में डूबी हुई है हवाओं की दोशीज़गी सात रंगों में बरहना हुई है हर इक शय नक़ाब अपना उल्टे हुए है सभी भेद अपनी ज़बानें निकाले मिरे सामने आ गए हैं किताबों के औराक़ ख़ुद बोलते हैं ज़मीं आसमाँ की हर इक शय समुंदर हवाएँ ज़मीनों की सतहें सत्हों के नीचे सदियों के चेहरे पहाड़ों की बर्फ़ें बर्फ़ों के शोरीदा पानी सदियों के प्यासे समुंदर के साहिल दरख़्तों के पत्ते फूलों के चेहरे और रोज़-ओ-शब के सफ़ेद-ओ-सियाह सिलसिले हर इक शय मुझे अपने भेदों से असरार से आश्ना कर रही है अजब आशनाई की लज़्ज़त मिली है मैं इस आशनाई की लज़्ज़त से सरशार हो कर मुक़द्दस ज़मीं के पुराने दुखों को गले से लगा कर मैं इक़रार की मंज़िलें रास्ते ही में छोड़ आया हूँ मैं सारी पुरानी कथाएँ जला कर फ़क़त इक दमा-दम की आवाज़ पर रक़्स करता हुआ मैं इक़रार की सरहदों से परे आ गया हूँ अब मुझ से मिलना है तुम को तो आओ मिलो मगर याद रखना मैं इक़रार की दुश्मनी पर उतर आया हूँ अब मैं इनकार की सरहदों पे मिलूँगा
Tabassum Kashmiri
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मुझे लगता है ज़मीन के किसी गुमनाम मंतक़े में हम कभी साथ साथ रहते थे मुझे अब तुम्हारा नाम याद नहीं तुम्हारी शक्ल भी याद नहीं मगर ये लगता है कि शायद कई सदियाँ पहले किसी पिछले जन्म की सीढ़ियों पर हम साथ साथ बैठते थे वो सीढ़ियाँ कहाँ थीं और पिछ्ला जन्म कहाँ हुआ था मुझे तो याद नहीं शायद तुम को भी याद न होगा हाँ बस इतना याद है एक छोटे से घर में हम सर-ए-शाम देवता के लिए दिए जलाते थे और दियों के क़रीब एक पंछी रहता था जो बादल बरखा और धूप के गीत गाता था गीत सुनते सुनते और दिए बुझने से पहले ही हम नमदों पर सो जाते थे और फिर हम दोनों मिल कर एक जैसा कोई ख़्वाब देखते थे बहुत से तालाबों जंगलों और बाग़ों का ख़्वाब सुब्ह-दम अँगनाई में सूरज उतर आता था पंछी पेड़ों पर और एक बादल छत पर बैठ जाता था फिर हम चौखट पर बैठ कर रंगों की बाज़गश्तें सुनते हुए एक तालाब को देखते रहते थे मुझे लगता है ये हम ही थे जो तालाब की तरफ़ देखते और बाज़गश्तें सुनते थे हाँ शायद हम ही थे अब ये याद नहीं उस समय हमारे नाम क्या थे
Tabassum Kashmiri
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नीले सायों की रात थी वो वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो नीले साए हवा के चेहरे पे और बदन पे और उस की आँखों में सो रहे थे और उस के होंटों पे सुर्ख़ ख़ुशबू की धूप उस शब चमक रही थी वो साहिल-ए-शब वो नीले पानी वो आसमानों से सुर्ख़ पत्तों की तेज़ बारिश वो तेज़ बारिश बदन पे उस के गुलाब-मौसम के इन दिनों में वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो सुर्ख़ ख़ुशबू की तेज़ धूपों में खो गई थी
Tabassum Kashmiri
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वो एक शब थी सफ़ेद गुलाबों वाले तालाब के बिल्कुल नज़दीक बादलों की पहली आहट पर उस ने रख दिए होंट होंटों पर मौसीक़ी की तितली गीत गाने लगी उस के साँसों के आस-पास उस की ख़ुशबुओं के घुँघरू बज रहे थे उस शब हुआ की सफ़ेद गुलाबी छतों पर वो उमड रही थी एक तेज़ समुंदरी लहर की तरह वो जिस्म पर नक़्श हो रही थी तितलियों से भरे हुए एक ख़्वाब की तरह वो एक शब सफ़ेद गुलाबों वाले तालाब के बिल्कुल नज़दीक शब-भर बादलों की हल्की और तेज़ आहटें और शब-भर होंट होंटों पर साँस साँसों पर और जिस्म जिस्म की सफ़ेद गुलाबी छतों पर
Tabassum Kashmiri
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