नीले सायों की रात थी वो वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो नीले साए हवा के चेहरे पे और बदन पे और उस की आँखों में सो रहे थे और उस के होंटों पे सुर्ख़ ख़ुशबू की धूप उस शब चमक रही थी वो साहिल-ए-शब वो नीले पानी वो आसमानों से सुर्ख़ पत्तों की तेज़ बारिश वो तेज़ बारिश बदन पे उस के गुलाब-मौसम के इन दिनों में वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो सुर्ख़ ख़ुशबू की तेज़ धूपों में खो गई थी
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुब्ह सुब्ह की बात है
Gorakh Pandey
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छटी बार जब मैं ने दरवाज़ा खोला तो इक चीख़ मेरे बदन के मसामों से चिमटी बदन के अँधेरों में उतरी मिरा जिस्म उस चीख़ के तुंद पंजों से झुलसी हुई बे-कराँ चीख़ था मैं लरज़ता हुआ कोहना गुम्बद से निकला और चीख़ मेरे बदन से सियाह घास की तरह निकली बदन के करोड़ों मसामों के मुँह पर सियाह चीख़ का सुर्ख़ जंगल उगा था कोई चीख़ अब भी उभरती थी जिस से गुम्बद के दीवार-ओ-दर काँपते थे कोई शय दिखाई नहीं दे रही थी फ़क़त इक धुआँ था जो गुम्बद के सूराख़ से अपने पाँव निकाले हवाओं के बे-दाग़ सीनों से चिमटा हुआ था सातवीं बार फिर मैं ने दरवाज़ा खोला तो मेरे लहू की हर इक बूँद में सातवीं बार फिर सरसराती हुई चीख़ गुज़री मैं ने देखा कि गुम्बद में मैली ज़मीं पर नज़्अ' की हालत में इक लाश है जिस ने अब सातवीं बार मेरे बदन में सातवीं चीख़ का गर्म लावा उतारा ये ज़वाल की आख़िरी सर्द चीख़ों की इक चीख़ थी
Tabassum Kashmiri
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मैं ने आशाओं की आँखें चेहरे होंट और नीले बाज़ू नोच लिए हैं उन के गर्म लहू से मैं ने अपने हाथ भिगो डाले हैं दोपहरों की तपती धूप में ख़्वाहिशें अपने जिस्म उठा कर चोबी खिड़की के शीशों से अक्सर झाँकती रहती हैं आँखें होंट और ज़ख़्मी बाज़ू जाने क्या कुछ मुझ से कहते रहते हैं जाने क्या कुछ उन से कहता रहता हूँ रात गए तक ज़ख़्मी ख़्वाहिशें बिस्तर की इक इक सिलवट से निकल निकल कर रोती हैं और सहर को उन के ख़ून से अपने हाथ भिगो लेता हूँ
Tabassum Kashmiri
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हम शोरीदा कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े रात की पुर-शहवत आँखों से टपके ताज़ा क़तरे शाम के काले सियाह माथे की नंगी मख़रूती ख़ारिश दोपहरों के जलते गोश्त की तेज़ बिसांद रात की काली रान से बहता अंधा लावा ख़लीज की गहराई से बाहर आता क़दम क़दम पर ख़ौफ़ तबाही दहशत पैदा करता बिखर रहा है रातों की सय्याल मलामत अपनी लंबी ज़ुल्फ़ बिखेरे कड़वे मौसम के जश्नों में नाच रही है कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़ों के इन जश्नों में गर्दन तक मैं पिघल गया हूँ माथे पर इन शोरीदा जश्नों की मोहरें सब्त हुई हैं कड़वे ज़ाइक़े जोंकें बन कर तालू से अब चिमट गए हैं तेज़ और तुंद तेज़ाबी सूरज हाँपते और कराहते सर्द मकानों की मुतवर्रिम चीख़ें मुतवर्रिम साँसों में सुर्ख़ तशद्दुद की चीख़ें मेरे कान में सुर्ख़ तशद्दुद की चीख़ों की छावनियाँ आबाद हुई हैं हम शोरीदा कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े नौ-ज़ाइदा शहरों के मुँह पे क़तरा क़तरा टपक रहे हैं
Tabassum Kashmiri
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वो एक शब थी सफ़ेद गुलाबों वाले तालाब के बिल्कुल नज़दीक बादलों की पहली आहट पर उस ने रख दिए होंट होंटों पर मौसीक़ी की तितली गीत गाने लगी उस के साँसों के आस-पास उस की ख़ुशबुओं के घुँघरू बज रहे थे उस शब हुआ की सफ़ेद गुलाबी छतों पर वो उमड रही थी एक तेज़ समुंदरी लहर की तरह वो जिस्म पर नक़्श हो रही थी तितलियों से भरे हुए एक ख़्वाब की तरह वो एक शब सफ़ेद गुलाबों वाले तालाब के बिल्कुल नज़दीक शब-भर बादलों की हल्की और तेज़ आहटें और शब-भर होंट होंटों पर साँस साँसों पर और जिस्म जिस्म की सफ़ेद गुलाबी छतों पर
Tabassum Kashmiri
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उदासियों की रुत भी क्या अजीब है कोई न मेरे पास है तुम तो मेरे पास हो मगर कहाँ हवा की ख़ुशबुओं में सब्ज़ रौशनी की धूल में दिल में बजती तालियों के पास उदासियों के ज़र्द बाल जल उठे थे उस घड़ी तुम्हारी सर्द याद के सफ़ेद फूल खिल उठे थे जिस घड़ी नज़र में इक सफ़ेद बर्फ़ गिर रही थी दूर तक सुर्ख़ बेलें खिल उठी थीं याद की छतों के पास उदासियों की रुत भी क्या अजीब है याद की छतों पे सुर्ख़ फूल हैं दूर दूर सब्ज़ रौशनी की धूल है और बर्फ़ गिर रही है ख़ामुशी के सर्द जंगलों के पास
Tabassum Kashmiri
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