nazmKuch Alfaaz

हम शोरीदा कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े रात की पुर-शहवत आँखों से टपके ताज़ा क़तरे शाम के काले सियाह माथे की नंगी मख़रूती ख़ारिश दोपहरों के जलते गोश्त की तेज़ बिसांद रात की काली रान से बहता अंधा लावा ख़लीज की गहराई से बाहर आता क़दम क़दम पर ख़ौफ़ तबाही दहशत पैदा करता बिखर रहा है रातों की सय्याल मलामत अपनी लंबी ज़ुल्फ़ बिखेरे कड़वे मौसम के जश्नों में नाच रही है कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़ों के इन जश्नों में गर्दन तक मैं पिघल गया हूँ माथे पर इन शोरीदा जश्नों की मोहरें सब्त हुई हैं कड़वे ज़ाइक़े जोंकें बन कर तालू से अब चिमट गए हैं तेज़ और तुंद तेज़ाबी सूरज हाँपते और कराहते सर्द मकानों की मुतवर्रिम चीख़ें मुतवर्रिम साँसों में सुर्ख़ तशद्दुद की चीख़ें मेरे कान में सुर्ख़ तशद्दुद की चीख़ों की छावनियाँ आबाद हुई हैं हम शोरीदा कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े नौ-ज़ाइदा शहरों के मुँह पे क़तरा क़तरा टपक रहे हैं

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुब्ह सुब्ह की बात है

Gorakh Pandey

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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छटी बार जब मैं ने दरवाज़ा खोला तो इक चीख़ मेरे बदन के मसामों से चिमटी बदन के अँधेरों में उतरी मिरा जिस्म उस चीख़ के तुंद पंजों से झुलसी हुई बे-कराँ चीख़ था मैं लरज़ता हुआ कोहना गुम्बद से निकला और चीख़ मेरे बदन से सियाह घास की तरह निकली बदन के करोड़ों मसामों के मुँह पर सियाह चीख़ का सुर्ख़ जंगल उगा था कोई चीख़ अब भी उभरती थी जिस से गुम्बद के दीवार-ओ-दर काँपते थे कोई शय दिखाई नहीं दे रही थी फ़क़त इक धुआँ था जो गुम्बद के सूराख़ से अपने पाँव निकाले हवाओं के बे-दाग़ सीनों से चिमटा हुआ था सातवीं बार फिर मैं ने दरवाज़ा खोला तो मेरे लहू की हर इक बूँद में सातवीं बार फिर सरसराती हुई चीख़ गुज़री मैं ने देखा कि गुम्बद में मैली ज़मीं पर नज़्अ' की हालत में इक लाश है जिस ने अब सातवीं बार मेरे बदन में सातवीं चीख़ का गर्म लावा उतारा ये ज़वाल की आख़िरी सर्द चीख़ों की इक चीख़ थी

Tabassum Kashmiri

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नीले सायों की रात थी वो वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो नीले साए हवा के चेहरे पे और बदन पे और उस की आँखों में सो रहे थे और उस के होंटों पे सुर्ख़ ख़ुशबू की धूप उस शब चमक रही थी वो साहिल-ए-शब वो नीले पानी वो आसमानों से सुर्ख़ पत्तों की तेज़ बारिश वो तेज़ बारिश बदन पे उस के गुलाब-मौसम के इन दिनों में वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो सुर्ख़ ख़ुशबू की तेज़ धूपों में खो गई थी

Tabassum Kashmiri

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यहाँ अब एक तारा ज़र्द तारा भी नहीं बाक़ी यहाँ अब आसमाँ के चीथडों की फड़फड़ाहट भी नहीं बाक़ी यहाँ पर सारे सूरज तारे सूरज तैरते अफ़्लाक से गिर कर किसी पाताल में गुम हैं यहाँ अब सारे सय्यारों की गर्दिश रुक गई है यहाँ अब रौशनी है और न आवाज़ों की लर्ज़िश है न जिस्मों में ही हरकत है यहाँ पर अब फ़क़त इक ख़ामुशी की फड़फड़ाहट है

Tabassum Kashmiri

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अगर मुझ से मिलना है आओ मिलो तुम मगर याद रखना मैं इक़रार की मंज़िलें रास्ते ही में छोड़ आया हूँ अब मुझ से मिलना है तुम को तो इनकार की सरहदों पे मिलो झींगुरों मकड़ियों के जनाज़े मैं रस्ते पे छोड़ आया हूँ पुरानी कथाएँ मुझे खींचती हैं ज़मीं का ज़वाल आज ज़ंजीर-ए-पा बन रहा है ख़स-ओ-ख़ाक के सारे रिश्ते मैं ने हर शय को अब तज दिया है कोई मा'ज़रत भी नहीं है कि मैं मा'ज़रत के सभी झूटे लफ़्ज़ों को अपनी लुग़त से निकाल आया हूँ मैं इनकार के आसमानों पे फिरता हुआ मैं इनकार का विर्द करता हुआ मैं ज़मीनों पे और आसमानों की हर शय पे इनकार की सुर्ख़ मोहरें लगाता हुआ और दमा-दम की इक थाप पे मैं ने सातों ज़मीनों के सातों तबक़ आज रौशन किए हैं देखना आसमाँ रक़्स करने लगा है ज़मीनों के सारे ख़ज़ाने उबलने लगे हैं सारे दफ़ीने जड़ों से उखड़ कर मिरे सामने हाथ बाँधे खड़े हैं मेरी आवाज़ पर मछलियाँ पानियों से निकल आई हैं आज अर्ज़-ओ-समावात की सारी पोशीदा ख़बरें मैं सुनने लगा हूँ मैं ख़ुश हूँ मुझे आगही मिल गई है बदन के मसामों से अब आगही शो'ला बन कर चमकने लगी है अजब कश्फ़ की रौशनी है ज़मीं अपनी सत्ह से पाताल तक रौशनी में नहा कर शब-ए-अव्वलीं की दुल्हन की तरह आज शर्मा रही है ताज़ा हवाओं की दोशीज़गी सात रंगों में बरहना हुई है हयाओं की सुर्ख़ी से चेहरा कँवल है कि मेरी दुल्हन का बदन फूल है वो हवाओं के रंगों में डूबी हुई है हवाओं की दोशीज़गी सात रंगों में बरहना हुई है हर इक शय नक़ाब अपना उल्टे हुए है सभी भेद अपनी ज़बानें निकाले मिरे सामने आ गए हैं किताबों के औराक़ ख़ुद बोलते हैं ज़मीं आसमाँ की हर इक शय समुंदर हवाएँ ज़मीनों की सतहें सत्हों के नीचे सदियों के चेहरे पहाड़ों की बर्फ़ें बर्फ़ों के शोरीदा पानी सदियों के प्यासे समुंदर के साहिल दरख़्तों के पत्ते फूलों के चेहरे और रोज़-ओ-शब के सफ़ेद-ओ-सियाह सिलसिले हर इक शय मुझे अपने भेदों से असरार से आश्ना कर रही है अजब आशनाई की लज़्ज़त मिली है मैं इस आशनाई की लज़्ज़त से सरशार हो कर मुक़द्दस ज़मीं के पुराने दुखों को गले से लगा कर मैं इक़रार की मंज़िलें रास्ते ही में छोड़ आया हूँ मैं सारी पुरानी कथाएँ जला कर फ़क़त इक दमा-दम की आवाज़ पर रक़्स करता हुआ मैं इक़रार की सरहदों से परे आ गया हूँ अब मुझ से मिलना है तुम को तो आओ मिलो मगर याद रखना मैं इक़रार की दुश्मनी पर उतर आया हूँ अब मैं इनकार की सरहदों पे मिलूँगा

Tabassum Kashmiri

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मुझे लगता है ज़मीन के किसी गुमनाम मंतक़े में हम कभी साथ साथ रहते थे मुझे अब तुम्हारा नाम याद नहीं तुम्हारी शक्ल भी याद नहीं मगर ये लगता है कि शायद कई सदियाँ पहले किसी पिछले जन्म की सीढ़ियों पर हम साथ साथ बैठते थे वो सीढ़ियाँ कहाँ थीं और पिछ्ला जन्म कहाँ हुआ था मुझे तो याद नहीं शायद तुम को भी याद न होगा हाँ बस इतना याद है एक छोटे से घर में हम सर-ए-शाम देवता के लिए दिए जलाते थे और दियों के क़रीब एक पंछी रहता था जो बादल बरखा और धूप के गीत गाता था गीत सुनते सुनते और दिए बुझने से पहले ही हम नमदों पर सो जाते थे और फिर हम दोनों मिल कर एक जैसा कोई ख़्वाब देखते थे बहुत से तालाबों जंगलों और बाग़ों का ख़्वाब सुब्ह-दम अँगनाई में सूरज उतर आता था पंछी पेड़ों पर और एक बादल छत पर बैठ जाता था फिर हम चौखट पर बैठ कर रंगों की बाज़गश्तें सुनते हुए एक तालाब को देखते रहते थे मुझे लगता है ये हम ही थे जो तालाब की तरफ़ देखते और बाज़गश्तें सुनते थे हाँ शायद हम ही थे अब ये याद नहीं उस समय हमारे नाम क्या थे

Tabassum Kashmiri

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