यहाँ अब एक तारा ज़र्द तारा भी नहीं बाक़ी यहाँ अब आसमाँ के चीथडों की फड़फड़ाहट भी नहीं बाक़ी यहाँ पर सारे सूरज तारे सूरज तैरते अफ़्लाक से गिर कर किसी पाताल में गुम हैं यहाँ अब सारे सय्यारों की गर्दिश रुक गई है यहाँ अब रौशनी है और न आवाज़ों की लर्ज़िश है न जिस्मों में ही हरकत है यहाँ पर अब फ़क़त इक ख़ामुशी की फड़फड़ाहट है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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छटी बार जब मैं ने दरवाज़ा खोला तो इक चीख़ मेरे बदन के मसामों से चिमटी बदन के अँधेरों में उतरी मिरा जिस्म उस चीख़ के तुंद पंजों से झुलसी हुई बे-कराँ चीख़ था मैं लरज़ता हुआ कोहना गुम्बद से निकला और चीख़ मेरे बदन से सियाह घास की तरह निकली बदन के करोड़ों मसामों के मुँह पर सियाह चीख़ का सुर्ख़ जंगल उगा था कोई चीख़ अब भी उभरती थी जिस से गुम्बद के दीवार-ओ-दर काँपते थे कोई शय दिखाई नहीं दे रही थी फ़क़त इक धुआँ था जो गुम्बद के सूराख़ से अपने पाँव निकाले हवाओं के बे-दाग़ सीनों से चिमटा हुआ था सातवीं बार फिर मैं ने दरवाज़ा खोला तो मेरे लहू की हर इक बूँद में सातवीं बार फिर सरसराती हुई चीख़ गुज़री मैं ने देखा कि गुम्बद में मैली ज़मीं पर नज़्अ' की हालत में इक लाश है जिस ने अब सातवीं बार मेरे बदन में सातवीं चीख़ का गर्म लावा उतारा ये ज़वाल की आख़िरी सर्द चीख़ों की इक चीख़ थी
Tabassum Kashmiri
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नीले सायों की रात थी वो वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो नीले साए हवा के चेहरे पे और बदन पे और उस की आँखों में सो रहे थे और उस के होंटों पे सुर्ख़ ख़ुशबू की धूप उस शब चमक रही थी वो साहिल-ए-शब वो नीले पानी वो आसमानों से सुर्ख़ पत्तों की तेज़ बारिश वो तेज़ बारिश बदन पे उस के गुलाब-मौसम के इन दिनों में वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो सुर्ख़ ख़ुशबू की तेज़ धूपों में खो गई थी
Tabassum Kashmiri
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बारिशें उस के बदन पर ज़ोर से गिरती रहीं और वो भीगी क़बा में देर तक चलती रही सुर्ख़ था उस का बदन और सुर्ख़ थी उस की क़बा सुर्ख़ थी उस दम हवा बारिशों में जंगलों के दरमियाँ चलते हो भीगते चेहरे को या उस की क़बा को देखते बाँस के गुंजान रस्तों पे कभी बढ़ते हुए उस की भीगी आँख में खुलती धनक तकते हुए और कभी पीपल के गहरे सुर्ख़ सायों के तले उस के भीगे होंट पे कुछ तितलियाँ रखते हुए बारिशों में भीगते लम्हे उसे भी याद हैं याद हैं उस को भी होंटों पे सजी कुछ तितलियाँ याद है मुझ को भी उस की आँख में खुलती धनक
Tabassum Kashmiri
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मैं ने आशाओं की आँखें चेहरे होंट और नीले बाज़ू नोच लिए हैं उन के गर्म लहू से मैं ने अपने हाथ भिगो डाले हैं दोपहरों की तपती धूप में ख़्वाहिशें अपने जिस्म उठा कर चोबी खिड़की के शीशों से अक्सर झाँकती रहती हैं आँखें होंट और ज़ख़्मी बाज़ू जाने क्या कुछ मुझ से कहते रहते हैं जाने क्या कुछ उन से कहता रहता हूँ रात गए तक ज़ख़्मी ख़्वाहिशें बिस्तर की इक इक सिलवट से निकल निकल कर रोती हैं और सहर को उन के ख़ून से अपने हाथ भिगो लेता हूँ
Tabassum Kashmiri
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हम शोरीदा कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े रात की पुर-शहवत आँखों से टपके ताज़ा क़तरे शाम के काले सियाह माथे की नंगी मख़रूती ख़ारिश दोपहरों के जलते गोश्त की तेज़ बिसांद रात की काली रान से बहता अंधा लावा ख़लीज की गहराई से बाहर आता क़दम क़दम पर ख़ौफ़ तबाही दहशत पैदा करता बिखर रहा है रातों की सय्याल मलामत अपनी लंबी ज़ुल्फ़ बिखेरे कड़वे मौसम के जश्नों में नाच रही है कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़ों के इन जश्नों में गर्दन तक मैं पिघल गया हूँ माथे पर इन शोरीदा जश्नों की मोहरें सब्त हुई हैं कड़वे ज़ाइक़े जोंकें बन कर तालू से अब चिमट गए हैं तेज़ और तुंद तेज़ाबी सूरज हाँपते और कराहते सर्द मकानों की मुतवर्रिम चीख़ें मुतवर्रिम साँसों में सुर्ख़ तशद्दुद की चीख़ें मेरे कान में सुर्ख़ तशद्दुद की चीख़ों की छावनियाँ आबाद हुई हैं हम शोरीदा कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े नौ-ज़ाइदा शहरों के मुँह पे क़तरा क़तरा टपक रहे हैं
Tabassum Kashmiri
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