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दिल-ए-वहशी जुनूँ की कौन सी मंज़िल थी कल शब जहाँ बाहम हुए क़ज़्ज़ाक़-दिलबर चले ख़ंजर गले पर आस्तीं पर दिल-ओ-दामन पे दस्तार-ओ-जबीं पर अजब एक शोर था महशर बपा था बहुत आह-ओ-फ़ुग़ाँ अंदोह जानी हज़ारों ज़ख़्म और एक सख़्त जानी न जाने शिद्दत-ए-यलग़ार क्या थी नहीं मा'लूम क्या मुद्दत रही किश्त-ए-निगाराँ की खुली जब आँख तो एक टूटते नशे का आलम था शफ़क़-गूँ था उफ़ुक़ दिल का चमन का रास्ता धब्बों से पुर था और सबा दामन में अपने ख़ून की बू बास रखती थी नज़ारा दीदनी था और दिल-ए-बेताब ने देखा लहू से लाल है सेहन-ए-चमन और हर तरफ़ बद-रंग ख़ूँ की लाला-कारी है नगीना दिल का सौ टुकड़े पड़ा है और हर टुकड़े में कोई अक्स-ए-वहशी है दिल-ओ-दिलबर की आशुफ़्ता-सरी है दिल-ओ-दिलबर की राहों में फ़क़त शीशे की किर्चें हैं

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ

Ammar Iqbal

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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया

ZafarAli Memon

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हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!

Shadab Javed

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बीसवीं सदी के आख़िरी बरसों में एक गहराती हुई शाम को जब परिंदों और पत्तों का रंग सियाह हो चुका था और दुख का रंग हर रंग पर ग़ालिब था माँ टूट चुकी थी महबूबा रूठ चुकी थी हफ़्ता-वार तातील की फ़राग़त से मुतमइन सरशारी के एक लम्हे को बे-क़रार शाइ'र लिखने बैठा गिर्द-ओ-पेश की दुनिया निहायत आहिस्तगी से ख़फ़ीफ़ पर्दों से छनती हुई ग़ाएब हो गई और पूरी काएनात महदूद हो कर मेज़ के रक़्बे में सिमट आई शाइ'र ना-मालूम कितने ज़मानों तक महबूत बैठा फ़ज़ा की सरगोशियाँ सुनता रहा साएँ साएँ करती ख़ामोशी में मो'तबर अल्फ़ाज़ की तलाश-ओ-जुस्तुजू में ग़लताँ-व-पेचाँ कि यक लख़्त रात की शह-रग से कई ख़ून के फ़व्वारे छूटे और सिसकती सीढ़ियों चीख़ते दरवाज़ों के आहंग पे मेज़ पर पड़ी काँच से झाँकती मार्क्स की तस्वीरों पर इक-तारा बजाते हुए नेपाली बच्चे की तस्वीर और पाश की नज़्मों पर मूसला-धार आँसुओं की बारिश होने लगी और बाहर रात की तारीकी में कुत्ते भौंकने लगे नसीबों जली बाँकी तिलँगन रात जारी थी

Ekram Khawar

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मेरी शोरिश जुदा आँखों ने मुझ से यूँँ कहा कल शब ये धीमी आँच का जलना तुझे दीवाना कर देगा मैं क्या करता कहाँ जाता कि हाइल था मिरे सीने में इक महबूस सन्नाटा तअ'य्युन कौन करता हम कहाँ पर ख़ेमा-ज़न हैं मुसल्लत है सरों पर कौन सा मनहूस साया और ऐसे में तलातुम रोज़-ओ-शब तेरी लगन का जान लेवा है बड़े ही जाँ-गुसिल हैं तेरी चाहत के सनम-ख़ाने मोहब्बत ख़ून-ए-दिल क्यूँ है तमन्ना सोज़-ए-जाँ क्यूँ है रफ़ीक़ान-ए-सफ़र इतना बताना आरज़ू एक अलमिया क्यूँ है

Ekram Khawar

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शर्क़ से ग़र्ब तक अर्श से फ़र्श तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ मेरी बेकल जबीं के तिलिस्मात से तेरी बेचैन बाँहों के इल्हाम तक तिश्ना होंटों से हलचल भरे जाम तक उन की आँखों के रौशन दियों से मिरी अर्ग़वानी घनी शाम तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ कहकशाँ बुझ गई रास्ते में कहीं रंग-ए-नूर-ए-सहर लुट गया आसमानों में उलझा हुआ मै-कदा नूर का दिलबरान-ए-हरम थक के गुमनाम रस्तों में गुम हो गए रंग-ए-महताब कुम्हला गया मह-रुख़ाँ चश्म-ए-आहू सिफ़त मस्त मदमाती शामों में हसरत की दहलीज़ पर आह भरते रहे और सबा रात भर ज़र्द महताब की आँच में ख़ाक बर-सर भटकती रही या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ हल्का-ए-आशिक़ाँ से लब-ए-बाम तक दस्त-ए-साक़ी से दुर्द-ए-तह-ए-जाम तक दीद-ए-बीना से बिस्मिल के अंजाम तक मा'बदों की ख़मोशी से हंगामा-ए-मजमा'-ए-आम तक शहर-ए-अफ़्सोस की तीरा-ओ-तार गलियों से रौशन दमकती हुई शारा-ए-आम तक याँ कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ रब्ब-ए-मा'बूद गुम आसमानों में है गुंग-ओ-ख़ामोश है बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा नाएब-अल्लाह-फ़िल-अर्ज़ कौन-ओ-मकाँ इश्क़ का माजरा हुस्न का माजरा दर्द का माजरा या ख़ुदा या ख़ुदा कुछ सबील-ए-जज़ा दिल धड़कने को कोई बहाना ख़ुदा

Ekram Khawar

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चाहे जिस तौर बयाँ कीजिए अफ़साना-ए-दर्द जिस्म को ख़ौफ़ बहुत जान को अंदेशे थे चाहे जिस तौर रक़म कीजे गिराँ-जानी-ए-दिल ख़ूँ में हंगामा बहुत राह में वीराने थे लाख चाहा दिल-ए-मुज़्तर की कशाकश से सिवा रक़्स-ए-बे-परवा-ओ-बेबाक का आग़ाज़ करूँँ ख़ून-ए-दिल अश्क करूँँ अश्क गुहर-ताब करूँँ पस-ए-दीवार-ए-क़फ़स सीना-ए-दिल चाक करूँँ लाख चाहा दिल-ए-शोरीदा पे मश्कें थी बहुत लब-ए-मुश्ताक़ पे बूटों की ज़बाँ रक्खी थी जान घबराती थी अंदोह से तन में क्या क्या जान घबराती है अंदोह से तन में क्या क्या

Ekram Khawar

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मुझे लिखना था सरशारी मुझे लिखना था दिलदारी मुझे लिखना था अपना हल्फ़-नामा और बयान-ए-इस्तिग़ासा बादशाह-ए-वक़्त के मग़रूर ऐवान-ए-अदालत में उमडती ख़ल्क़ की मौजूदगी में वारदात-ए-क़त्ल-ए-ख़ूबाँ के हक़ाएक़ और बयान-ए-ख़ल्क़-ए-बरहम मैं क़ासिद था ग़ुलामों का फ़रस्तादा मिरे होने में मुज़्मर थी ख़राबी जुमला इम्कानात-ए-मोहलिक इक भरी बंदूक़ मैं शाइ'र था मुझे एलान करना था मिरे एलान पर होनी थी सफ़-बंदी हिसाब-ए-ख़ूँ-बहा बेबाक होना था रबाब-ए-ज़ि़ंदगी पर आरज़ू का अलमिया गाना अलल-ऐलान चौराहों पे बे-ख़ुद होना गाना रक़्स करना और मर जाना मिरा मंसब मुक़र्रर था

Ekram Khawar

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