nazmKuch Alfaaz

बीसवीं सदी के आख़िरी बरसों में एक गहराती हुई शाम को जब परिंदों और पत्तों का रंग सियाह हो चुका था और दुख का रंग हर रंग पर ग़ालिब था माँ टूट चुकी थी महबूबा रूठ चुकी थी हफ़्ता-वार तातील की फ़राग़त से मुतमइन सरशारी के एक लम्हे को बे-क़रार शाइ'र लिखने बैठा गिर्द-ओ-पेश की दुनिया निहायत आहिस्तगी से ख़फ़ीफ़ पर्दों से छनती हुई ग़ाएब हो गई और पूरी काएनात महदूद हो कर मेज़ के रक़्बे में सिमट आई शाइ'र ना-मालूम कितने ज़मानों तक महबूत बैठा फ़ज़ा की सरगोशियाँ सुनता रहा साएँ साएँ करती ख़ामोशी में मो'तबर अल्फ़ाज़ की तलाश-ओ-जुस्तुजू में ग़लताँ-व-पेचाँ कि यक लख़्त रात की शह-रग से कई ख़ून के फ़व्वारे छूटे और सिसकती सीढ़ियों चीख़ते दरवाज़ों के आहंग पे मेज़ पर पड़ी काँच से झाँकती मार्क्स की तस्वीरों पर इक-तारा बजाते हुए नेपाली बच्चे की तस्वीर और पाश की नज़्मों पर मूसला-धार आँसुओं की बारिश होने लगी और बाहर रात की तारीकी में कुत्ते भौंकने लगे नसीबों जली बाँकी तिलँगन रात जारी थी

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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मेरी शोरिश जुदा आँखों ने मुझ से यूँँ कहा कल शब ये धीमी आँच का जलना तुझे दीवाना कर देगा मैं क्या करता कहाँ जाता कि हाइल था मिरे सीने में इक महबूस सन्नाटा तअ'य्युन कौन करता हम कहाँ पर ख़ेमा-ज़न हैं मुसल्लत है सरों पर कौन सा मनहूस साया और ऐसे में तलातुम रोज़-ओ-शब तेरी लगन का जान लेवा है बड़े ही जाँ-गुसिल हैं तेरी चाहत के सनम-ख़ाने मोहब्बत ख़ून-ए-दिल क्यूँ है तमन्ना सोज़-ए-जाँ क्यूँ है रफ़ीक़ान-ए-सफ़र इतना बताना आरज़ू एक अलमिया क्यूँ है

Ekram Khawar

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शर्क़ से ग़र्ब तक अर्श से फ़र्श तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ मेरी बेकल जबीं के तिलिस्मात से तेरी बेचैन बाँहों के इल्हाम तक तिश्ना होंटों से हलचल भरे जाम तक उन की आँखों के रौशन दियों से मिरी अर्ग़वानी घनी शाम तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ कहकशाँ बुझ गई रास्ते में कहीं रंग-ए-नूर-ए-सहर लुट गया आसमानों में उलझा हुआ मै-कदा नूर का दिलबरान-ए-हरम थक के गुमनाम रस्तों में गुम हो गए रंग-ए-महताब कुम्हला गया मह-रुख़ाँ चश्म-ए-आहू सिफ़त मस्त मदमाती शामों में हसरत की दहलीज़ पर आह भरते रहे और सबा रात भर ज़र्द महताब की आँच में ख़ाक बर-सर भटकती रही या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ हल्का-ए-आशिक़ाँ से लब-ए-बाम तक दस्त-ए-साक़ी से दुर्द-ए-तह-ए-जाम तक दीद-ए-बीना से बिस्मिल के अंजाम तक मा'बदों की ख़मोशी से हंगामा-ए-मजमा'-ए-आम तक शहर-ए-अफ़्सोस की तीरा-ओ-तार गलियों से रौशन दमकती हुई शारा-ए-आम तक याँ कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ रब्ब-ए-मा'बूद गुम आसमानों में है गुंग-ओ-ख़ामोश है बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा नाएब-अल्लाह-फ़िल-अर्ज़ कौन-ओ-मकाँ इश्क़ का माजरा हुस्न का माजरा दर्द का माजरा या ख़ुदा या ख़ुदा कुछ सबील-ए-जज़ा दिल धड़कने को कोई बहाना ख़ुदा

Ekram Khawar

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चाहे जिस तौर बयाँ कीजिए अफ़साना-ए-दर्द जिस्म को ख़ौफ़ बहुत जान को अंदेशे थे चाहे जिस तौर रक़म कीजे गिराँ-जानी-ए-दिल ख़ूँ में हंगामा बहुत राह में वीराने थे लाख चाहा दिल-ए-मुज़्तर की कशाकश से सिवा रक़्स-ए-बे-परवा-ओ-बेबाक का आग़ाज़ करूँँ ख़ून-ए-दिल अश्क करूँँ अश्क गुहर-ताब करूँँ पस-ए-दीवार-ए-क़फ़स सीना-ए-दिल चाक करूँँ लाख चाहा दिल-ए-शोरीदा पे मश्कें थी बहुत लब-ए-मुश्ताक़ पे बूटों की ज़बाँ रक्खी थी जान घबराती थी अंदोह से तन में क्या क्या जान घबराती है अंदोह से तन में क्या क्या

Ekram Khawar

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मुझे लिखना था सरशारी मुझे लिखना था दिलदारी मुझे लिखना था अपना हल्फ़-नामा और बयान-ए-इस्तिग़ासा बादशाह-ए-वक़्त के मग़रूर ऐवान-ए-अदालत में उमडती ख़ल्क़ की मौजूदगी में वारदात-ए-क़त्ल-ए-ख़ूबाँ के हक़ाएक़ और बयान-ए-ख़ल्क़-ए-बरहम मैं क़ासिद था ग़ुलामों का फ़रस्तादा मिरे होने में मुज़्मर थी ख़राबी जुमला इम्कानात-ए-मोहलिक इक भरी बंदूक़ मैं शाइ'र था मुझे एलान करना था मिरे एलान पर होनी थी सफ़-बंदी हिसाब-ए-ख़ूँ-बहा बेबाक होना था रबाब-ए-ज़ि़ंदगी पर आरज़ू का अलमिया गाना अलल-ऐलान चौराहों पे बे-ख़ुद होना गाना रक़्स करना और मर जाना मिरा मंसब मुक़र्रर था

Ekram Khawar

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बहुत कुछ चाहता था मैं हमेशा चाहता था मैं कि दुनिया ख़ूब-सूरत हो कि जैसी प्यार करते वक़्त होती है चाहता था शाम होते ही उतर आए फ़लक से चाँद बच्चों की हथेली में कि शब तारीक हो जितनी मगर नम हो खनक हो और पूरब की हवाएँ सुबुक रफ़्तार गुज़रें छतों पर ओस हो और आँगनों में कहकशाँ उतरे हमेशा चाहता था मैं कि आँसू ही नहीं हों और अगर हों तो वफ़ूर-ए-सर-कशी के ज़बाँ में कोई लुक्नत और होंटों में कोई लर्ज़िश न हो हरगिज़ अगर हो तो मोहब्बत की तपिश में ख़ुदाओं की तरह क़ादिर हमारे बाप बूढे ही न हों और अप्सराओं और परियों सी हसीं महबूब माएँ अपने बच्चों को न रोएँ किसी बच्चे की आँखों में कभी वहशत न दर आए कोई दुनिया से ना-महरम न गुज़रे जवाँ होने से पहले सारे बच्चे भाग जाएँ अपने घर से और दुनियाएँ बसाएँ या कोई बच्चा किसी घर से न भागे हमारे गाँव की अल्हड़ हसीना की जवानी इतनी जल्दी तो न गुज़रे बहुत दिन बहुत दिन और ठहरे और जश्न की शब जब बिसात-ए-रक़्स क़ाएम हो रौशनी बरदार चेहरे भी मुनव्वर हों चाहता था कि जिन्हें होने का कोई हक़ नहीं था ऐसे सारे लफ़्ज़ बाहर हों ज़बानों से हमारी और दुनिया भर के सारे लोग शाइ'र हों हमेशा चाहता था बड़ी मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं कि जैसे चाहता था साथ एक लड़की का सर्द यख़-बस्ता हवाओं में शरारे भरने वाली एक लड़की या कोई मर्तूब मौसम या कि शबनम में नहाई सीढ़ियों से चाँद तक भीगी हुई इक रात शब-ए-सेहरा मुलाएम गरम-जोशी से बनी दुनिया हलावत और हिद्दत से बनी दुनिया सीना-ए-शाइर में इक मग़रूर परचम एक लड़की एक दुनिया बहुत मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं कि जैसे चाहता था ज़िंदगी में कोई मौसीक़ी कोई नग़्मा आशनाई दर्द के मिज़राब से सर्द ज़िंदगी का कोई बरजस्ता तराना एक कमरा और बिस्तर एक रज़ाई मेज़ और कुर्सी किताबें और दवाएँ दोस्तों के ख़त एक खिड़की और थोड़ी छत थोड़ी मस्ती और बे-ख़ौफ़ी मैं ये भी चाहता था और वो भी चाहता था मैं सब कुछ चाहता था बहुत मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं बहुत मा'मूली चीज़ों पर टिकी थी ज़िंदगी मेरी मुझे अफ़्सोस है इस का मेरी आँखों ने देखा था जहाँ को आरिज़-ए-महबूब की सूरत हमारे ज़ेहन में हर ख़्वाब की तफ़्सील थी हर हुस्न का इम्कान था आसमाँ कुछ भी नहीं एक खेल का मैदान था बच्चों की ख़ातिर और समुंदर महज़ एक काँच की चादर जिसे लिखने की ख़ातिर मेज़ पर रखा गया था वाक़िआ''' तो ये है कि दुनिया मिरे कमरे से ज़ियादा कुछ नहीं थी मुझे मालूम था कि फूल किस गोशे में होंगे क़लम होगा कहाँ पर किस जगह खेलेंगे बच्चे और ख़ंजर किस जगह होगा

Ekram Khawar

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