nazmKuch Alfaaz

बहुत कुछ चाहता था मैं हमेशा चाहता था मैं कि दुनिया ख़ूब-सूरत हो कि जैसी प्यार करते वक़्त होती है चाहता था शाम होते ही उतर आए फ़लक से चाँद बच्चों की हथेली में कि शब तारीक हो जितनी मगर नम हो खनक हो और पूरब की हवाएँ सुबुक रफ़्तार गुज़रें छतों पर ओस हो और आँगनों में कहकशाँ उतरे हमेशा चाहता था मैं कि आँसू ही नहीं हों और अगर हों तो वफ़ूर-ए-सर-कशी के ज़बाँ में कोई लुक्नत और होंटों में कोई लर्ज़िश न हो हरगिज़ अगर हो तो मोहब्बत की तपिश में ख़ुदाओं की तरह क़ादिर हमारे बाप बूढे ही न हों और अप्सराओं और परियों सी हसीं महबूब माएँ अपने बच्चों को न रोएँ किसी बच्चे की आँखों में कभी वहशत न दर आए कोई दुनिया से ना-महरम न गुज़रे जवाँ होने से पहले सारे बच्चे भाग जाएँ अपने घर से और दुनियाएँ बसाएँ या कोई बच्चा किसी घर से न भागे हमारे गाँव की अल्हड़ हसीना की जवानी इतनी जल्दी तो न गुज़रे बहुत दिन बहुत दिन और ठहरे और जश्न की शब जब बिसात-ए-रक़्स क़ाएम हो रौशनी बरदार चेहरे भी मुनव्वर हों चाहता था कि जिन्हें होने का कोई हक़ नहीं था ऐसे सारे लफ़्ज़ बाहर हों ज़बानों से हमारी और दुनिया भर के सारे लोग शाइ'र हों हमेशा चाहता था बड़ी मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं कि जैसे चाहता था साथ एक लड़की का सर्द यख़-बस्ता हवाओं में शरारे भरने वाली एक लड़की या कोई मर्तूब मौसम या कि शबनम में नहाई सीढ़ियों से चाँद तक भीगी हुई इक रात शब-ए-सेहरा मुलाएम गरम-जोशी से बनी दुनिया हलावत और हिद्दत से बनी दुनिया सीना-ए-शाइर में इक मग़रूर परचम एक लड़की एक दुनिया बहुत मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं कि जैसे चाहता था ज़िंदगी में कोई मौसीक़ी कोई नग़्मा आशनाई दर्द के मिज़राब से सर्द ज़िंदगी का कोई बरजस्ता तराना एक कमरा और बिस्तर एक रज़ाई मेज़ और कुर्सी किताबें और दवाएँ दोस्तों के ख़त एक खिड़की और थोड़ी छत थोड़ी मस्ती और बे-ख़ौफ़ी मैं ये भी चाहता था और वो भी चाहता था मैं सब कुछ चाहता था बहुत मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं बहुत मा'मूली चीज़ों पर टिकी थी ज़िंदगी मेरी मुझे अफ़्सोस है इस का मेरी आँखों ने देखा था जहाँ को आरिज़-ए-महबूब की सूरत हमारे ज़ेहन में हर ख़्वाब की तफ़्सील थी हर हुस्न का इम्कान था आसमाँ कुछ भी नहीं एक खेल का मैदान था बच्चों की ख़ातिर और समुंदर महज़ एक काँच की चादर जिसे लिखने की ख़ातिर मेज़ पर रखा गया था वाक़िआ''' तो ये है कि दुनिया मिरे कमरे से ज़ियादा कुछ नहीं थी मुझे मालूम था कि फूल किस गोशे में होंगे क़लम होगा कहाँ पर किस जगह खेलेंगे बच्चे और ख़ंजर किस जगह होगा

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मेरी शोरिश जुदा आँखों ने मुझ से यूँँ कहा कल शब ये धीमी आँच का जलना तुझे दीवाना कर देगा मैं क्या करता कहाँ जाता कि हाइल था मिरे सीने में इक महबूस सन्नाटा तअ'य्युन कौन करता हम कहाँ पर ख़ेमा-ज़न हैं मुसल्लत है सरों पर कौन सा मनहूस साया और ऐसे में तलातुम रोज़-ओ-शब तेरी लगन का जान लेवा है बड़े ही जाँ-गुसिल हैं तेरी चाहत के सनम-ख़ाने मोहब्बत ख़ून-ए-दिल क्यूँ है तमन्ना सोज़-ए-जाँ क्यूँ है रफ़ीक़ान-ए-सफ़र इतना बताना आरज़ू एक अलमिया क्यूँ है

Ekram Khawar

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चाहे जिस तौर बयाँ कीजिए अफ़साना-ए-दर्द जिस्म को ख़ौफ़ बहुत जान को अंदेशे थे चाहे जिस तौर रक़म कीजे गिराँ-जानी-ए-दिल ख़ूँ में हंगामा बहुत राह में वीराने थे लाख चाहा दिल-ए-मुज़्तर की कशाकश से सिवा रक़्स-ए-बे-परवा-ओ-बेबाक का आग़ाज़ करूँँ ख़ून-ए-दिल अश्क करूँँ अश्क गुहर-ताब करूँँ पस-ए-दीवार-ए-क़फ़स सीना-ए-दिल चाक करूँँ लाख चाहा दिल-ए-शोरीदा पे मश्कें थी बहुत लब-ए-मुश्ताक़ पे बूटों की ज़बाँ रक्खी थी जान घबराती थी अंदोह से तन में क्या क्या जान घबराती है अंदोह से तन में क्या क्या

Ekram Khawar

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शर्क़ से ग़र्ब तक अर्श से फ़र्श तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ मेरी बेकल जबीं के तिलिस्मात से तेरी बेचैन बाँहों के इल्हाम तक तिश्ना होंटों से हलचल भरे जाम तक उन की आँखों के रौशन दियों से मिरी अर्ग़वानी घनी शाम तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ कहकशाँ बुझ गई रास्ते में कहीं रंग-ए-नूर-ए-सहर लुट गया आसमानों में उलझा हुआ मै-कदा नूर का दिलबरान-ए-हरम थक के गुमनाम रस्तों में गुम हो गए रंग-ए-महताब कुम्हला गया मह-रुख़ाँ चश्म-ए-आहू सिफ़त मस्त मदमाती शामों में हसरत की दहलीज़ पर आह भरते रहे और सबा रात भर ज़र्द महताब की आँच में ख़ाक बर-सर भटकती रही या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ हल्का-ए-आशिक़ाँ से लब-ए-बाम तक दस्त-ए-साक़ी से दुर्द-ए-तह-ए-जाम तक दीद-ए-बीना से बिस्मिल के अंजाम तक मा'बदों की ख़मोशी से हंगामा-ए-मजमा'-ए-आम तक शहर-ए-अफ़्सोस की तीरा-ओ-तार गलियों से रौशन दमकती हुई शारा-ए-आम तक याँ कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ रब्ब-ए-मा'बूद गुम आसमानों में है गुंग-ओ-ख़ामोश है बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा नाएब-अल्लाह-फ़िल-अर्ज़ कौन-ओ-मकाँ इश्क़ का माजरा हुस्न का माजरा दर्द का माजरा या ख़ुदा या ख़ुदा कुछ सबील-ए-जज़ा दिल धड़कने को कोई बहाना ख़ुदा

Ekram Khawar

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मुझे लिखना था सरशारी मुझे लिखना था दिलदारी मुझे लिखना था अपना हल्फ़-नामा और बयान-ए-इस्तिग़ासा बादशाह-ए-वक़्त के मग़रूर ऐवान-ए-अदालत में उमडती ख़ल्क़ की मौजूदगी में वारदात-ए-क़त्ल-ए-ख़ूबाँ के हक़ाएक़ और बयान-ए-ख़ल्क़-ए-बरहम मैं क़ासिद था ग़ुलामों का फ़रस्तादा मिरे होने में मुज़्मर थी ख़राबी जुमला इम्कानात-ए-मोहलिक इक भरी बंदूक़ मैं शाइ'र था मुझे एलान करना था मिरे एलान पर होनी थी सफ़-बंदी हिसाब-ए-ख़ूँ-बहा बेबाक होना था रबाब-ए-ज़ि़ंदगी पर आरज़ू का अलमिया गाना अलल-ऐलान चौराहों पे बे-ख़ुद होना गाना रक़्स करना और मर जाना मिरा मंसब मुक़र्रर था

Ekram Khawar

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बीसवीं सदी के आख़िरी बरसों में एक गहराती हुई शाम को जब परिंदों और पत्तों का रंग सियाह हो चुका था और दुख का रंग हर रंग पर ग़ालिब था माँ टूट चुकी थी महबूबा रूठ चुकी थी हफ़्ता-वार तातील की फ़राग़त से मुतमइन सरशारी के एक लम्हे को बे-क़रार शाइ'र लिखने बैठा गिर्द-ओ-पेश की दुनिया निहायत आहिस्तगी से ख़फ़ीफ़ पर्दों से छनती हुई ग़ाएब हो गई और पूरी काएनात महदूद हो कर मेज़ के रक़्बे में सिमट आई शाइ'र ना-मालूम कितने ज़मानों तक महबूत बैठा फ़ज़ा की सरगोशियाँ सुनता रहा साएँ साएँ करती ख़ामोशी में मो'तबर अल्फ़ाज़ की तलाश-ओ-जुस्तुजू में ग़लताँ-व-पेचाँ कि यक लख़्त रात की शह-रग से कई ख़ून के फ़व्वारे छूटे और सिसकती सीढ़ियों चीख़ते दरवाज़ों के आहंग पे मेज़ पर पड़ी काँच से झाँकती मार्क्स की तस्वीरों पर इक-तारा बजाते हुए नेपाली बच्चे की तस्वीर और पाश की नज़्मों पर मूसला-धार आँसुओं की बारिश होने लगी और बाहर रात की तारीकी में कुत्ते भौंकने लगे नसीबों जली बाँकी तिलँगन रात जारी थी

Ekram Khawar

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