nazmKuch Alfaaz

"मैं मिलूँगा तुम्हें" दुनिया की‌ परेशानियों से दूर मैं मिलूँगा तुम्हें किसी जंगल में तुम्हारे लिए नज़्में लिखता हुआ अपनी क़लम में तुम्हारे प्यार का रस भरता हुआ पेड़ों से फूलों से तितलियों से तुम्हारी बातें करता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ख़्वाब में मैं मिलूँगा तुम्हें बादलों में मैं मिलूँगा तुम्हें हवाओं में मैं मिलूँगा तुम्हें खिलती धूप में हर रंग में हर रूप में हर गली में हर गाँव में हर शहर में मैं मिलूँगा तुम्हें हर जगह पर? अगर कभी ऐसा हो कि मैं तुम्हें कहीं भी दिखाई ना दूँ तो सब सेे आसान तरीक़ा है मुझ सेे मिलने का तुम अपने अंदर झाँक लेना मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर तुम्हें प्यार करता हुआ तुम्हारा ख़याल रखता हुआ तुम्हारे लिए जीता हुआ तुम्हारे लिए मरता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"चाय का स्वाद" दिसंबर की इस कपकपाती सर्दी में मेरे हाथ में चाय की एक प्याली है और मुझे हर घूँट के साथ वो पिछले दिसंबर का चाय का स्वाद याद आ रहा है वो अपने फूल से हाथों से चाय बनाती थी और चाय के साथ वो बिस्कुट याद है मुझे और वो दो कप जिन पर मेरा और उस का नाम लिखा था याद है मुझे चाय आज भी अच्छी है पर आज चाय का स्वाद बदल गया हैं बिस्कुट भी बदल गए हैं चाय बनाने वाले हाथ भी बदल गए हैं चाय के लिए जो मेरे पहले जज़्बात थे वो जज़्बात भी बदल गए हैं पर, वो नाम वाले कप आज भी मैं ने अपनी अलमारी में किसी ज़ेवर के जैसे सँभाल कर रखे हैं एक इसी आस में कि क्या पता वो शख़्स किसी शाम लौट आए अपने हाथों से फिर से वो चाय बनाए वही बिस्कुट हो और वही कप हो वही मौसम हो वही वो हो वही हम हो और पहले की तरह हम दोनों चाय पीते-पीते एक दूसरे की बातों में खो जाएँ और काश ये बातें सच हो जाएँ

Prince Sodhi

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"बेहद मोहब्बत" उस की मुस्कुराहटें मेरा हाथ पकड़ कर मुझ सेे शा'इरी लिखवाती है उस का चेहरा किसी किताब के जैसा देखो तो कुछ भी नहीं पढ़ो तो बहुत कुछ उस की आँखें किसी समुंदर के जैसी देखो तो कुछ भी नहीं डूबो तो बहुत गहरी चुप-चाप सी रहती है ज़्यादा नहीं बोलती पर उस की आवाज़ सुनो तो कोयल से भी प्यारी उस की ज़ुल्फ़ें ज़्यादा घनी नहीं हैं वैसे तो पर उन में उलझ जाए दुनिया सारी वो छाँव है वो धूप है वो मेरी ज़िंदगी का रंग रूप है वो संगीत है जिस को मैं गुनगुनाता हूँ वो साहिल है मेरा जहाँ मैं ठहर जाता हूँ उस की साँसों में जो महक है वो किसी गुलाब में कहाँ उस के चेहरे सी मासूमियत किसी और चेहरे में कहाँ वो तितलियों से प्यार करती है तितलियाँ फूलों को भूल गई वो छूएगी उन्हें आ कर तितलियाँ उस का इंतिज़ार करती है वही प्यार है वही ख़ुमार है उस पर ही जाँ निसार है मुझे तो उस की हर अदा उस के अंग-अंग से प्यार है मेरी बातों में बातें उस की मेरी साँसों में साँसें उस की मेरी ग़ज़लों में वो बसती है मेरी नज़्मों की वो हस्ती है मेरी नींदों में है ख़्वाब वही मेरी आँखों का है आब वही पास नहीं होती वो मेरे फिर भी मेरे साथ है वो मेरे दिल की धड़कन वो ही जीने की इक आस है वो दिल पे रख के हाथ मैं सच में कहता हूँ प्रिंस वो मेरी जान है मैं उस पे मरता हूँ दुनिया में एलान आज ये करता हूँ उस लड़की से बेहद मोहब्बत मैं करता हूँ

Prince Sodhi

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"मैं सो जाता हूँ" हर दिन रात को मैं और मेरे कमरे की दीवारें अक्सर ये बातें करते हैं ज़िंदगी ऐसे होती तो क्या होता ज़िंदगी वैसे होती तो क्या होता जो लड़की महीना भर हो गया शायद मुझ को तन्हाइयों के दलदल में छोड़कर चली गई थी वो आज भी अगर साथ होती तो क्या होता कभी-कभी तो अजीब से ख़याल आते हैं मन में कि चाँद दिन में और सूरज रात में उगता तो क्या होता हमारे पास अलादीन का चराग़ होता तो क्या होता हम उस सेे कुछ माँगते क्या वो सचमुच में पूरा होता यही सब सोचते सोचते मेरी पलकों पर नींद का पहरा लग जाता है यही सब सोचते सोचते मैं ख़्वाबों की नगरी में चला जाता हूँ और मैं सो जाता हूँ

Prince Sodhi

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