nazmKuch Alfaaz

"मैं सो जाता हूँ" हर दिन रात को मैं और मेरे कमरे की दीवारें अक्सर ये बातें करते हैं ज़िंदगी ऐसे होती तो क्या होता ज़िंदगी वैसे होती तो क्या होता जो लड़की महीना भर हो गया शायद मुझ को तन्हाइयों के दलदल में छोड़कर चली गई थी वो आज भी अगर साथ होती तो क्या होता कभी-कभी तो अजीब से ख़याल आते हैं मन में कि चाँद दिन में और सूरज रात में उगता तो क्या होता हमारे पास अलादीन का चराग़ होता तो क्या होता हम उस सेे कुछ माँगते क्या वो सचमुच में पूरा होता यही सब सोचते सोचते मेरी पलकों पर नींद का पहरा लग जाता है यही सब सोचते सोचते मैं ख़्वाबों की नगरी में चला जाता हूँ और मैं सो जाता हूँ

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"चाय का स्वाद" दिसंबर की इस कपकपाती सर्दी में मेरे हाथ में चाय की एक प्याली है और मुझे हर घूँट के साथ वो पिछले दिसंबर का चाय का स्वाद याद आ रहा है वो अपने फूल से हाथों से चाय बनाती थी और चाय के साथ वो बिस्कुट याद है मुझे और वो दो कप जिन पर मेरा और उस का नाम लिखा था याद है मुझे चाय आज भी अच्छी है पर आज चाय का स्वाद बदल गया हैं बिस्कुट भी बदल गए हैं चाय बनाने वाले हाथ भी बदल गए हैं चाय के लिए जो मेरे पहले जज़्बात थे वो जज़्बात भी बदल गए हैं पर, वो नाम वाले कप आज भी मैं ने अपनी अलमारी में किसी ज़ेवर के जैसे सँभाल कर रखे हैं एक इसी आस में कि क्या पता वो शख़्स किसी शाम लौट आए अपने हाथों से फिर से वो चाय बनाए वही बिस्कुट हो और वही कप हो वही मौसम हो वही वो हो वही हम हो और पहले की तरह हम दोनों चाय पीते-पीते एक दूसरे की बातों में खो जाएँ और काश ये बातें सच हो जाएँ

Prince Sodhi

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"मैं मिलूँगा तुम्हें" दुनिया की‌ परेशानियों से दूर मैं मिलूँगा तुम्हें किसी जंगल में तुम्हारे लिए नज़्में लिखता हुआ अपनी क़लम में तुम्हारे प्यार का रस भरता हुआ पेड़ों से फूलों से तितलियों से तुम्हारी बातें करता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ख़्वाब में मैं मिलूँगा तुम्हें बादलों में मैं मिलूँगा तुम्हें हवाओं में मैं मिलूँगा तुम्हें खिलती धूप में हर रंग में हर रूप में हर गली में हर गाँव में हर शहर में मैं मिलूँगा तुम्हें हर जगह पर? अगर कभी ऐसा हो कि मैं तुम्हें कहीं भी दिखाई ना दूँ तो सब सेे आसान तरीक़ा है मुझ सेे मिलने का तुम अपने अंदर झाँक लेना मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर तुम्हें प्यार करता हुआ तुम्हारा ख़याल रखता हुआ तुम्हारे लिए जीता हुआ तुम्हारे लिए मरता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर

Prince Sodhi

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"बेहद मोहब्बत" उस की मुस्कुराहटें मेरा हाथ पकड़ कर मुझ सेे शा'इरी लिखवाती है उस का चेहरा किसी किताब के जैसा देखो तो कुछ भी नहीं पढ़ो तो बहुत कुछ उस की आँखें किसी समुंदर के जैसी देखो तो कुछ भी नहीं डूबो तो बहुत गहरी चुप-चाप सी रहती है ज़्यादा नहीं बोलती पर उस की आवाज़ सुनो तो कोयल से भी प्यारी उस की ज़ुल्फ़ें ज़्यादा घनी नहीं हैं वैसे तो पर उन में उलझ जाए दुनिया सारी वो छाँव है वो धूप है वो मेरी ज़िंदगी का रंग रूप है वो संगीत है जिस को मैं गुनगुनाता हूँ वो साहिल है मेरा जहाँ मैं ठहर जाता हूँ उस की साँसों में जो महक है वो किसी गुलाब में कहाँ उस के चेहरे सी मासूमियत किसी और चेहरे में कहाँ वो तितलियों से प्यार करती है तितलियाँ फूलों को भूल गई वो छूएगी उन्हें आ कर तितलियाँ उस का इंतिज़ार करती है वही प्यार है वही ख़ुमार है उस पर ही जाँ निसार है मुझे तो उस की हर अदा उस के अंग-अंग से प्यार है मेरी बातों में बातें उस की मेरी साँसों में साँसें उस की मेरी ग़ज़लों में वो बसती है मेरी नज़्मों की वो हस्ती है मेरी नींदों में है ख़्वाब वही मेरी आँखों का है आब वही पास नहीं होती वो मेरे फिर भी मेरे साथ है वो मेरे दिल की धड़कन वो ही जीने की इक आस है वो दिल पे रख के हाथ मैं सच में कहता हूँ प्रिंस वो मेरी जान है मैं उस पे मरता हूँ दुनिया में एलान आज ये करता हूँ उस लड़की से बेहद मोहब्बत मैं करता हूँ

Prince Sodhi

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