nazmKuch Alfaaz

'मैं अधूरा हूँ' जब मैं कोई नज़्म लिख रहा होता हूँ बहुत गहराई में उतर चुका होता हूँ तब कोई मुझे बुला लेता है आवाज़ दे कर चौंका देता है तो नज़्म अधूरी छोड़ कर मुझ को बात अधूरी छोड़ कर मुझ को मजबूरन जाना पड़ता है तो याद मुझे वो आती है वो भी तो अधूरा छोड़ गई थी मुझ सेे हर रिश्ता तोड़ गई थी जाने उस की क्या मजबूरी होगी जाने उसे किस ने बुलाया होगा

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"क्या अब भी" जवाँ हो कर भी बचपन की उँगली थाम कर खेलना तेरा पल भर में मुस्कुराना और फिर रूठ जाना तेरा सोचता हूँ अपनी तन्हाई में एक अर्सा हो गया तुझे देखा नहीं '' क्या अब भी तेरी ज़ुल्फ़ों में हवाएँ गुमशुदा होती होंगी जो अक्सर फिसल कर आ जाती थीं तुम्हारी ज़ुल्फ़ें गालों तक क्या अब भी कानों के पीछे रखी जाती होंगी उँगलियों से

Arjun Dubey Ashk

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“मैच्योरिटी” तुम कहती हो मैच्योर बनो मैच्योर क्या है ये मैच्योरिटी? क्या ख़ामोशियों के सुई धागे से सिल दूँ अपने होंट? निकलने न दूँ कोई भी सदा? क्या दर्द हो तो मुस्कुरा दूँ? चीख़ को गले से बाहर न आने दूँ? क्या किसी भी क्रिया पर कोई प्रतिक्रिया न दूँ? क्या यही है मैच्योरिटी? तब तो पत्थरों से बनी हुई मूर्तियाँ ...बहुत मैच्योर होती होंगी! तब तो तुम्हें पत्थरों से दोस्ती करनी चाहिए थी

Arjun Dubey Ashk

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“नज़्म” मुझे नहीं मालूम नज़्म कैसे लिखते हैं मैं तो बस ख़यालों की दुनियां में पहुँच जाता हूँ जहाँ पर छोटी, बड़ी नज़्म उड़ती रहती हैं तितली के मानिंद…. मैं अपनी डाइरी खोल कर रख देता हूँ! जैसे मछुवारा मछली के लिए बंशी दरिया में डाल कर इंतिज़ार करता है ठीक वैसे ही मेरी डाइरी में कुछ देर बा'द कोई नज़्म आ कर बैठती है मैं झट से डाइरी बंद कर लेता हूँ कुछ ऐसे ही मैं नज़्म कह लेता हूँ

Arjun Dubey Ashk

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'दोस्ती' जनवरी की सर्द भरी रात में जब रज़ाई ओढ़ने के बावजूद भी इंसान की ठंड नहीं जाती उस वक़्त किसी गरीब को अगर एक पतली सी चादर भी मिल जाए तो... उसे जो थोड़ी सी राहत मिलती है तुम्हारी दोस्ती उस सर्द भरी रात की वो पतली सी चादर है

Arjun Dubey Ashk

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"तस्वीर" हालाँकि रोता ही रहता हूँ शब ओ रोज़ मगर धुँधलाती ही नहीं तेरी तस्वीर का रंग मेरी आँखों से

Arjun Dubey Ashk

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