nazmKuch Alfaaz

“नज़्म” मुझे नहीं मालूम नज़्म कैसे लिखते हैं मैं तो बस ख़यालों की दुनियां में पहुँच जाता हूँ जहाँ पर छोटी, बड़ी नज़्म उड़ती रहती हैं तितली के मानिंद…. मैं अपनी डाइरी खोल कर रख देता हूँ! जैसे मछुवारा मछली के लिए बंशी दरिया में डाल कर इंतिज़ार करता है ठीक वैसे ही मेरी डाइरी में कुछ देर बा'द कोई नज़्म आ कर बैठती है मैं झट से डाइरी बंद कर लेता हूँ कुछ ऐसे ही मैं नज़्म कह लेता हूँ

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है

ZafarAli Memon

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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"क्या अब भी" जवाँ हो कर भी बचपन की उँगली थाम कर खेलना तेरा पल भर में मुस्कुराना और फिर रूठ जाना तेरा सोचता हूँ अपनी तन्हाई में एक अर्सा हो गया तुझे देखा नहीं '' क्या अब भी तेरी ज़ुल्फ़ों में हवाएँ गुमशुदा होती होंगी जो अक्सर फिसल कर आ जाती थीं तुम्हारी ज़ुल्फ़ें गालों तक क्या अब भी कानों के पीछे रखी जाती होंगी उँगलियों से

Arjun Dubey Ashk

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“मैच्योरिटी” तुम कहती हो मैच्योर बनो मैच्योर क्या है ये मैच्योरिटी? क्या ख़ामोशियों के सुई धागे से सिल दूँ अपने होंट? निकलने न दूँ कोई भी सदा? क्या दर्द हो तो मुस्कुरा दूँ? चीख़ को गले से बाहर न आने दूँ? क्या किसी भी क्रिया पर कोई प्रतिक्रिया न दूँ? क्या यही है मैच्योरिटी? तब तो पत्थरों से बनी हुई मूर्तियाँ ...बहुत मैच्योर होती होंगी! तब तो तुम्हें पत्थरों से दोस्ती करनी चाहिए थी

Arjun Dubey Ashk

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'मैं अधूरा हूँ' जब मैं कोई नज़्म लिख रहा होता हूँ बहुत गहराई में उतर चुका होता हूँ तब कोई मुझे बुला लेता है आवाज़ दे कर चौंका देता है तो नज़्म अधूरी छोड़ कर मुझ को बात अधूरी छोड़ कर मुझ को मजबूरन जाना पड़ता है तो याद मुझे वो आती है वो भी तो अधूरा छोड़ गई थी मुझ सेे हर रिश्ता तोड़ गई थी जाने उस की क्या मजबूरी होगी जाने उसे किस ने बुलाया होगा

Arjun Dubey Ashk

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'दोस्ती' जनवरी की सर्द भरी रात में जब रज़ाई ओढ़ने के बावजूद भी इंसान की ठंड नहीं जाती उस वक़्त किसी गरीब को अगर एक पतली सी चादर भी मिल जाए तो... उसे जो थोड़ी सी राहत मिलती है तुम्हारी दोस्ती उस सर्द भरी रात की वो पतली सी चादर है

Arjun Dubey Ashk

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"तस्वीर" हालाँकि रोता ही रहता हूँ शब ओ रोज़ मगर धुँधलाती ही नहीं तेरी तस्वीर का रंग मेरी आँखों से

Arjun Dubey Ashk

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