ऐ बे-नियाज़-ए-शौक़-ए-फ़रावाँ कहाँ है तू ऐ निगहत-ए-शमीम-ए-बहाराँ कहाँ है तू ऐ बाइ'स-ए-फ़रोग़-ए-गुलिस्ताँ कहाँ है तू ऐ रौनक़-ए-वजूद-ए-ख़याबाँ कहाँ है तू पथरा गई हैं आँखें तिरे इंतिज़ार में कुछ तो बता कि ऐ मह-ए-ताबाँ कहाँ है तू वो तेरे शौक़-ए-नग़्मा-सराई को क्या हुआ ऐ यार नग़्मा-रेज़-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ कहाँ है तू तेरे बग़ैर कुछ नहीं लुत्फ़-ए-शराब-ओ-शे'र ऐ निगहत-ए-लतीफ़-ए-ख़याबाँ कहाँ है तू हाँ तेरे दम से रौनक़-ए-बज़्म-ए-वजूद थी ऐ रौशनी-ए-शम-ए-फ़रोज़ाँ कहाँ है तू तेरे बग़ैर ख़ाक-बसर फिर रहा हूँ मैं मेरे बग़ैर सर-ब-गरेबाँ कहाँ है तू
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"एक लड़का" एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ जी मचलता था एक एक शय पर जैब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए आज मेला लगा है उसी शान से आज चाहूँ तो इक इक दुकाँ मोल लूँ आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ ना-रसाई का अब जी में धड़का कहाँ पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ
Ibn E Insha
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पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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ये वक़्त क्या है ये वक़्त क्या है ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है ये वाक़िए हादसे तसादुम हर एक ग़म और हर इक मसर्रत हर इक अज़िय्यत हर एक लज़्ज़त हर इक तबस्सुम हर एक आँसू हर एक नग़्मा हर एक ख़ुशबू वो ज़ख़्म का दर्द हो कि वो लम्स का हो जादू ख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएँ ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल तमाम एहसास सारे जज़्बे ये जैसे पत्ते हैं बहते पानी की सतह पर जैसे तैरते हैं अभी यहाँ हैं अभी वहाँ हैं और अब हैं ओझल दिखाई देता नहीं है लेकिन ये कुछ तो है जो कि बह रहा है ये कैसा दरिया है किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समुंदर को जा रहा है ये वक़्त क्या है कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो तो ऐसा लगता है दूसरी सम्त जा रहे हैं मगर हक़ीक़त में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं तो क्या ये मुमकिन है सारी सदियाँ क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों ये वक़्त साकित हो और हम ही गुज़र रहे हों इस एक लम्हे में सारे लम्हे तमाम सदियाँ छुपी हुई हों न कोई आइंदा न गुज़िश्ता जो हो चुका है जो हो रहा है जो होने वाला है हो रहा है मैं सोचता हूँ कि क्या ये मुमकिन है सच ये हो कि सफ़र में हम हैं गुज़रते हम हैं जिसे समझते हैं हम गुज़रता है वो थमा है गुज़रता है या थमा हुआ है इकाई है या बटा हुआ है है मुंजमिद या पिघल रहा है किसे ख़बर है किसे पता है ये वक़्त क्या है ये काएनात-ए-अज़ीम लगता है अपनी अज़्मत से आज भी मुतइन नहीं है कि लम्हा लम्हा वसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही है ये अपनी बाँहें पसारती है ये कहकशाओं की उँगलियों से नए ख़लाओं को छू रही है अगर ये सच है तो हर तसव्वुर की हद से बाहर मगर कहीं पर यक़ीनन ऐसा कोई ख़ला है कि जिस को इन कहकशाओं की उँगलियों ने अब तक छुआ नहीं है ख़ला जहाँ कुछ हुआ नहीं है ख़ला कि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं है जहाँ अभी तक ख़ुदा नहीं है वहाँ कोई वक़्त भी न होगा ये काएनात-ए-अज़ीम इक दिन छुएगी इस अन-छुए ख़ला को और अपने सारे वजूद से जब पुकारेगी ''कुन'' तो वक़्त को भी जनम मिलेगा अगर जनम है तो मौत भी है मैं सोचता हूँ ये सच नहीं है कि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा है ये डोर लंबी बहुत है लेकिन कहीं तो इस डोर का सिरा है अभी ये इंसाँ उलझ रहा है कि वक़्त के इस क़फ़स में पैदा हुआ यहीं वो पला-बढ़ा है मगर उसे इल्म हो गया है कि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा है तो सोचता है वो पूछता है ये वक़्त क्या है
Javed Akhtar
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं वो अलग बात है- कुछ दरमियाँ नहीं, फिर भी हमें मालूम है तुम बे-वफ़ा नहीं, फिर भी सुना है- आजकल तुम बे-क़रार रहते हो और इतने, कि- शायद बेशुमार रहते हो सुना है- आदतन खाना भी छोड़ रक्खा है तुम ने घर से कहीं जाना भी छोड़ रक्खा है हाँ बेशक! हम को मिले एक अर्सा बीत गया हाँ मगर, अजनबी लोगों का भी भरोसा क्या! हमें मालूम है तुम बे-वफ़ा नहीं, फिर भी लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं वो अक्सर तंज़ करते हैं कि इस ज़माने में तुम्हारी तरह कोई दूसरा कहाँ होगा? तुम्हारी रुख़ है, कि है चाँद जैसा नूर इस में जो तुझ पर मरते हैं उन का भी क्या क़ुसूर इस में बड़ा कम्बख़्त है, ये सबकी ख़बर रखता है ज़माना हर किसी हरकत पे नज़र रखता है. यहाँ लोगों की बातों का भरोसा तो नहीं, पर ये बात सच है बहर-हाल इस ज़माने में तुम्हारी तरह कोई दूसरा कहाँ होगा? ख़ैर, लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं
Ravi Prakash
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