"मलाल" तुम लगा देना मुझे, गर कोई गुलाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम सुना देना मुझे, गर कोई हाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम पूछ लेना मुझे, गर कोई सवाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम थाम लेना मुझे, गर कोई ख़याल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम सज़ा देना मुझे, गर कोई मजाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम क्षमा देना मुझे, गर कोई जलाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम दिखा देना मुझे, गर कोई कमाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो तुम छोड़ देना मुझे, गर कोई गोलमाल हो। तुम बता देना मुझे, गर कोई मलाल हो
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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" मेरा दुश्मन " तू इतना जो मुझे प्यार कर रहा है, कौन है जो तेरे कान भर रहा है तू चाहता है दोस्ती कर लूँ तुझ सेे, जानता है न तू दुश्मन बेहतर रहा है दोस्ती से अच्छी तो दुश्मनी है तेरी, पर तेरा तो दुश्मनी से जी भर रहा है तेरी ही ज़िद से दुश्मनी शुरू हुई, अब तू ही दुश्मनी से मुकर रहा है मैं तो चाहता था मिसाल दुश्मनी की, दोस्ती की बात से तो दिल डर रहा है
Sahil Verma
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"इंतिज़ार" कितनी राहें देखूँ कितना इंतिज़ार करूँँ कह दिया है उस ने दुगना इंतिज़ार करूँँ वो भी तो कभी मेरी तरह इंतिज़ार करे आख़िर मैं ही क्यूँँ तन्हा इंतिज़ार करूँँ फिर मरेगा कोई मजनूँ उस के प्यार में कह रही है फिर से लैला इंतिज़ार करूँँ इज़हार हो गया इक़रार भी कर लिया है फिर भी यही दिलासा इंतिज़ार करूँँ ज़िन्दगी है कि मरने नहीं दे रही मुझ को मौत कह रही है बस थोड़ा इंतिज़ार करूँँ
Sahil Verma
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" तुम मुझे गले नहीं लगातीं " मेरी बाहें राह देख थक जातीं तुम्हारे सितम पर मुझ को हैरानियाँ तक नहीं आतीं और मैं तुम्हारे ख़्वाबों को नैनों से बहती धारों को इन होंठों की मुस्कानों को झुमके वाले कानों को तुम्हारे उन सभी राज़ों को अपने अनकहे वादों को कुछ मज़बूत इरादों को तुम्हारी चश्मदीद निगाहों को तुम्हारी कड़वी-मीठी बातों को तुम्हारे बँधे हुए बालों को साँवले ख़ूब-सूरत हाथों को खिलखिलाते तुम्हारे दाँतों को तुम्हारे संग बिताई यादों को कब से बाहों में भर चुका हूँ दिल-लगी से तुम्हारी तर चुका हूँ तुम इक यही रस्म क्यूँँ नहीं निभातीं आख़िर तुम मुझे गले क्यूँँ नहीं लगातीं
Sahil Verma
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“ख़्वाब” मैं दिन में माहताब देखता हूँ मैं रातों को आफ़ताब देखता हूँ मैं आँखों में हिजाब देखता हूँ मैं अश्कों को शराब देखता हूँ मैं सवालों में जवाब देखता हूँ मैं किताबों को शादाब देखता हूँ मैं ख़ुद को बे-नक़ाब देखता हूँ मैं तुझ को बे-हिसाब देखता हूँ मैं हर सपना नायाब देखता हूँ यूँँ ही नहीं इतने ख़्वाब देखता हूँ
Sahil Verma
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“सुन री सखी” यूँँ ख़याल रख सखी जैसे तेरा ऐनक हूँ मैं यूँँ खिंचा जाऊँ तेरी ओर जैसे चुम्बक हूँ मैं बरसात होने के बा'द निकलते हैं कीट-पतंगे पर तुझे जो पसंद आएगा वही मेंढ़क हूँ मैं यार तू तो समझती ही नहीं है मेरी ख़ामोशी कब से इशारों में कह रहा तेरा सेवक हूँ मैं ऐ सखी क्यूँँ डरती है इक़रार-ए-मोहब्बत से यूँँ माँग रब से जैसे तेरा पूरा-पूरा हक़ हूँ मैं सावन की बरसातें बड़ी प्यारी होती हैं सखी तेरी गीली ज़ुल्फ़ें भीगी-भीगी पलक हूँ मैं देख सखी यूँँ नादानी में मुझे खो मत देना तेरा यार और इक पागल-सा बालक हूँ मैं
Sahil Verma
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