"मेरी हस्ती" मेरी हस्ती को दुनिया में इस तरह से भुलाया गया मैं कमोबेश ऐसा न था जैसा तुम को बताया गया दुनिया को इस तरह जानने का जुनूँ मुझ में भी था नवी दुनिया की नज़रों में ही मुझे कैसे यूँँ भी सताया गया बात को दिल से भी तो कहा जैसे हो आसमाँ झुक गया पंख लगने लगे ख़्वाबों को ज़हर भी वो पिलाया गया मंज़िलें पाना आसाँ नहीं कल को भी पाना आसाँ नहीं सच्ची बातें नहीं चलती जब झूठ किस्तों में लाया गया
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"किरदार सियासत के" सियासत के क़िरदार बहुत हैं कौन है क़ाबिज़ यहाँ हक़दार बहुत हैं हूँ कश्मकश में निशब्द ज़बाँ भी फिर भी दिल में यूँँ ग़ुबार बहुत हैं मेरी मिलक़ियत तुझ सेे जुड़ी ऐ मेरे वतन सींचता हूँ वतनपरस्ती का वो चमन कैसे कहूँ दाग़दार नहीं हस्ती यहाँ किसी की सफ़ेद लिबासों में भी छुपे दाग़दार बहुत हैं एक क़तरा लहू बिछाकर तो देखो इस मिट्टी के लिए जाँ लुटाकर तो देखो मरना है तो देश के लिए कुछ कर के मरो कह सके हिफ़ाज़त को यहाँ पहरेदार बहुत हैं फ़र्क ख़ुदा या भगवानों में नहीं इंसानियत बिकती दुकानों में नहीं किसी को मुस्कुराहट देकर तो देखो एक मुस्कुराहट के यहाँ ख़रीदार बहुत हैं फ़र्क न करना कि ख़ून का रंग भी बदलता है 'नवी' हिमायती उस का जो इंसानियत की राह पर चलता है फूँक ही डाला था चमन को कुछ सियासतदारों ने ऐसी सोच के यहाँ बीमार बहुत हैं उठो चैन से सोने वालों झूठी सियासत पर रोने वालों अब कर गुजरने का वक़्त है आया इस अन्दरूनी कलह को पिरोने वालो किस किस से बचाऊँ मुल्क को मेरे यहाँ अपने ही छुपे बैठे ग़द्दार बहुत हैं
Naviii dar b dar
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"होली" ये होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग न कोई छोटा न बड़ा खेलें मिल कर संग होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग कहीं थाल अबीर भरी कहीं रंगों से भरी पिचकारी कभी तू मुझ को रंग लगाए कभी रंगों की मेरी बारी दुश्मन भी अब दोस्त बनकर झू में मस्त मलंग ये होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग कल की फ़िक्र छोड़कर यारो इस पल में जीना सीखें रंगों को जीवन में अपनाकर आओ जीवन जीना सीखें भूल कर उन ग़मों को यारों आओ झू में नाचे संग ये होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग पकवानों के स्वाद में समय बीत न जाए बा'द में कोई गुलाल लगाओ यारो कोई लगाओ रंग
Naviii dar b dar
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"बचपन" उम्र की इस दहलीज़ पे यूँँ भोलेपन में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है ना-समझी के वो सारे क़िस्से और वो कहानियाँ सच्ची थीं उस दौर की बातें भी तो इस दौर से अच्छी थीं मीठी यादों के साए लिए आँखों के दर्पण में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है
Naviii dar b dar
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"मीठी तक़रार" मेरे हालात को तुम जानकर क्यूँ मुस्कुराते हो फ़क़त ख़ामोश रहते हो निगाहें क्यूँ चुराते हो जो दिल में बात है मुझ को भला कहके तो देखो तुम ये नज़रें चार हों कैसे मुझे तुम भूल जाते हो हज़ारों ख़्वाब ऐसे हैं जो पूरे हो नहीं सकते मुहब्बत के सफ़र में दिल अधूरे हो नहीं सकते मिलें मुझ को सितारे चाँद क़दमों में इन्हें लाऊॅं ये वा'दा करते हो मुझ सेे उसी पल भूल जाते हो
Naviii dar b dar
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"क़द्र" मेरी बातों को अपने दिल में याद कौन रखेगा ज़िंदगानी की रिवायतों को आबाद कौन रखेगा जब मुंसिफ़ का इंसाफ़ दिलों को जोड़ डालेगा तब भला अपने घरों को बर्बाद कौन रखेगा क़िस्मतों को कोसने से कुछ हासिल नहीं होता वगरना उस के दर पे दु'आओं की फ़रियाद कौन रखेगा हर ख़्वाब पूरे न हो पाएँ अगर तो उन हसीं सपनों की बुनियाद कौन रखेगा चल रहे हैं जो मंज़िलों को पाने की तलाश में ठोकरों में भी हौसलें की दाद कौन रखेगा कुछ उसूलों के पाबंद हम भी नज़र आते हैं 'नवी' मेरी उन नादानियों को मेरे बा'द कौन रखेगा ज़रा क़द्र करो माँ के साए की भी तुम उस के जाने से फिर सिर पे हाथ कौन रखेगा
Naviii dar b dar
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