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"होली" ये होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग न कोई छोटा न बड़ा खेलें मिल कर संग होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग कहीं थाल अबीर भरी कहीं रंगों से भरी पिचकारी कभी तू मुझ को रंग लगाए कभी रंगों की मेरी बारी दुश्मन भी अब दोस्त बनकर झू में मस्त मलंग ये होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग कल की फ़िक्र छोड़कर यारो इस पल में जीना सीखें रंगों को जीवन में अपनाकर आओ जीवन जीना सीखें भूल कर उन ग़मों को यारों आओ झू में नाचे संग ये होली का हुड़दंग है यारों होली का हुड़दंग पकवानों के स्वाद में समय बीत न जाए बा'द में कोई गुलाल लगाओ यारो कोई लगाओ रंग

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है

ZafarAli Memon

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"मीठी तक़रार" मेरे हालात को तुम जानकर क्यूँ मुस्कुराते हो फ़क़त ख़ामोश रहते हो निगाहें क्यूँ चुराते हो जो दिल में बात है मुझ को भला कहके तो देखो तुम ये नज़रें चार हों कैसे मुझे तुम भूल जाते हो हज़ारों ख़्वाब ऐसे हैं जो पूरे हो नहीं सकते मुहब्बत के सफ़र में दिल अधूरे हो नहीं सकते मिलें मुझ को सितारे चाँद क़दमों में इन्हें लाऊॅं ये वा'दा करते हो मुझ सेे उसी पल भूल जाते हो

Naviii dar b dar

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"मेरी हस्ती" मेरी हस्ती को दुनिया में इस तरह से भुलाया गया मैं कमोबेश ऐसा न था जैसा तुम को बताया गया दुनिया को इस तरह जानने का जुनूँ मुझ में भी था नवी दुनिया की नज़रों में ही मुझे कैसे यूँँ भी सताया गया बात को दिल से भी तो कहा जैसे हो आसमाँ झुक गया पंख लगने लगे ख़्वाबों को ज़हर भी वो पिलाया गया मंज़िलें पाना आसाँ नहीं कल को भी पाना आसाँ नहीं सच्ची बातें नहीं चलती जब झूठ किस्तों में लाया गया

Naviii dar b dar

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"बचपन" उम्र की इस दहलीज़ पे यूँँ भोलेपन में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है ना-समझी के वो सारे क़िस्से और वो कहानियाँ सच्ची थीं उस दौर की बातें भी तो इस दौर से अच्छी थीं मीठी यादों के साए लिए आँखों के दर्पण में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है

Naviii dar b dar

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"जान-ए-बहार" मुद्दतों बा'द वो मिलता ही गया जान-ए-बहार दोष अपनों पे यूँँ मढ़ता ही गया जान-ए-बहार किस तरह उस को भुलाया मैं ने शाम-ओ-सहर प्यार मुझ सेे ही वो करता ही गया जान-ए-बहार किस तरह इश्क़ में सूरत हसीं यूँँ लगती है उम्र कितनी भी हो पर बेहतरीन यूँँ लगती है अब तो बस आँखों से मैं बात किया करता हूँ बात कहने से मैं डरता ही गया जान-ए-बहार अब तो हर एक बात पे यूँँ ज़िक्र उन का आता है किस पे हम दिल हार गए कुछ न सूझ पाता है निकले वो जब चौक मोहल्ले गली चौबारे से प्यार नदियों सा उमड़ता ही गया जान-ए-बहार

Naviii dar b dar

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"किरदार सियासत के" सियासत के क़िरदार बहुत हैं कौन है क़ाबिज़ यहाँ हक़दार बहुत हैं हूँ कश्मकश में निशब्द ज़बाँ भी फिर भी दिल में यूँँ ग़ुबार बहुत हैं मेरी मिलक़ियत तुझ सेे जुड़ी ऐ मेरे वतन सींचता हूँ वतनपरस्ती का वो चमन कैसे कहूँ दाग़दार नहीं हस्ती यहाँ किसी की सफ़ेद लिबासों में भी छुपे दाग़दार बहुत हैं एक क़तरा लहू बिछाकर तो देखो इस मिट्टी के लिए जाँ लुटाकर तो देखो मरना है तो देश के लिए कुछ कर के मरो कह सके हिफ़ाज़त को यहाँ पहरेदार बहुत हैं फ़र्क ख़ुदा या भगवानों में नहीं इंसानियत बिकती दुकानों में नहीं किसी को मुस्कुराहट देकर तो देखो एक मुस्कुराहट के यहाँ ख़रीदार बहुत हैं फ़र्क न करना कि ख़ून का रंग भी बदलता है 'नवी' हिमायती उस का जो इंसानियत की राह पर चलता है फूँक ही डाला था चमन को कुछ सियासतदारों ने ऐसी सोच के यहाँ बीमार बहुत हैं उठो चैन से सोने वालों झूठी सियासत पर रोने वालों अब कर गुजरने का वक़्त है आया इस अन्दरूनी कलह को पिरोने वालो किस किस से बचाऊँ मुल्क को मेरे यहाँ अपने ही छुपे बैठे ग़द्दार बहुत हैं

Naviii dar b dar

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