"मोटर-रिक्शा" बैठ कर एक बार रिक्शे में फिर न बैठेगा यार रिक्शे में आज-कल हो रहा है ज़ोरों पर हुस्न का कारोबार रिक्शे में दे हसीनों को कार से तश्बीह कर हमारा शुमार रिक्शे में आ रहा है मुशाएरे के लिए शाएर-ए-नाम-दार रिक्शे में है जहाँ दो का बैठना मुश्किल ये बिठाते हैं चार रिक्शे में शाह-राहों पे रोज़ होते हैं हादसे बे-शुमार रिक्शे में
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"जश्न-ए-आज़ादी" काम जो रिश्वत से बन जाए बनाना चाहिए चोर-बाज़ारी में काला धन कमाना चाहिए दूध में पानी बा-आज़ादी मिलाना चाहिए जिस से मतलब हो उसे मक्खन लगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? चावल और गंदुम न कुछ फ़ौलाद पैदा कीजिए निस्फ़ दर्जन कम से कम औलाद पैदा कीजिए मसअले फिर आप ला-तादाद पैदा कीजिए माहिर-ए-मंसूबा-बंदी को भगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? माँग है स्टेरीओ की और वी-सी-आर की ख़ैर हो अब आडियो वीडियो के कारोबार की शक्ल मिलने लग गई हैप्पी से बर-ख़ुरदार की जिस के लप पर हर घड़ी डिस्को तराना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? रिक्शा ओ टैक्सी का मीटर तेज़ होना चाहिए नर्सरी का मास्टर अंग्रेज़ होना चाहिए अक़्द का मेआर इतना ''रेज़'' होना चाहिए ज़िंदगी का पार्टनर मिस्ल-ए-''डियाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? जी में जो आए किए जाओ कि तुम आज़ाद हो मोटरें तेज़ी से दौड़ाओ कि तुम आज़ाद हो हादसा कर के खिसक जाओ कि तुम आज़ाद हो धर लिए जाओ तो फ़ौरन ''मकमकाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? आज इस अंदाज़ को यकसर बदलना है हमें हम बहुत बिगड़े हैं लेकिन अब सँवरना है हमें देस की ख़ातिर ही जीना और मरना है हमें जो न अब तक हो सका अब कर दिखाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए?
Sarfaraz Shahid
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"दफ़्तर-ए-शादी का मुन्तज़िम" वो चलाता है दफ़्तर-ए-शादी दोस्त ऐसा भी इक हमारा है फ़ीस लेता है दिल मिलाने की और इसी काम पर ''गुज़ारा'' है कोई शादी बग़ैर मर जाए ये भला कब उसे गवारा है अक़्द-ए-सानी की जिन को ख़्वाहिश हो उन की उम्मीद का सितारा है जिन को रिश्ता कहीं न मिलता हो उन का ये आख़िरी सहारा है सोचता हूँ कि है वो ख़ुश-क़िस्मत या हक़ीक़त में ग़म का मारा है अन-गिनत शादियाँ करा डालीं और ख़ुद आज तक कँवारा है
Sarfaraz Shahid
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"डॉज-महल" डॉज के नाम से जानाँ तुझे उल्फ़त ही सही डॉज होटल से तुझे ख़ास अक़ीदत ही सही उस की चाय से चिकन सूप से रग़बत ही सही डॉज करना भी अज़ल से तिरी आदत ही सही तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से क़ैस-ओ-लैला भी तो करते थे मोहब्बत लेकिन इश्क़-बाज़ी के लिए दश्त को अपनाते थे हम ही अहमक़ हैं जो होटल में चले आते हैं वो समझदार थे जंगल को निकल जाते थे तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से काश इस मरमरीं होटल के बड़े मतबख़ में तू ने पकते हुए खानों को तो देखा होता वो जो मुर्दार के क़ी में से भरे जाते हैं काश उन रोग़नी नानों को तो देखा होता तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से जानाँ! रोज़ाना तिरे लंच का बिल कैसे दूँ मैं कोई सेठ नहीं कोई स्मगलर भी नहीं मुझ को होती नहीं ऊपर की कमाई हरगिज़ मैं किसी दफ़्तर-ए-मख़्सूस का अफ़सर भी नहीं तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से घाग बैरे ने दिखा कर बड़ा महँगा मेन्यूँँ हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ इश्क़ है मुझ से तो ''कॉफ़ी'' ही को काफ़ी समझो मैं मँगा सकता नहीं मुर्ग़-मुसल्लम का तबाक़ तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से
Sarfaraz Shahid
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"जदीद-तरीन आदमी-नामा" रॉकेट उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी मोटर चला रहा है सो है वो भी आदमी बस में जो जा रहा है सो है वो भी आदमी पैडल घुमा रहा है सो है वो भी आदमी पैदल जो आ रहा है सो है वो भी आदमी पब्लिक से जिस ने वोट लिया वो भी आदमी रिश्वत का जिस ने नोट लिया वो भी आदमी ''लुन्डे'' का जिस ने कोट लिया वो भी आदमी ''चर्ग़ा'' उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी जो दाल खा रहा है सो है वो भी आदमी बिज़नेस कोई करे तो कोई नौकरी करे कोई बने क्लर्क कोई अफ़सरी करे जो कुछ न कर सके वो फ़क़त लीडरी करे जल्सा सजा रहा है सो है वो भी आदमी नारे लगा रहा है सो है वो भी आदमी तस्ख़ीर जो ख़ला की करे वो भी आदमी उड़ जाए चाँद से भी परे वो भी आदमी और इस का जो यक़ीं न करे वो भी आदमी बातें बना रहा है सो है वो भी आदमी कुछ कर दिखा रहा है सो है वो भी आदमी टीवी पे आदमी हमें नग़्में सुनाए है डिस्को करे है आदमी और थरथराए है और कोई बाथ-रूम ही में गुनगुनाए है जो गीत गा रहा है सो है वो भी आदमी जो सर हिला रहा है सो है वो भी आदमी सिगरेट का जो उड़ाए धुआँ वो भी आदमी पीता है हीरोइन जो यहाँ वो भी आदमी निस्वार में जो पाए अमाँ वो भी आदमी बीड़ा चबा रहा है सो है वो भी आदमी जो पी पिला रहा है सो है वो भी आदमी
Sarfaraz Shahid
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"जहाँ सुलताना पढ़ती थी" वो इस कॉलेज की शहज़ादी थी और शाहाना पढ़ती थी वो बे-बाकाना आती थी वो बे-बाकाना पढ़ती थी बड़े मुश्किल सबक़ थे जिन को वो रोज़ाना पढ़ती थी वो लड़की थी मगर मज़मून सब मर्दाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी क्लासों में हमेशा देर से वो आया करती थी किताबों के तले फ़िल्मी रिसाले लाया करती थी वो जब दौरान-ए-लेक्चर बोर सी हो जाया करती थी तो चुपके से कोई ताज़ा-तरीन अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी किताबें देख कर कुढ़ती थी महव-ए-यास होती थी ब-क़ौल उस के किताबों में निरी बकवास होती थी तअज्जुब है कि वो हर साल कैसे पास होती थी जो ''इल्लम'' इल्म को मौलाना को ''मलवाना'' पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी बड़ी मशहूर थी कॉलेज में चर्चा आम था उस का जवानों के दिलों से खेलना बस काम था उस का यहाँ कॉलेज में पढ़ना तो बराए-नाम था उस का कि वो आज़ाद लड़की थी वो आज़ादाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी अजब अंदाज़ के उश्शाक़ थे उस हीर के मा में खड़े रहते थे फाटक पर कई माझे कई गा में जो उस के नाम पर करते थे झगड़े और हंगा में वो उस तूफ़ान में रहती थी तूफ़ानाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी वो सुलताना मगर पहली सी सुलताना नहीं यारो सुना है कोई भी अब उस का दीवाना नहीं यारो कोई इस शम्अ-ए-ख़ाकिस्तर का परवाना नहीं यारो ख़ुद अफ़्साना बनी बैठी है जो अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी
Sarfaraz Shahid
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