"डॉज-महल" डॉज के नाम से जानाँ तुझे उल्फ़त ही सही डॉज होटल से तुझे ख़ास अक़ीदत ही सही उस की चाय से चिकन सूप से रग़बत ही सही डॉज करना भी अज़ल से तिरी आदत ही सही तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से क़ैस-ओ-लैला भी तो करते थे मोहब्बत लेकिन इश्क़-बाज़ी के लिए दश्त को अपनाते थे हम ही अहमक़ हैं जो होटल में चले आते हैं वो समझदार थे जंगल को निकल जाते थे तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से काश इस मरमरीं होटल के बड़े मतबख़ में तू ने पकते हुए खानों को तो देखा होता वो जो मुर्दार के क़ी में से भरे जाते हैं काश उन रोग़नी नानों को तो देखा होता तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से जानाँ! रोज़ाना तिरे लंच का बिल कैसे दूँ मैं कोई सेठ नहीं कोई स्मगलर भी नहीं मुझ को होती नहीं ऊपर की कमाई हरगिज़ मैं किसी दफ़्तर-ए-मख़्सूस का अफ़सर भी नहीं तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से घाग बैरे ने दिखा कर बड़ा महँगा मेन्यूँँ हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ इश्क़ है मुझ से तो ''कॉफ़ी'' ही को काफ़ी समझो मैं मँगा सकता नहीं मुर्ग़-मुसल्लम का तबाक़ तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे
Rohit tewatia 'Ishq'
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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एक सहेली की नसीहत तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मानकर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम सेे पहले भी ऐसा ही इक ख़्वाब, झूटी तसल्ली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो, तुम सेे पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है शाइ'र हवा की हथेली पे लिक्खी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सहरा में रमन करने वाला हिरन है शोबदा साज़ सुब्ह की पहली किरन है अदबगाह-ए-उल्फ़त का मेमार है वो तो शाइ'र है शाइ'र को बस फ़िक्र-ए-लौह-ए-कलम है उसे कोई दुख है किसी का ना ग़म है वो तो शाइ'र है शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से शाइ'र तो ख़ुद शहसवार-ए-अजल है उसे किस तरह टाल सकता है कोई, के वो तो अटल है मैं उसे जानती हूँ, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारे से वापस पलटते हुए मेरी खुरदुरी एड़ियों पर लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुई शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में कशीदी जिन्हें पढ़ के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसअला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली तुम मेरी बात मानो तुम उसे जानती ही नहीं वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई उसी की ही एक नज़्म हो
Tehzeeb Hafi
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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
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"मोटर-रिक्शा" बैठ कर एक बार रिक्शे में फिर न बैठेगा यार रिक्शे में आज-कल हो रहा है ज़ोरों पर हुस्न का कारोबार रिक्शे में दे हसीनों को कार से तश्बीह कर हमारा शुमार रिक्शे में आ रहा है मुशाएरे के लिए शाएर-ए-नाम-दार रिक्शे में है जहाँ दो का बैठना मुश्किल ये बिठाते हैं चार रिक्शे में शाह-राहों पे रोज़ होते हैं हादसे बे-शुमार रिक्शे में
Sarfaraz Shahid
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"जश्न-ए-आज़ादी" काम जो रिश्वत से बन जाए बनाना चाहिए चोर-बाज़ारी में काला धन कमाना चाहिए दूध में पानी बा-आज़ादी मिलाना चाहिए जिस से मतलब हो उसे मक्खन लगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? चावल और गंदुम न कुछ फ़ौलाद पैदा कीजिए निस्फ़ दर्जन कम से कम औलाद पैदा कीजिए मसअले फिर आप ला-तादाद पैदा कीजिए माहिर-ए-मंसूबा-बंदी को भगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? माँग है स्टेरीओ की और वी-सी-आर की ख़ैर हो अब आडियो वीडियो के कारोबार की शक्ल मिलने लग गई हैप्पी से बर-ख़ुरदार की जिस के लप पर हर घड़ी डिस्को तराना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? रिक्शा ओ टैक्सी का मीटर तेज़ होना चाहिए नर्सरी का मास्टर अंग्रेज़ होना चाहिए अक़्द का मेआर इतना ''रेज़'' होना चाहिए ज़िंदगी का पार्टनर मिस्ल-ए-''डियाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? जी में जो आए किए जाओ कि तुम आज़ाद हो मोटरें तेज़ी से दौड़ाओ कि तुम आज़ाद हो हादसा कर के खिसक जाओ कि तुम आज़ाद हो धर लिए जाओ तो फ़ौरन ''मकमकाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? आज इस अंदाज़ को यकसर बदलना है हमें हम बहुत बिगड़े हैं लेकिन अब सँवरना है हमें देस की ख़ातिर ही जीना और मरना है हमें जो न अब तक हो सका अब कर दिखाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए?
Sarfaraz Shahid
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"दफ़्तर-ए-शादी का मुन्तज़िम" वो चलाता है दफ़्तर-ए-शादी दोस्त ऐसा भी इक हमारा है फ़ीस लेता है दिल मिलाने की और इसी काम पर ''गुज़ारा'' है कोई शादी बग़ैर मर जाए ये भला कब उसे गवारा है अक़्द-ए-सानी की जिन को ख़्वाहिश हो उन की उम्मीद का सितारा है जिन को रिश्ता कहीं न मिलता हो उन का ये आख़िरी सहारा है सोचता हूँ कि है वो ख़ुश-क़िस्मत या हक़ीक़त में ग़म का मारा है अन-गिनत शादियाँ करा डालीं और ख़ुद आज तक कँवारा है
Sarfaraz Shahid
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"जदीद-तरीन आदमी-नामा" रॉकेट उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी मोटर चला रहा है सो है वो भी आदमी बस में जो जा रहा है सो है वो भी आदमी पैडल घुमा रहा है सो है वो भी आदमी पैदल जो आ रहा है सो है वो भी आदमी पब्लिक से जिस ने वोट लिया वो भी आदमी रिश्वत का जिस ने नोट लिया वो भी आदमी ''लुन्डे'' का जिस ने कोट लिया वो भी आदमी ''चर्ग़ा'' उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी जो दाल खा रहा है सो है वो भी आदमी बिज़नेस कोई करे तो कोई नौकरी करे कोई बने क्लर्क कोई अफ़सरी करे जो कुछ न कर सके वो फ़क़त लीडरी करे जल्सा सजा रहा है सो है वो भी आदमी नारे लगा रहा है सो है वो भी आदमी तस्ख़ीर जो ख़ला की करे वो भी आदमी उड़ जाए चाँद से भी परे वो भी आदमी और इस का जो यक़ीं न करे वो भी आदमी बातें बना रहा है सो है वो भी आदमी कुछ कर दिखा रहा है सो है वो भी आदमी टीवी पे आदमी हमें नग़्में सुनाए है डिस्को करे है आदमी और थरथराए है और कोई बाथ-रूम ही में गुनगुनाए है जो गीत गा रहा है सो है वो भी आदमी जो सर हिला रहा है सो है वो भी आदमी सिगरेट का जो उड़ाए धुआँ वो भी आदमी पीता है हीरोइन जो यहाँ वो भी आदमी निस्वार में जो पाए अमाँ वो भी आदमी बीड़ा चबा रहा है सो है वो भी आदमी जो पी पिला रहा है सो है वो भी आदमी
Sarfaraz Shahid
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"जहाँ सुलताना पढ़ती थी" वो इस कॉलेज की शहज़ादी थी और शाहाना पढ़ती थी वो बे-बाकाना आती थी वो बे-बाकाना पढ़ती थी बड़े मुश्किल सबक़ थे जिन को वो रोज़ाना पढ़ती थी वो लड़की थी मगर मज़मून सब मर्दाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी क्लासों में हमेशा देर से वो आया करती थी किताबों के तले फ़िल्मी रिसाले लाया करती थी वो जब दौरान-ए-लेक्चर बोर सी हो जाया करती थी तो चुपके से कोई ताज़ा-तरीन अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी किताबें देख कर कुढ़ती थी महव-ए-यास होती थी ब-क़ौल उस के किताबों में निरी बकवास होती थी तअज्जुब है कि वो हर साल कैसे पास होती थी जो ''इल्लम'' इल्म को मौलाना को ''मलवाना'' पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी बड़ी मशहूर थी कॉलेज में चर्चा आम था उस का जवानों के दिलों से खेलना बस काम था उस का यहाँ कॉलेज में पढ़ना तो बराए-नाम था उस का कि वो आज़ाद लड़की थी वो आज़ादाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी अजब अंदाज़ के उश्शाक़ थे उस हीर के मा में खड़े रहते थे फाटक पर कई माझे कई गा में जो उस के नाम पर करते थे झगड़े और हंगा में वो उस तूफ़ान में रहती थी तूफ़ानाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी वो सुलताना मगर पहली सी सुलताना नहीं यारो सुना है कोई भी अब उस का दीवाना नहीं यारो कोई इस शम्अ-ए-ख़ाकिस्तर का परवाना नहीं यारो ख़ुद अफ़्साना बनी बैठी है जो अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी
Sarfaraz Shahid
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