"जश्न-ए-आज़ादी" काम जो रिश्वत से बन जाए बनाना चाहिए चोर-बाज़ारी में काला धन कमाना चाहिए दूध में पानी बा-आज़ादी मिलाना चाहिए जिस से मतलब हो उसे मक्खन लगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? चावल और गंदुम न कुछ फ़ौलाद पैदा कीजिए निस्फ़ दर्जन कम से कम औलाद पैदा कीजिए मसअले फिर आप ला-तादाद पैदा कीजिए माहिर-ए-मंसूबा-बंदी को भगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? माँग है स्टेरीओ की और वी-सी-आर की ख़ैर हो अब आडियो वीडियो के कारोबार की शक्ल मिलने लग गई हैप्पी से बर-ख़ुरदार की जिस के लप पर हर घड़ी डिस्को तराना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? रिक्शा ओ टैक्सी का मीटर तेज़ होना चाहिए नर्सरी का मास्टर अंग्रेज़ होना चाहिए अक़्द का मेआर इतना ''रेज़'' होना चाहिए ज़िंदगी का पार्टनर मिस्ल-ए-''डियाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? जी में जो आए किए जाओ कि तुम आज़ाद हो मोटरें तेज़ी से दौड़ाओ कि तुम आज़ाद हो हादसा कर के खिसक जाओ कि तुम आज़ाद हो धर लिए जाओ तो फ़ौरन ''मकमकाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? आज इस अंदाज़ को यकसर बदलना है हमें हम बहुत बिगड़े हैं लेकिन अब सँवरना है हमें देस की ख़ातिर ही जीना और मरना है हमें जो न अब तक हो सका अब कर दिखाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए?
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"मोटर-रिक्शा" बैठ कर एक बार रिक्शे में फिर न बैठेगा यार रिक्शे में आज-कल हो रहा है ज़ोरों पर हुस्न का कारोबार रिक्शे में दे हसीनों को कार से तश्बीह कर हमारा शुमार रिक्शे में आ रहा है मुशाएरे के लिए शाएर-ए-नाम-दार रिक्शे में है जहाँ दो का बैठना मुश्किल ये बिठाते हैं चार रिक्शे में शाह-राहों पे रोज़ होते हैं हादसे बे-शुमार रिक्शे में
Sarfaraz Shahid
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"दफ़्तर-ए-शादी का मुन्तज़िम" वो चलाता है दफ़्तर-ए-शादी दोस्त ऐसा भी इक हमारा है फ़ीस लेता है दिल मिलाने की और इसी काम पर ''गुज़ारा'' है कोई शादी बग़ैर मर जाए ये भला कब उसे गवारा है अक़्द-ए-सानी की जिन को ख़्वाहिश हो उन की उम्मीद का सितारा है जिन को रिश्ता कहीं न मिलता हो उन का ये आख़िरी सहारा है सोचता हूँ कि है वो ख़ुश-क़िस्मत या हक़ीक़त में ग़म का मारा है अन-गिनत शादियाँ करा डालीं और ख़ुद आज तक कँवारा है
Sarfaraz Shahid
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"डॉज-महल" डॉज के नाम से जानाँ तुझे उल्फ़त ही सही डॉज होटल से तुझे ख़ास अक़ीदत ही सही उस की चाय से चिकन सूप से रग़बत ही सही डॉज करना भी अज़ल से तिरी आदत ही सही तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से क़ैस-ओ-लैला भी तो करते थे मोहब्बत लेकिन इश्क़-बाज़ी के लिए दश्त को अपनाते थे हम ही अहमक़ हैं जो होटल में चले आते हैं वो समझदार थे जंगल को निकल जाते थे तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से काश इस मरमरीं होटल के बड़े मतबख़ में तू ने पकते हुए खानों को तो देखा होता वो जो मुर्दार के क़ी में से भरे जाते हैं काश उन रोग़नी नानों को तो देखा होता तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से जानाँ! रोज़ाना तिरे लंच का बिल कैसे दूँ मैं कोई सेठ नहीं कोई स्मगलर भी नहीं मुझ को होती नहीं ऊपर की कमाई हरगिज़ मैं किसी दफ़्तर-ए-मख़्सूस का अफ़सर भी नहीं तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से घाग बैरे ने दिखा कर बड़ा महँगा मेन्यूँँ हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ इश्क़ है मुझ से तो ''कॉफ़ी'' ही को काफ़ी समझो मैं मँगा सकता नहीं मुर्ग़-मुसल्लम का तबाक़ तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से
Sarfaraz Shahid
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"जहाँ सुलताना पढ़ती थी" वो इस कॉलेज की शहज़ादी थी और शाहाना पढ़ती थी वो बे-बाकाना आती थी वो बे-बाकाना पढ़ती थी बड़े मुश्किल सबक़ थे जिन को वो रोज़ाना पढ़ती थी वो लड़की थी मगर मज़मून सब मर्दाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी क्लासों में हमेशा देर से वो आया करती थी किताबों के तले फ़िल्मी रिसाले लाया करती थी वो जब दौरान-ए-लेक्चर बोर सी हो जाया करती थी तो चुपके से कोई ताज़ा-तरीन अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी किताबें देख कर कुढ़ती थी महव-ए-यास होती थी ब-क़ौल उस के किताबों में निरी बकवास होती थी तअज्जुब है कि वो हर साल कैसे पास होती थी जो ''इल्लम'' इल्म को मौलाना को ''मलवाना'' पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी बड़ी मशहूर थी कॉलेज में चर्चा आम था उस का जवानों के दिलों से खेलना बस काम था उस का यहाँ कॉलेज में पढ़ना तो बराए-नाम था उस का कि वो आज़ाद लड़की थी वो आज़ादाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी अजब अंदाज़ के उश्शाक़ थे उस हीर के मा में खड़े रहते थे फाटक पर कई माझे कई गा में जो उस के नाम पर करते थे झगड़े और हंगा में वो उस तूफ़ान में रहती थी तूफ़ानाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी वो सुलताना मगर पहली सी सुलताना नहीं यारो सुना है कोई भी अब उस का दीवाना नहीं यारो कोई इस शम्अ-ए-ख़ाकिस्तर का परवाना नहीं यारो ख़ुद अफ़्साना बनी बैठी है जो अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी
Sarfaraz Shahid
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"जदीद-तरीन आदमी-नामा" रॉकेट उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी मोटर चला रहा है सो है वो भी आदमी बस में जो जा रहा है सो है वो भी आदमी पैडल घुमा रहा है सो है वो भी आदमी पैदल जो आ रहा है सो है वो भी आदमी पब्लिक से जिस ने वोट लिया वो भी आदमी रिश्वत का जिस ने नोट लिया वो भी आदमी ''लुन्डे'' का जिस ने कोट लिया वो भी आदमी ''चर्ग़ा'' उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी जो दाल खा रहा है सो है वो भी आदमी बिज़नेस कोई करे तो कोई नौकरी करे कोई बने क्लर्क कोई अफ़सरी करे जो कुछ न कर सके वो फ़क़त लीडरी करे जल्सा सजा रहा है सो है वो भी आदमी नारे लगा रहा है सो है वो भी आदमी तस्ख़ीर जो ख़ला की करे वो भी आदमी उड़ जाए चाँद से भी परे वो भी आदमी और इस का जो यक़ीं न करे वो भी आदमी बातें बना रहा है सो है वो भी आदमी कुछ कर दिखा रहा है सो है वो भी आदमी टीवी पे आदमी हमें नग़्में सुनाए है डिस्को करे है आदमी और थरथराए है और कोई बाथ-रूम ही में गुनगुनाए है जो गीत गा रहा है सो है वो भी आदमी जो सर हिला रहा है सो है वो भी आदमी सिगरेट का जो उड़ाए धुआँ वो भी आदमी पीता है हीरोइन जो यहाँ वो भी आदमी निस्वार में जो पाए अमाँ वो भी आदमी बीड़ा चबा रहा है सो है वो भी आदमी जो पी पिला रहा है सो है वो भी आदमी
Sarfaraz Shahid
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