nazmKuch Alfaaz

“मौसम ये बरसात का” आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का नन्हें बच्चों के पैरों की छप छप कभी तो कभी गिरती बूॅंदों की टप टप कहीं देख कर ये अनोखा नज़ारा यहाँ आज झूमा न हो ऐसा कोई नहीं गीली मिट्टी की ख़ुशबू लिए अपने संग दिन भी आया है ख़ुशियों के सौगात का आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का बादलों में झगड़ती हुई बिजलियाँ ये फुहारे हैं उड़ती हुई तितलियाँ आज धरती को बूँदें हैं यूँॅं छू रही मानो करती हो अंबर की कुछ चुगलियाँ छाया है अब कहीं पर ख़ुशी का समाँ तो कहीं पर है माहौल आपात का आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"तेरी याद है" मैं हूँ ये काली अँधेरी रात है तन्हाई है और तेरी याद है मेरे हाथ में क़लम है पास में रखा एक गिलास है जो शराब से भरा है तुझे याद किए जा रहा हूँ शराब पीते हुए नज़्म लिखते जा रहा हूँ सुनो मेरे लिखे नज़्म तो पढ़ोगी ना ख़्वाबों में मुलाक़ात तो करोगी ना प्यार से न सही, नफ़रत से ही मुझे याद तो करोगी ना जब याद आए मेरी तो ये भी ख़याल करना मैं तेरी आवाज़ सुनने को परेशान रहता हूँ मैं तुझे एक बार देखना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कि तू फिर से मेरे सर पे हाथ फेरे मैं ये भी चाहता हूँ कि तू फिर से आए मेरे पास और आ कर फिर कभी न जाए पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता ऐसा होना तो नामुम्किन है

Rovej sheikh

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“जन्म-दिन” ज़िंदगी का हर इक दिन हँसाता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे चाँद तारों के गुब्बारे कमरे में हो सब हक़ीक़त बने जो भी सपने में हो काटना केक अपने ग़मों का बना फ़िक्र की मोमबत्ती को भी फूँकना आसमाँ से फ़रिश्ते, परी आएँगे ख़ूब भर भर के वो तोहफ़े भी लाएँगे फिर बजाएँगे मिल कर सभी तालियाँ गाएँगे जुगनुएँ नाचेंगी तितलियाँ फूलों के जैसे मन मुस्कुराता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे

SHIV SAFAR

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“तवज्जोह” मैं सुनाता हूँ एक नज़्म उस पे जिस का उनवान उस का नाम ही है और इस तरह नज़्म ख़त्म हुई शुक्रिया आप की तवज्जोह का

SHIV SAFAR

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“तजर्बा” बिछड़ते वक़्त अपने प्यार का इज़हार करना हो या फिर उस सेे बिछड़ कर और ज़्यादा प्यार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर घर वालों के आगे हो ख़ुश ऐसा जताना हो या माँ के पूछने पर ग़म सफ़ाई से छिपाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कभी याद आने पर उस के तुझे नज़रें चुराना हो या शब को याद करना और दिन में भूल जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के पूछने पर हर दफ़ा इनकार करना हो या फिर तन्हाई में गर याद उसे हर बार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर यारों के आगे दिल से तुझ को सख़्त होना हो या फिर इक दोस्त के कंधे प सर रख ख़ूब रोना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के साथ उस ने ज़िंदगी अपनी बसा ली हो या फिर तू ने उसे ही ज़िंदगी अपनी बना ली हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है हो मन में और कुछ लेकिन उसे कुछ और बताना हो या दिल में दर्द हो लेकिन लबों से मुस्कुराना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी महफ़िल में उस के वास्ते पहचान बनना हो या उस का नाम आते ही तुझे अनजान बनना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है न उस के पास तेरी कोई भी पिछली निशानी हो मगर फिर भी वो तुझ को याद बिल्कुल मुँह-ज़बानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस के ग़म में उस के साथ मीलों दूर जाना हो या फिर उस की ख़ुशी ख़ातिर क़दम पीछे हटाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस को जानने के वास्ते कुछ झूठ कहना हो या सब सच जानने के बा'द भी ख़ामोश रहना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कुछ इक लम्हों में पूरी ज़िंदगी की मौज पानी हो या पूरी ज़िंदगी कुछ लम्हों के ज़द में बितानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है बग़ैर उस के कोई लम्हा कभी जीया न जाता हो या उस के साथ रहना ही फ़क़त इक फ़र्ज़ जैसा हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है उसे बस में बिठा के घर तक उस को छोड़ आना हो या उस की बस निकल जाने पे पीछे छूट जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है नहीं अब वो तेरा ये जानकर भी साथ देना हो या फिर इक फ़ैसला तन्हा यूँॅं ही रहने का लेना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

SHIV SAFAR

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“वो ही तुम हो” मेरी शा'इरी मेरे लफ़्ज़ों में गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ये उजला सा पन्ना है चेहरा तुम्हारा ये नुक़्ता ये बिंदू है गहना तुम्हारा किताबों से आए तुम्हारी ही ख़ुशबू सुख़न में तुम्हीं से है लफ़्ज़ों का जादू ये मेरी क़लम उँगलियाँ हैं तुम्हारी बयाज़ों की दफ़्ती हैं बाहें तुम्हारी मेरे ज़िस्त के हर वरक़ में भी गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ग़ज़ल है तुम्हारे बयाँ का तरीका ये बहरों ने सीखा है तुम सेे सलीक़ा सियाही है आँखों का काज़ल तुम्हारा ये मत्ला ये मक़्ता है आँचल तुम्हारा है मिसरा–ए–ऊला तुम्हारी जवानी तुम्हारे ही लब हैं ये मिस्रा–ए–सानी तख़ल्लुस में मेरे तलफ़्फ़ुज़ सा गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो

SHIV SAFAR

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“अब तू नहीं” अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है इस भरोसे पे मैं भी बैठा था अब मेरी पूरी आरज़ू होगी मेरी जानिब को मुस्कुराती हुई तेरी यादों के पीछे तू होगी मैं बहुत देर तक था बैठा रहा अब्र छाने लगे थे आँखों पे ग़ौर ख़ुद पर किया तो क्या पाया मेरी आँखों में चंद आँसू थे यादें मुझ को रुला के चल भी गईं और मुझ को ख़बर हुई ही नहीं बावजूद इस के मैं वहीं बैठा था जाने अब मुझ को देखना क्या था मैं ख़यालों से होश में जब आया ख़ुद को फिर से मैं तन्हा ही पाया कल तू फिर याद मुझ को आएगी फिर मैं उम्मीद ले के बैठूँगा कल रुलाएँगी फिर तेरी यादें फिर से तन्हा मैं ख़ुद को पाऊँगा फिर भी वा'दा है तेरी यादों से चैन मुझ को न अब कहीं होगा जब तलक आ न जाएगी तू ख़ुद सिलसिला ख़त्म ये नहीं होगा अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है

SHIV SAFAR

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