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“वो ही तुम हो” मेरी शा'इरी मेरे लफ़्ज़ों में गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ये उजला सा पन्ना है चेहरा तुम्हारा ये नुक़्ता ये बिंदू है गहना तुम्हारा किताबों से आए तुम्हारी ही ख़ुशबू सुख़न में तुम्हीं से है लफ़्ज़ों का जादू ये मेरी क़लम उँगलियाँ हैं तुम्हारी बयाज़ों की दफ़्ती हैं बाहें तुम्हारी मेरे ज़िस्त के हर वरक़ में भी गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ग़ज़ल है तुम्हारे बयाँ का तरीका ये बहरों ने सीखा है तुम सेे सलीक़ा सियाही है आँखों का काज़ल तुम्हारा ये मत्ला ये मक़्ता है आँचल तुम्हारा है मिसरा–ए–ऊला तुम्हारी जवानी तुम्हारे ही लब हैं ये मिस्रा–ए–सानी तख़ल्लुस में मेरे तलफ़्फ़ुज़ सा गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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“जन्म-दिन” ज़िंदगी का हर इक दिन हँसाता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे चाँद तारों के गुब्बारे कमरे में हो सब हक़ीक़त बने जो भी सपने में हो काटना केक अपने ग़मों का बना फ़िक्र की मोमबत्ती को भी फूँकना आसमाँ से फ़रिश्ते, परी आएँगे ख़ूब भर भर के वो तोहफ़े भी लाएँगे फिर बजाएँगे मिल कर सभी तालियाँ गाएँगे जुगनुएँ नाचेंगी तितलियाँ फूलों के जैसे मन मुस्कुराता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे

SHIV SAFAR

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“तजर्बा” बिछड़ते वक़्त अपने प्यार का इज़हार करना हो या फिर उस सेे बिछड़ कर और ज़्यादा प्यार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर घर वालों के आगे हो ख़ुश ऐसा जताना हो या माँ के पूछने पर ग़म सफ़ाई से छिपाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कभी याद आने पर उस के तुझे नज़रें चुराना हो या शब को याद करना और दिन में भूल जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के पूछने पर हर दफ़ा इनकार करना हो या फिर तन्हाई में गर याद उसे हर बार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर यारों के आगे दिल से तुझ को सख़्त होना हो या फिर इक दोस्त के कंधे प सर रख ख़ूब रोना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के साथ उस ने ज़िंदगी अपनी बसा ली हो या फिर तू ने उसे ही ज़िंदगी अपनी बना ली हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है हो मन में और कुछ लेकिन उसे कुछ और बताना हो या दिल में दर्द हो लेकिन लबों से मुस्कुराना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी महफ़िल में उस के वास्ते पहचान बनना हो या उस का नाम आते ही तुझे अनजान बनना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है न उस के पास तेरी कोई भी पिछली निशानी हो मगर फिर भी वो तुझ को याद बिल्कुल मुँह-ज़बानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस के ग़म में उस के साथ मीलों दूर जाना हो या फिर उस की ख़ुशी ख़ातिर क़दम पीछे हटाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस को जानने के वास्ते कुछ झूठ कहना हो या सब सच जानने के बा'द भी ख़ामोश रहना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कुछ इक लम्हों में पूरी ज़िंदगी की मौज पानी हो या पूरी ज़िंदगी कुछ लम्हों के ज़द में बितानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है बग़ैर उस के कोई लम्हा कभी जीया न जाता हो या उस के साथ रहना ही फ़क़त इक फ़र्ज़ जैसा हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है उसे बस में बिठा के घर तक उस को छोड़ आना हो या उस की बस निकल जाने पे पीछे छूट जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है नहीं अब वो तेरा ये जानकर भी साथ देना हो या फिर इक फ़ैसला तन्हा यूँॅं ही रहने का लेना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है

SHIV SAFAR

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“तवज्जोह” मैं सुनाता हूँ एक नज़्म उस पे जिस का उनवान उस का नाम ही है और इस तरह नज़्म ख़त्म हुई शुक्रिया आप की तवज्जोह का

SHIV SAFAR

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“अलविदा” मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता दर्द का सिलसिला जो अब तक है ख़त्म उस पल ही हो गया होता छोड़ कर जाने वाले तुझ को गर छोड़ कर मैं भी चल दिया होता मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता ख़ूब रोऊँगा मैं ने सोचा था तुझ से इक रोज़ जब जुदा हूँगा हक मगर वो भी तू ने छीना है जा तुझे ख़ूब बद-दुआ दूँगा तेरी यादों से मैं जुदा होता हिज्र के दिन अगर मिला होता मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता चाहते हो अगर तुझे भूलूँ और मैं दूँ न बद-दुआ तुझ को तो मुझे आके अलविदा कह दे मैं भी कर दूँगा फिर रिहा तुझ को मैं न यूँँ रोज़ मर रहा होता हिज्र का दिन अगर जिया होता मैं न यूँँ दर्द झेलता होता तू ने गर अलविदा कहा होता

SHIV SAFAR

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“अब तू नहीं” अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है इस भरोसे पे मैं भी बैठा था अब मेरी पूरी आरज़ू होगी मेरी जानिब को मुस्कुराती हुई तेरी यादों के पीछे तू होगी मैं बहुत देर तक था बैठा रहा अब्र छाने लगे थे आँखों पे ग़ौर ख़ुद पर किया तो क्या पाया मेरी आँखों में चंद आँसू थे यादें मुझ को रुला के चल भी गईं और मुझ को ख़बर हुई ही नहीं बावजूद इस के मैं वहीं बैठा था जाने अब मुझ को देखना क्या था मैं ख़यालों से होश में जब आया ख़ुद को फिर से मैं तन्हा ही पाया कल तू फिर याद मुझ को आएगी फिर मैं उम्मीद ले के बैठूँगा कल रुलाएँगी फिर तेरी यादें फिर से तन्हा मैं ख़ुद को पाऊँगा फिर भी वा'दा है तेरी यादों से चैन मुझ को न अब कहीं होगा जब तलक आ न जाएगी तू ख़ुद सिलसिला ख़त्म ये नहीं होगा अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है

SHIV SAFAR

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