“तवज्जोह” मैं सुनाता हूँ एक नज़्म उस पे जिस का उनवान उस का नाम ही है और इस तरह नज़्म ख़त्म हुई शुक्रिया आप की तवज्जोह का
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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“तजर्बा” बिछड़ते वक़्त अपने प्यार का इज़हार करना हो या फिर उस सेे बिछड़ कर और ज़्यादा प्यार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर घर वालों के आगे हो ख़ुश ऐसा जताना हो या माँ के पूछने पर ग़म सफ़ाई से छिपाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कभी याद आने पर उस के तुझे नज़रें चुराना हो या शब को याद करना और दिन में भूल जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के पूछने पर हर दफ़ा इनकार करना हो या फिर तन्हाई में गर याद उसे हर बार करना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है अगर यारों के आगे दिल से तुझ को सख़्त होना हो या फिर इक दोस्त के कंधे प सर रख ख़ूब रोना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी के साथ उस ने ज़िंदगी अपनी बसा ली हो या फिर तू ने उसे ही ज़िंदगी अपनी बना ली हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है हो मन में और कुछ लेकिन उसे कुछ और बताना हो या दिल में दर्द हो लेकिन लबों से मुस्कुराना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है किसी महफ़िल में उस के वास्ते पहचान बनना हो या उस का नाम आते ही तुझे अनजान बनना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है न उस के पास तेरी कोई भी पिछली निशानी हो मगर फिर भी वो तुझ को याद बिल्कुल मुँह-ज़बानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस के ग़म में उस के साथ मीलों दूर जाना हो या फिर उस की ख़ुशी ख़ातिर क़दम पीछे हटाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कि उस को जानने के वास्ते कुछ झूठ कहना हो या सब सच जानने के बा'द भी ख़ामोश रहना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है कुछ इक लम्हों में पूरी ज़िंदगी की मौज पानी हो या पूरी ज़िंदगी कुछ लम्हों के ज़द में बितानी हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है बग़ैर उस के कोई लम्हा कभी जीया न जाता हो या उस के साथ रहना ही फ़क़त इक फ़र्ज़ जैसा हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है उसे बस में बिठा के घर तक उस को छोड़ आना हो या उस की बस निकल जाने पे पीछे छूट जाना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है नहीं अब वो तेरा ये जानकर भी साथ देना हो या फिर इक फ़ैसला तन्हा यूँॅं ही रहने का लेना हो मुझे दोनों ही बातों का बहुत गहरा तजर्बा है
SHIV SAFAR
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“जन्म-दिन” ज़िंदगी का हर इक दिन हँसाता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे चाँद तारों के गुब्बारे कमरे में हो सब हक़ीक़त बने जो भी सपने में हो काटना केक अपने ग़मों का बना फ़िक्र की मोमबत्ती को भी फूँकना आसमाँ से फ़रिश्ते, परी आएँगे ख़ूब भर भर के वो तोहफ़े भी लाएँगे फिर बजाएँगे मिल कर सभी तालियाँ गाएँगे जुगनुएँ नाचेंगी तितलियाँ फूलों के जैसे मन मुस्कुराता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे
SHIV SAFAR
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"मय्यत” मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा कोई अपना अगर बाँहों में दम तोड़े तो क्या होगा उसी इक पल में मानो उम्र सारी बीत जाती है हमारे आगे बैठी मौत हम पे मुस्कुराती है समझ उस पल नहीं आता कि रोएँ या कि साँसें लें या उन की लाश पर ही सर पटक कर हम भी जाँ दे दें ख़ुदा के आगे घुटने टेक कर हम गिड़गिड़ाते हैं कि अपना वास्ता देकर उन्हें वापस बुलाते हैं मगर उस रब के कानों तक न चीख़ें अपनी जाती हैं किसी बादल से टकरा कर दुआएँ लौट आती हैं हमें उस वक़्त भी ये ज़िंदगी क्या ख़ूब ठगती है न आँसू सूख भी पाते कि मय्यत उठने लगती है ये बस कहने की बातें है कि दुनिया छोड़ जाते हैं वो बनकर याद सीने में बराबर जाते आते हैं न मिट्टी में गड़े रहते न नदियों में वो बहते हैं है सच तो ये हमेशा से हमी में दफ़्न रहते हैं अगर ख़ुद मौत से रिश्ता कोई जोड़े तो क्या होगा कोई अपना अगर बाहों में दम तोड़े तो क्या होगा मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा
SHIV SAFAR
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“अब तू नहीं” अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है इस भरोसे पे मैं भी बैठा था अब मेरी पूरी आरज़ू होगी मेरी जानिब को मुस्कुराती हुई तेरी यादों के पीछे तू होगी मैं बहुत देर तक था बैठा रहा अब्र छाने लगे थे आँखों पे ग़ौर ख़ुद पर किया तो क्या पाया मेरी आँखों में चंद आँसू थे यादें मुझ को रुला के चल भी गईं और मुझ को ख़बर हुई ही नहीं बावजूद इस के मैं वहीं बैठा था जाने अब मुझ को देखना क्या था मैं ख़यालों से होश में जब आया ख़ुद को फिर से मैं तन्हा ही पाया कल तू फिर याद मुझ को आएगी फिर मैं उम्मीद ले के बैठूँगा कल रुलाएँगी फिर तेरी यादें फिर से तन्हा मैं ख़ुद को पाऊँगा फिर भी वा'दा है तेरी यादों से चैन मुझ को न अब कहीं होगा जब तलक आ न जाएगी तू ख़ुद सिलसिला ख़त्म ये नहीं होगा अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है
SHIV SAFAR
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“मौसम ये बरसात का” आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का नन्हें बच्चों के पैरों की छप छप कभी तो कभी गिरती बूॅंदों की टप टप कहीं देख कर ये अनोखा नज़ारा यहाँ आज झूमा न हो ऐसा कोई नहीं गीली मिट्टी की ख़ुशबू लिए अपने संग दिन भी आया है ख़ुशियों के सौगात का आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का बादलों में झगड़ती हुई बिजलियाँ ये फुहारे हैं उड़ती हुई तितलियाँ आज धरती को बूँदें हैं यूँॅं छू रही मानो करती हो अंबर की कुछ चुगलियाँ छाया है अब कहीं पर ख़ुशी का समाँ तो कहीं पर है माहौल आपात का आसमाँ से ज़मीं की मुलाक़ात का देखो आया है मौसम ये बरसात का
SHIV SAFAR
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