"बिन तेरे" मुझे जीना है बिन तेरे ये सच अपना नहीं सकता बिछड़ कर तुझ सेे वापस ख़ुद को भी अब पा नहीं सकता मोहब्बत एक ऐसा ग़म है जो सब को रुलाता है मैं कितना रोया तड़पा हूँ तुझे समझा नहीं सकता तेरी हर याद काँटों की तरह दिल को दुखाती है मैं कितने दर्द में हूँ ये तुझे बतला नहीं सकता तेरा चेहरा मेरी आँखों में अब हर पल झलकता है तेरे ख़्वाबों में ही जानाँ मेरा हर दिन गुज़रता है भले तुझ सेे न कह पाया मैं अपने दिल की बातें पर मैं कितना चाहता हूँ तुझ को मेरा दिल समझता है ख़ुदा से अब ये ख़्वाहिश है कि तू बस मेरी हो जाए तेरे बिन जीना नामुमकिन ये दिल तुझ पे ही मरता है
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ
Rehaan
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“ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो” ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो स्वजन हो साथी हो बोलो आख़िर तुम कौन हो अगर हो आशिक़ मेरी तो फिर तुम अबतक क्यूँँ मौन हो निश्चित ही तुम मोहब्बत के इज़हार से डरती हो जब कहने में इतनी दिक़्क़त है तो प्यार क्यूँँ करती हो कहीं डरती तुम उस न से तो नहीं जो बयान-ए-इश्क़ पे सुनना पड़े मोहब्बत भी पूरी न हो और नया साथी भी ढूँढ़ना पड़े पर ये भी तो सच है ना मोहब्बत में दोस्ती सराब है इक बार मोहब्बत हो जाए तो बस दोस्त रह पाना ख़्वाब है ख़ैर छोड़ो ये फ़िज़ूल की बातें चलो बस इतना ही बता दो क्यूँँ कर बैठी मोहब्बत मुझ सेे इस राज़ से तो पर्दा हटा दो सीधा दिल ही लगा बैठी मुझ में ऐसा भी क्या देख लिया तुम ने जो ख़ूबियाँ तुम ने देखी हैं काश! कभी तो देखा होता उस ने अब पढ़ ही लिया है आँखों को मेरी तो क्यूँँ न मुझ पर एक एहसान कर दो जिस नज़रिए से तुम ने देखा है मुझे वो सलीक़ा उस को दान कर दो वो पढ़ सके दिल को मेरे ये अज़ीज़ हुनर तुम उसे भी सीखा दो इस फ़रेब-ए-दुनिया के अँधेरे में एक रौशनी मोहब्बत की तुम उसे दिखा दो माना कि मैं लड़का हूँ पर ज़िन्दगी मेरी भी आसान नहीं कभी देखो ग़ौर से चेहरे को मेरे इस पे पहले-सी वो मुस्कान नहीं अब तुम ही कोई चमत्कार दिखा दो इस राँझे की मुस्कान लौटा दो ढूँढ़ कर तुम पता कहीं से मेरी हीर को मेरा हाल बता दो वो मिल जाए तुम्हें तो अच्छा है न मिले तब भी कोई गिला नहीं तुम लौट जाना घर को अपने सोचना मैं तुम सेे कभी मिला नहीं समझकर इक फ़िज़ूल ख़्वाब तुम इस अनचाह क़िस्से को भुला देना घोंटकर गला जज़्बात का अपने अरमानों को तुम सुला देना बड़ी मुश्किल से सॅंभाला है ख़ुद को मुझे दोबारा तोड़ने न आना कहीं और दिल लगा लेना तुम मुझ सेे रिश्ता जोड़ने न आना जिस मिलन की तुम को हसरत है वो मिलन कदाचित सम्भव नहीं दिल लगाने को बेचैन हो तुम तुम्हें दिल टूटने का अनुभव नहीं ये दोबारा दिल लगाने का हुनर मुझे रास नहीं आता टूटे दिल को मोहब्बत का अब कोई एहसास नहीं भाता कैसे हाँ कह दूँ मैं तुम को जब दिल में मेरे कोई आहट नहीं बस तुम्हारी ख़ुशी को ख़ुदा मान लूँ क्या मेरी अपनी कोई चाहत नहीं मोहब्बत से मैं समझौता कर लूँ नहीं मुझ को ये मंज़ूर कभी बस दिल बहलाने को दिल लगा लूँ नहीं इतना मैं मजबूर अभी माना कि हूँ थोड़ा टूटा मगर किसी हमदर्दी की चाहत नहीं तुम्हारा होना भी एक डर है इस मौजूदगी से मुझे कोई राहत नहीं बस भी करो यूँँ याद करना मुझे ये मुसलसल हिचकियाँ अब सही नहीं जातीं बे-दर्द ये बे-रुख़ी बातें बार-बार मुझ सेे अब कही नहीं जातीं न जाने क्यूँँ मेरी ख़ातिर तुम अपनों से फ़साद करती हो मुझ काफ़िर के इश्क़ में ख़ुद को क्यूँँ नाशाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो
Rehaan
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"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है" बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं कम हो रही हर एक मील की दूरी पे अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई जाने फिर क्यूँँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ सेे ही रह गई होगी तुझ सेे नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं
Rehaan
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दो जानिब एक मैं हूँ एक तू है दोनों बड़े नादान हैं तू मुझ सेे और मैं ख़ुद से दोनों ही अंजान हैं तेरी गलियाँ स्वर्ग हैं जैसे मेरा शहर शमशान है मैं शम्अ' कब से बुझा हुआ तुझ पर पतंगें क़ुर्बान हैं ख़ुशियाँ तेरे क़दम चूमतीं ग़म मेरे मेहमान हैं तुझ पर ख़ुदा फ़िदा है मुझ सेे घरवाले तक परेशान हैं मुझे कि बस इक ख़्वाहिश तेरी तुझे कि सैकड़ों अरमान हैं मेरी क़िस्मत में तू ही नहीं तुझ पर क़िस्मत मेहरबान है मैं तेरे लिए कुछ भी नहीं तू मेरे लिए भगवान है तेरे दिल में भले रेहान न हो तेरी ज़िन्दगी फिर भी रेहान है
Rehaan
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"ज़रूरी था" भूलना भी था ज़रूरी तुझे तो इस लिए फिर इश्क़ में जलते चराग़ों को बुझाया हम ने सोच कर ये कि तेरी याद नहीं लाज़िम अब दिल से अपने तेरी यादों को हटाया हम ने मोहब्बत के मलालों से उबरना भी ज़रूरी था मुरादें भी ज़रूरी थीं समझना भी ज़रूरी था ज़रूरी था कि यादों को सँभाले रखते दिल में हम मगर यादों का फिर दिल से निकलना भी ज़रूरी था हैं हम को याद शा में जो तेरी गलियों में बीती थीं हमारा दिल जहाँ हारा था नज़रें तेरी जीती थीं वो तेरा हम को मुड़कर देखना केवल बहाना था असल में तो तेरा मक़्सद हमारा दिल दुखाना था मगर हम देर से समझे अदाएँ वो नुमाइश थीं तेरी गलियों से बिन देखे गुज़रना भी ज़रूरी था किसी मंज़िल सफ़र की अब नहीं रहती ख़बर हम को कोई उम्मीद की लौ भी नहीं आती नज़र हम को मोहब्बत की ख़ता की थी सज़ाएँ पानी थी पा लीं किए कितने सितम ख़ुद पे कि कितनी ठोकरें खा लीं तेरे ग़म के सताएँ हम कभी रोए कभी तड़पे मगर तड़पे तो याद आया तड़पना भी ज़रूरी था
Rehaan
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