nazmKuch Alfaaz

"ज़रूरी था" भूलना भी था ज़रूरी तुझे तो इस लिए फिर इश्क़ में जलते चराग़ों को बुझाया हम ने सोच कर ये कि तेरी याद नहीं लाज़िम अब दिल से अपने तेरी यादों को हटाया हम ने मोहब्बत के मलालों से उबरना भी ज़रूरी था मुरादें भी ज़रूरी थीं समझना भी ज़रूरी था ज़रूरी था कि यादों को सँभाले रखते दिल में हम मगर यादों का फिर दिल से निकलना भी ज़रूरी था हैं हम को याद शा में जो तेरी गलियों में बीती थीं हमारा दिल जहाँ हारा था नज़रें तेरी जीती थीं वो तेरा हम को मुड़कर देखना केवल बहाना था असल में तो तेरा मक़्सद हमारा दिल दुखाना था मगर हम देर से समझे अदाएँ वो नुमाइश थीं तेरी गलियों से बिन देखे गुज़रना भी ज़रूरी था किसी मंज़िल सफ़र की अब नहीं रहती ख़बर हम को कोई उम्मीद की लौ भी नहीं आती नज़र हम को मोहब्बत की ख़ता की थी सज़ाएँ पानी थी पा लीं किए कितने सितम ख़ुद पे कि कितनी ठोकरें खा लीं तेरे ग़म के सताएँ हम कभी रोए कभी तड़पे मगर तड़पे तो याद आया तड़पना भी ज़रूरी था

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ

Rehaan

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"बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है" बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं कम हो रही हर एक मील की दूरी पे अपने दिल की धड़कनें बढ़ा रहा हूँ मैं दिन गुज़रा है आज फिर वैसा ही थकान भरा पर ख़ुद को अभी बहुत अम्लान पा रहा हँ मैं छाया है आकाश में अँधेरा घना अमावस का ख़यालों में तेरे रूप-सा चाँद बसा रहा हूँ मैं मानकर साक्षी पीछे छूटते हर एक गाँव को अतीत की सभी रंजिशों से कसक मिटा रहा हूँ मैं रात कुछ कट चुकी है कुछ ढलनी अब भी बाक़ी है सवेरा जल्द होने की उम्मीद लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर को आ रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं बढ़ रही हर एक मील की दूरी पे तेरे किए वो सभी वाइदे भुला रहा हूँ मैं रात तेरे ख़्वाबों से नींद मुकम्मल शादाब हुई जाने फिर क्यूँँ ख़ुद को इतना क्लान्त पा रहा हूँ मैं मालूम है चाँद को अब मोहब्बत नहीं चकोर से फिर भी बादलों को ही दोषी ठहरा रहा हूँ मैं कोशिशों में कोई कमी शायद मुझ सेे ही रह गई होगी तुझ सेे नाराज़ इस दिल को हर बार यही समझा रहा हूँ मैं चुभने लगे हैं अब ये फ़ुज़ूल के उजाले आँखों में अँधेरा जल्द होने की अरदास लगा रहा हूँ मैं बस फिर से सड़क पर दौड़ चली है फिर तेरे शहर से ख़ाली हाथ जा रहा हूँ मैं

Rehaan

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'ऐसा क्यूँँ होता है' ऐसा क्यूँँ होता है जाता है कोई तो लौट के फिर न वो आता दुबारा ऐसा क्यूँँ होता है चंदा के जाने से लगता फ़लक ये सूना सारा दुनिया ये प्यार की दुश्मन इस सेे न पार पाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है मौला अपनों से हार जाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है दिल जो बिछड़ते हैं दिन न गुज़रते हैं शा में न कटती हैं रातें न छटती हैं लगता नहीं कहीं दिल ये बेचारा ऐसा क्यूँँ होता है रहती हैं आँखें नम हो नहीं पाता है गुज़ारा वादे किए थे उस ने जो वादे थे उस के सारे झूठे जितना उसे था कल चाहा ख़ुद से हैं आज उतने रूठे ऐसा क्यूँँ होता है भूलना चाहूँ तो दिल को मनाऊँ तो दिल न समझता है मुझ सेे उलझता है करता है उस पे ही बस ये इशारा ऐसा क्यूँँ होता है जब भी यूँँ होता है दिल ये हो जाता बे-सहारा

Rehaan

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दो जानिब एक मैं हूँ एक तू है दोनों बड़े नादान हैं तू मुझ सेे और मैं ख़ुद से दोनों ही अंजान हैं तेरी गलियाँ स्वर्ग हैं जैसे मेरा शहर शमशान है मैं शम्अ' कब से बुझा हुआ तुझ पर पतंगें क़ुर्बान हैं ख़ुशियाँ तेरे क़दम चूमतीं ग़म मेरे मेहमान हैं तुझ पर ख़ुदा फ़िदा है मुझ सेे घरवाले तक परेशान हैं मुझे कि बस इक ख़्वाहिश तेरी तुझे कि सैकड़ों अरमान हैं मेरी क़िस्मत में तू ही नहीं तुझ पर क़िस्मत मेहरबान है मैं तेरे लिए कुछ भी नहीं तू मेरे लिए भगवान है तेरे दिल में भले रेहान न हो तेरी ज़िन्दगी फिर भी रेहान है

Rehaan

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'सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ' अच्छा! तुम्हें एक ख़बर सुना रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ पूरे नौ दिनों की छुट्टियाँ मिली हैं मगर छुट्टियाँ तो महज़ एक बहाना है अस्ल में तो तुम सेे मिलना चाहता हूँ तुम्हें रू-ब-रू देखना चाहता हूँ इक दफ़ा फिर बाहों में भरना चाहता हूँ अस्ल में मैं थोड़ा-सा थक गया हूँ तुम्हारी गोद में कुछ देर सोना चाहता हूँ सफ़र की धूप में बहुत जल चुका हूँ ज़रा ज़ुल्फ़ों की पनाह में रहना चाहता हूँ अंजान राहों पे बड़ा भटक लिया हूँ तुम्हारे दिल के मकाँ में ठहरना चाहता हूँ बस नौ ही दिन मिले हैं मुझे मरियम हर पल तुम्हारे साथ गुज़ारना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि मेरा इंतिज़ार करना ठीक वैसे ही उन हसीन शामों की तरह उसी सफ़ेद सलवार और कुर्ती में सँवरना और गले में लहराता वही सुर्ख़ दुपट्टा अपनी छत की मुंडेर पर तुम खड़ी रहना गुज़रुँगा जब मैं गली से तुम्हारी तो रोकना न ख़ुद को तुम मुस्कुराने से मगर इस बार फेर लूँगा नज़रें मैं तुम सेे तुम भी रोक लेना ख़ुद को क़दम बढ़ाने से है क़सम हम दोनों को उस रिश्ते की जिस का वजूद कोई नाम कोई हैसियत नहीं मैं ने ख़त में ऊपर लिक्खा है जो कुछ भी उन बातों की मरियम अब कोई अहमियत नहीं सोचो! फिर तुम्हें वो बातें क्यूँँ बता रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ

Rehaan

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