नज़र नज़र का फ़रेब हर सू उठे तो सहरा पे फैल जाए झुके तो इक गहरी झील बादल-सिफ़त ये बरखा की एक रिम-झिम जो प्यार हो तो ये चाँदनी है नज़र नज़र का फ़रेब लेकिन नज़र हक़ीक़त नज़र झपकने में तख़्त-ए-बिल्क़ीस सामने हो नज़र के जादू से जिस्म पत्थर नज़र के पुर-ताब नूर से कोह-ए-तूर-ए-सीना भी रेज़ा रेज़ा नज़र नज़र का फ़रेब लेकिन नज़र हक़ीक़त मिरे ही तार-ए-नज़र से धरती पे सुरमई छत तनी हुई है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली
Iqbal Ashhar
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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
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ये काएनात एक आइना है ये साफ़ पानी की झील जिस में मैं डूब कर हैरत-ओ-तहय्युर बना सरापा जो लौटता हूँ तो ज़िंदगी है न मौत है इक सुरूर हूँ बे-ख़ुदी हूँ सच्चाई हूँ मुजस्सम
Ejaz Farooqi
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वो एक आँसू गिरा वो दिल के अथाह सागर में इक सदफ़ का भी मुँह खुला वो आसमानों का सुरमई रंग उस के आँसू में घुल के रुख़्सार के शफ़क़ पर बहा कहीं दूर जा के धरती के गहरे पाताल में गिरा हज़ारों आकाश-रंग आँसू हवा के तेज़ और तुंद झोंकों में मुंतशिर हो गए समुंदर की कोह जैसी मुहीब मौजों के अंधे ग़ारों में खो गए मगर वो आँसू वो एक मोती जो मेरी पुतली में जड़ गया है हज़ारों रंगों का माजरा है हज़ारों अश्कों का आइना है
Ejaz Farooqi
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क्यूँ मिरे ख़्वाब को धुँदलाते हो ख़्वाब अँगड़ाई है थरथराते हुए पाँव बीती आवाज़ों की लहरें और बल खाता हुआ सीमीं बदन जिस के इक इक अंग में मेरे लहू की धड़कन आसमानों की तरफ़ उठते हुए वो मरमरीं बाज़ू किसी शाहीन की परवाज़ और हाथों की पोरों से शुआ'ओं की फुवार ख़्वाब को अंगड़ाइयों की एक बल खाती हुई परवाज़ बनने दो जो मेरे ख़्वाब को धुँदलाओगे तो टुकड़े टुकड़े हो के तुम ख़ुद मुंजमिद हो जाओगे या बीती आवाज़ों में डूबोगे या अपने ख़ून के इस तेज़ धारे ही में बह जाओगे या जलती शुआ'ओं की तमाज़त में भस्म हो जाओगे
Ejaz Farooqi
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असा-ए-मूसा अँधेरी रातों की एक तज्सीम मुंजमिद जिस में हाल इक नुक़्ता-ए-सुकूनी न कोई हरकत न कोई रफ़्तार जब आसमानों से आग बरसी तो बर्फ़ पिघली धुआँ सा निकला असा में हरकत हुई तो महबूस नाग निकला वो एक सय्याल लम्हा जो मुंजमिद पड़ा था बढ़ा झपट कर ख़िज़ाँ-रसीदा शजर की सब ख़ुश्क टहनियों को निगल गया
Ejaz Farooqi
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तू है इक ताँबे का थाल जो सूरज की गर्मी में सारा साल तपे कोई हल्का नीला बादल जब उस पर बूँदें बरसाए एक छनाका हो और बूँदें बादल को उड़ जाएँ ताँबा जलता रहे वो है इक बिजली का तार जिस के अंदर तेज़ और आतिशनाक इक बर्क़ी-रौ दौड़े जो भी उस के पास से गुज़रे उस की जानिब खींचता जाए उस के साथ चिमट के मौत के झूले झूले बर्क़ी-रौ वैसी ही सुरअत और तेज़ी से दौड़ती जाए मैं हों बर्ग-ए-शजर सूरज चमके मैं उस की किरनों को अपने रूप में धारूँ बादल बरसे मैं उस की बूँदें अपनी रग रग में उतारूँ बा'द चले मैं उस की लहरों को नग़्मों में ढालूँ और ख़िज़ाँ आए तो उस के मुँह में अपना रस टपका कर पेड़ से उतरूँ धरती में मुदग़म हो जाऊँ धरती जब मुझ को उगले तो पौदा बन कर फूटूँ
Ejaz Farooqi
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